सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

163 . दुनियाँ वालों छोड़ दो मुझको

163 .

दुनियाँ वालों छोड़ दो मुझको 
मैं हूँ अकेला 
गम का मारा 
जिसने चाहा 
उसने रुलाया 
दिल से खेला 
और खूब सताया 
जी भरकर 
मुझको दुखाया 
दे दी यातना 
दे सका जितना 
निचोड़ा हुआ निम्बुं 
बन कर रह गया हूँ मैं 
दिल पर फफोले उठ रहे कितने 
दुनियाँ वालों छोड़ दो मुझको 
हंसों जितना 
पर नमक न छिड़को 
मैं हँसता था 
हँसता ही रहता 
गर तेरा प्यार 
बिच में न आता 
प्यार मिला 
और उपेक्षा पायी 
ऐसे लगा 
जैसे जहर ही खाई 
इससे पहले ही 
जो मर जाता 
तुझ पे थोड़ा कम 
खुद पे इतना 
गुस्सा न आता !

सुधीर कुमार ' सवेरा '   16-10-1980
चित्र गूगल के सौजन्य से  

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