सोमवार, 20 अगस्त 2012

126 . वक्त -वक्त की बात है

126 . 

वक्त -वक्त की बात है 
फूलों की सेज थी जो 
अब काँटों की बाग़ लगती है 
पल -पल हर पल में 
जो मधुर मिलन का स्वाद था 
अब पल -पल हर पल में 
जुदाई की एक आग है 
वक्त -वक्त की बात है 
कल तक जो सच था 
आज वो ही सपनों की एक याद है 
पल - पल में अपनों का जो एहसास था 
हर पल उन्हीं आँखों में 
नफरत की एक आग है 
वक्त -वक्त की बात है
जर्रा -जर्रा महकता था 
मिलन के एहसास से 
वहीं सिसकता है कोना - कोना 
जुदाई के नाम से 
दिन भी लिए हुए था 
रातों का एक एहसास 
लुट कर भी जी रहे हैं 
वक्त -वक्त की बात है
हँसते -हँसते भी आंसुओं को पी रहे हैं 
वक्त -वक्त की बात है !
सुधीर कुमार ' सवेरा ' 15-12-1983 
चित्र गूगल के सौजन्य से    

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