शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

185 . देख मैं कितना मुर्ख हूँ


185 .

देख मैं कितना मुर्ख हूँ 
किसी से भी अपनेपन की आशा करता हूँ 
ना जाने क्यों सबको अपना समझता हूँ 
पर जबकि सच यह है 
कि जब तूँ अपनी न हो सकी 
तो जग में कोई ऐसा भी होगा क्या ?
जो मेरा अपना हो सके 
मुझको अपना समझ सके !

सुधीर कुमार ' सवेरा '  13-12-1983
चित्र गूगल के सौजन्य से  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें