शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

172 . कोरे बालू के जमीन पर

172 . 

कोरे बालू के जमीन पर 
लकीर खिंच गया कोई 
अनछुई बालू ने 
खिल कर ली अंगराई 
उमंग भरा उल्लास जगा 
जग की रीत भी भुलाई 
भूल गयी सारी बातें 
यौवन मद में डूब गयी 
कुछ नहीं आता था नज़र 
ऐसे में ही सावन आई 
अभी - अभी यौवन ने ली थी अंगराई 
बरस गया घमंडी बादल 
लेकर बदला गर्मी का 
प्यास बुझी नहीं बालू की 
तपती हुई थी पूरी धरती 
और अगन सी लग गयी 
चिरकाल तक रहेगा बरसता सावन 
बालू ने अपने मन में सोंची 
पर बादल फटा बिजली कड़की 
बाँट गया बादल को दो आधा 
अब आसमान साफ़ था 
मिट गया नामो निंसा बादल का 
अब उस भींगी बालू के जमीन को 
हुआ न ऐसा विश्वास कभी 
रो - रो कर आँसू सुखाये 
तप्त बनाली खुद को ऐसी 
फ़िजा भी गर्म हो गयी उससे 
खुद को तोड़ ली हर ओर से 
ऐसे में आया एक हिम खंड 
पर दरार न बालू का मिटा पाया 
बालू को हर पल 
बादल का ही अक्श नज़र आता था 
पर हुआ एक दिन यों 
हिम खंड ने अपनी ठंढक खो दी 
लांघ गया मर्यादा को 
खुद को पश्चाताप की आग में 
झुलसाने के लिए 
हिम खंड भी गल कर 
जाएगा जब मिट 
कोई और नया शिला खंड आएगा 
गड़ कर बालू में खुद 
एक नया सहारा देगा 
बन कर मिल का पत्थर 
' पथिक ' को राह बतलायेगा !

सुधीर कुमार ' सवेरा '   06-07-1982
चित्र गूगल के सौजन्य से    

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