सोमवार, 7 जनवरी 2013

197 . बचपन की बात है


197 .

बचपन की बात है 
दौड़ते हैं बादल 
पर लगता चाँद है 
जवानी की बात है 
होती है क्षीण जिसमे शक्ति 
लगती वही ख़ुशी की बात है 
इसी बीच आ जाता है बुढ़ापा 
किसी लायक नहीं छोड़ता है 
निकल जाता है आखिर में जनाज़ा !

सुधीर कुमार ' सवेरा '    01-07-1980
चित्र गूगल के सौजन्य से  

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