शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

141 . टूटी छांहें बिखरी धुप

141 .

टूटी छांहें बिखरी धुप 
हरी घासें चट्टानों तले दबी 
सूर्य गया बादल में छुप 
तन्हाई गयी एहसास के समंदर में डूब 
सुना मरघट बुझती राख 
उल्लू की चीख गीदर की राग 
भयानक कोहरा जिन्दगी की रात 
नाकों में समाती अस्पताल की गंध
कौन खोले यह व्यर्थ का बंध  
भिखमंगे की कछ्मछाहाट
कौन हरे यह जग का अंध 
काँच सी फूटती पायल छनकती 
अधरों पे रस है घोलती 
बादल के बीच बिजली कौंधी 
अमराईयों से धुप हो छनती 
जुगनू चमके युग बीते 
तेरे ही प्यार में हम हैं जीते 
हर पल बीते स्वाति बूंद की चाह में 
हर तन्हाई की शाम 
और गम की रात हैं पीते !

सुधीर कुमार ' सवेरा '  05-06-1980 
चित्र गूगल के सौजन्य से  

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