सोमवार, 30 जुलाई 2012

103 . तेरी ये आँखें कजरारी

103 .

तेरी ये आँखें कजरारी 
पता नहीं क्यों 
देख नहीं पाती 
मेरे दिल की बेकरारी 
नाजुक इतना अपना दिल है 
शब्द के एक आवाज से 
तेरे एक निगाह से 
चूर - चूर हो जाता है 
पता नहीं क्यों मेरे अलाप 
देख सुन कर भी 
तेरे मन को क्या दे जाते हैं 
यहाँ तो अपने दिल की बस्ती 
एक बार तेरे आने की उम्मीद से 
बार - बार उजड़ती और बस्ती है 
दर्दों का सैलाब इतना भी आयेगा 
तेरे नैन सह पायेंगे 
मेरे गुलिस्ताँ को 
देख उजड़ते इस कदर 
तेरी आत्मा चीख नहीं पायेगी 
मुझे दर - दर ठोकर खाते 
देख इस कदर 
प्यार तेरा कभी न चित्कारेगा 
ऐसी आशा भला कैसे 
मेरा प्यार कभी कर पायेगा !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' 02-02-1984

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें