शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

142 . तह पे तह बातों की दबी

142 .

तह पे तह बातों की दबी 
खुलती गाँठें गिरह की लड़ी 
जाम की तलब में उखरती साँसें 
कपड़ों की चोट से रोती पाटें 
महलो हवेलियों से झाँकती
वासना की नंगी आँखें 
नंगे जिस्म से खेलती 
जवानी की बाहें 
तराशे गढ़े से आती आवाज 
उघरी हुई सिसकारी की 
गोलाइयों पर से फिसलता हाथ 
कड़ेपन को गीला कर रहा 
डंके पर हो गई डंडे की चोट 
भंग हो गई टूट गई निकली आवाज 
ऊँचाईयाँ ऊँचे नीचे हुई 
धौंकनी सी बन गई 
ज्वार का समुद्र 
झील सी शांत हो गई
यह कोई नहीं है बात नयी 
रात पुरानी हो चुकी 
बिकती है हर आस यहीं 
बुढ़ापे का भी जवानी 
जवानी ही जवानी रात बन जाती है 
टूटता है हीरा 
हर बार उसकी दाम लग जाती है 
सिसकते रहते हैं अरमान 
सच्चाई भी घुट कर रह जाती है 
नजरों से कह लो जितना 
पर ओठों तक ही बात रह जाती है
सच्चाईयों पे लटके रहते 
वहाँ उसकी भी दाम लग जाती है 
तेरे लायक रहने से पहले 
बातें आम हो जाती है 
खनका लो पहले अँगना 
फिर सब कुछ हो जायेगा अपना 
वर्ना यूँ ही तरसते रहो 
देख - देख कर जलते रहो 
सच्चाई को समझ लो सपना !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' 06-06-1980
चित्र गूगल के सौजन्य से     

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