बुधवार, 22 अगस्त 2012

127 . खुदा न करे

127 .

खुदा न करे 
इश्क  
किसी को हो कभी 
यह एक ऐसी आग है 
जो तुझे जलाएगी 
बुझ न पाएगी 
पर 
खुद कभी 
हँसना गाना भूल कर 
सदा रोने लग जायेगा 
फिर हँसी तेरे ओठों पे 
न आ पायेगी कभी 
एक 
आग लिए सीने में 
घूमता रह जायेगा 
फिर न कहना 
' सवेरा ' ने 
न रोका कभी 
खो कर 
मुस्कानों की महफ़िल 
सदा के लिए 
गम के समंदर में 
डूब जायेगा 
प्यार 
पर ऐसी एक  
वरदान है 
जो न मिली 
अब 
तो फिर 
न पाओगे कभी 
जिन्दगी तो गुजर जायेगी 
पर 
जिन्दगी को 
जान न पाओगे कभी 
हँसी तो मिलेगी 
पर 
गम के मिठास को 
न जान पाओगे कभी !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' 27-12-1983 
चित्र गूगल के सौजन्य से  

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