मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

236 . तुम मुझे


236 .

तुम मुझे 
मेरी कवितओं की 
अर्थ की तरह मिली थी 
मेरी कविता 
मेरी आत्मा है 
मेरी भावनाओं 
और विचारों की 
क्रिया - प्रतिक्रिया है 
आज 
जब भोर हुई 
देखा 
मेरी कवितायें 
बेजान निःसहाय पड़ी थी 
और उसका अर्थ 
मेरी मान्यताओं को 
मेरी आत्मा और भावनाओं को 
तोड़ती हुई 
ना जाने 
किस वफ़ा की तलाश में 
मुझसे दूर 
बहुत दूर 
मेरे पहुँच से बाहर 
सोने के पत्ते 
और चाँदी के पेड़ के नीचे 
जा बैठी थी 
मेरी ऐसी दृष्टि कहाँ 
कि उसे देख पाऊँ 
पर वो मुझे देख - देख 
मुस्कुरा रही थी !

सुधीर कुमार " सवेरा "   02-05-1984   08-30 pm 
चित्र गूगल के सौजन्य 

235 . क्या औचित्य था


235 .

क्या औचित्य था 
हम मिले थे 
पर क्या यह मिलन था 
था एक समझौता 
मिलन तो शायद 
संभव भी न था 
मुझे पूर्ण विश्वास था 
हम नदी के दो किनारे 
हाँ तुम्हे शायद 
कुछ लेना था 
मेरे 
निरन्तर प्रवाह को 
रोकना था 
एक पूल के सहारे 
तुमने मुझसे 
जोड़ लिए अपने किनारे 
पर यह गठबंधन 
कितना सुदृढ़ था 
सही अनुमान तुम्हे ही था 
मेरा अनुमान 
शायद मेरे स्वार्थ पर 
आधारित था 
और मैं धोखा खा गया 
मेरे किनारे को 
नदी का प्रवाह 
निरंतर काट रही थी 
शायद इसी का 
तुझे डर था 
तोड़ लिया 
तूने पूल का वो गठबंधन 
अब मेरा किनारा 
अपने छाती पे 
कोई पूल होने नहीं देना चाहते 
जानती है 
हर पल का 
यही हश्र होता है 
हम फिर 
अपने यथार्थ पे आ गए हैं 
और कभी 
न मिलने वाली 
नदी के दो किनारे 
बन गए हैं 
तेरे दुनियां में 
मैं तुझ सा न बन सका 
तेरे दुनियाँ के लायक न रहा 
पहले भी तन्हा था 
फिर से तन्हा हो गया 
इस बार तो 
तेरे सम्बन्ध का दाग 
मुझे 
मेरे दुनियाँ के लायक भी 
न छोड़ा 
मैं खामोश हो गया हूँ 
अपने सच को जानकर 
न जब्त होने वाला दर्द 
बन के मेरी कवितायें  
बिना मस्तिष्क की दुनियां में 
गूंगी आवाज बन चीख रही है !

सुधीर कुमार " सवेरा "    01-05-1984    01-15 pm 

234 . आज दिल - दिल की लगी से जलता है


234 .

आज दिल - दिल की लगी से जलता है 
हमसफ़र जो आज बनता है 
कल को अकेला ही छोड़ जाता है 
आग ही नहीं सिर्फ जलाया करते 
यहाँ इन्सान भी इन्सान से जलता है 
जिक्रे दिल क्या सुनायें 
दिल तो नाजुक काँच सा एक टुकड़ा है 
जो नजरों के अंदाज से भी टूट जाता है 
प्यार की हलकी आँच से भी पिघल जाती है 
फिर बेवफाई की भयानक चोट भला कैसे सह सकता है 
जो इश्क के परवाने चढ़े 
वो भला मौत से कैसे डर सकता है 
दिल की भी एक अलग हस्ती है 
यह एक ऐसी बस्ती है 
जो रोज उजडती है और बस्ती है 
वो दिल के सौदागर दुनियांवालो 
ये इतनी महंगी है की 
दुनिया भर की दौलत इसे खरीद नहीं सकता है  
उस दिल लगी से दिल लगा 
एक रोज उसके घर गया 
दिलजली हमसे न बोली 
दिल्लगी में मर गया 
कि ज़माने की ये बदसलूकी किससे कहें हम 
उसी ने बेअदबी की जिससे सलूक सीखा था 
कि चमन के पास रहकर भी एक फूल नहीं मिलता 
हाल ये है यारों 
किसी के मरने पे भी कफ़न नहीं मिलता !

सुधीर कुमार " सवेरा "    30-04-1984    04-00 pm 
चित्र गूगल के सौजन्य से  

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

233 . कहानी अपनी ही


233 .

कहानी अपनी ही 
खामोश कर दी जुबाँ को 
लिखने को बेताब हाथों में 
प्यार ने ही पहना दी हथकड़ी 
हर खुशनुमा लम्हा गुम हो गया 
जब प्यार मुझे ही दुत्कार कर चला गया  !

सुधीर कुमार " सवेरा "     14-03-1984  10-50 pm 

232 . उसे चाहे जो कह लो


232 .

उसे चाहे जो कह लो 
जन्म से पूर्व ही 
तेरे सांसों से 
जो अभिशप्त हो गया हो 
पृथ्वी पर आते ही 
जिसे खुला आकाश मिला 
फुट पाथों का सेज मिला 
उसे चाहे जो कह लो 
आँख खोलते ही 
जिसे दुत्कार मिला सुखी छाती से 
पेट भी न भरा 
जन्म के प्रथम प्रहर में 
जिसने सिर्फ 
भूख ही जाना 
खूब शोर मचाया 
पर कौन सुना ?
उसे चाहे जो कह लो 
घुटनों चलते ही 
पैरों का ठोकर मिला 
मुंह खोलते ही 
गाली और फटकार मिला 
उसे चाहे जो कह लो 
मानवता के नाम पर 
जिसे हैवानियत का पाठ मिला 
तेरे सांसों में उसे 
सांपों का फुफकार मिला 
तेरे कुत्ते मांस खाते रहे 
उसे मांर भी न मिला 
नहाना वो क्या जाने 
कपड़ा बदलना वो क्या जाने 
तन ढंकने को जिसे 
बित्ता भर वस्त्र न मिला 
तुम अन्दर 
हीटर तापते रहे 
वो बाहर 
थर - थर कांपता रहा 
मौत की दुआ माँगता रहा 
पर जिन्दगी 
उसकी दिलरुबा थी 
कैसे इतनी आसानी से 
भला साथ छोड़ देती 
तुम्हारे कुत्ते 
रहे कारों में घूमते 
उसे स्लेट भी न मिला 
ज्यों - ज्यों उसके 
नेत्र खुलते गए 
तेरे समाज का 
पैशाचिक लीला देखता रहा 
माँ को 
महाजन के हाथों 
बिकते और 
धमकियाँ खाते देखते रहा 
अब वो बड़ा हो गया है 
तूने तेरे समाज ने 
जहर पिला - पिला कर उसे 
सोंचो क्या बना दिया ?
पर तूँ सब कुछ पाकर 
जिसे खो चुका है 
जिसने तेरा 
सारा मूल्य ही 
ग्रस लिया है 
वो टूटपुजिया 
सब कुछ खोकर 
उस अमृत कण को 
पा लिया है 
जिसकी कीमत 
न तूँ न तेरा समाज 
खुद की कीमत लगाकर भी 
चूका नहीं सकता 
सब कुछ खोकर 
उसे 
इंसानियत 
ईमानदारी , वफ़ादारी 
पाक साफ नेक दिल 
मेहनतकश शारीर मिला है 
जिसके जन्म से ही 
जन्म जिसका 
तूने छीन लिया , बस दुआ कर 
उन मुर्दों में 
कभी चेतना न आये 
वर्ना जिन्हें तूँ मिटा रहा 
आशियाँ जिनका 
उजाड़ रहा है 
वो मिट्टी के पुतले 
मिट्टी में ही रहे 
पर नहीं 
शायद अब 
यह असंभव 
उसने अभी 
सुगबुगाना ही 
शुरू किया है 
जिंदा लाशों में 
रक्त का 
संचार बढ़ा है 
इतने सारे पिन चुभे थे 
जिस्म के हर भाग से 
खून रिस रहा था 
पर एक नाजुक अंग 
इस बार 
सह न सका तेरा वार 
जब उसके आत्मा को छू गया 
अब वो छोड़ेगा नहीं 
वो जान गया है 
आशा जिसकी 
वो ही नहीं 
उसके पूर्वज भी 
लगाये हुए थे 
वह दया से मिल जाएगी 
मात्र एक 
मृग तृष्णा थी 
हक़ कोई 
किसीका देता नहीं 
आगे बढ़कर 
हाथों को मरोड़ कर 
फिर भी न माने 
तो नाक दबाकर 
ले लिया जाता है 
बस एक बार 
सिर्फ एक बार 
उसे जागने भर की देर है 
और समय वो 
दूर नहीं है 
तेरे मौज मस्ती के 
दिन सारे पुरे हो गए 
तेरे मान्यताओं का खून 
आनेवाले कल में 
कोलतार के सड़क पर 
फैला होगा 
तूँ चीखता होगा 
छटपटाता होगा 
वो स्वर्णिम विहान 
आनेवाला है 
बहुत जल्द बहुत जल्द 
बस तूँ तैयार रह 
खेलने को होली 
तभी हर ओर होगी होली
समानता की बोली 
उसे चाहे तुम जो कह लो !

सुधीर कुमार " सवेरा "       21-03-1984
चित्र गूगल के सौजन्य से 

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

231. सौ बार अपनों की तरह मिले थे


231 .

सौ बार अपनों की तरह मिले थे 
अब बेगानों की तरह भी मिलने का हक़ नहीं 
सौ बार अधरों को चूमे थे 
अब तुझे छूने का भी हक़ नहीं 
सौ बार तूने मुझे अपना कहा था 
अब एक बार परिचित भी नहीं कहती हो 
ये बेवफाई की बात ऐसी ही होती है 
वक्त पर बना लेते हैं अपना 
काम निकल जाने के बाद 
भूल जाते हैं ऐसे 
जैसे कोई सपना 
धोखा और बेवफाई 
और दिलों से खेलना ही है इनकी फितरत !

सुधीर कुमार " सवेरा "            26-07-1983
चित्र गूगल के सौजन्य से 

230 . जी रहे हैं सभी जिन्दगी के नाम पर


230 .

जी रहे हैं सभी जिन्दगी के नाम पर 
मौत भी रो रही है जिनके नाम पर 
दफ़न होते नहीं कोई मरकर 
जिन्दे जी दफनाये जाते हैं 
कफ़न भी रोये जा रही है 
जिनके नाम पर
बेदागदार दामन पर भी 
दागों के निशां रोते हैं !

सुधीर कुमार " सवेरा "   21-05-1983
चित्र गूगल के सौजन्य से  

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

229 . WHO IS SAINT ?


                                    229 .


WHO IS SAINT ?
AFTER ALL HE IS PRIEST ,
WHO HAVE CONSOLATION ,
FALL ALL ,
WHOM DOOR OPENS ,
WHO IS WITHOUT CASTE FEELING ,
THERE IS WELCOME ,
WHO IS SUFFERING WITH TRAGEDY ,
HE GIVES GOOD WISHES TO ALL ,
HE IS ALWAYS READY ,
FOR RESCUE AT ALL ,
SOCIAL RESPONSIBILITY ,
IS FLANGEING
ON HIS STRONG  SHOULDER ,
HE GIVES SIDE TO ALL ROW ,
THAT MAY BE THIEF ,
ANY BODY GET PEACE ,
UNDER HIS SWEAT SHADOW ,
HE PRAYS FOR ALL ,
HE IS GREAT IN SOUL ,
HE HAS LEFT ANY ERROR ,
FIRST IS GOD ,
SECOND IS PRIEST ,
WHAT IS PIOUS ?
ALL KNOWS ,
THAT IS SAINT’S FOOT DUST ,
PILGRIMS TRAVEL BECOMES ,
COMPLETE WITH IT ,
BUT WHAT HE GETS ?
BY DINT OF ABOVE SERVICE ,
SHAME , ABUSE  & MANY PROVOKING WORDS ,
BECAUSE HE IS NOT NARROW ,
MUSCULAR GROUP WANT ,
THEY SERVE UNDER MY ORDER ,
CAPITALIST ALSO LIKE SO ,
INTELLECTUAL IS ALSO ,
NOT EXCEPTION ,
BE  LIKE , THEY DON’T KNOW ,
THE PRIEST IS ONLY SERVED ,
OF HIS OWN GOD ,
EXCEPT OWN GOD ,
HE CAN’T OBEY OF ANY ,
HE IS ONLY ABDERIAN ,
WHO GIVES SOLACE ,
IN WEEPING TIME .

Sudhir kumar " Savera " 
26.05.80.

228 ,OVER TRUTH .


                                     228 .


OVER TRUTH .

O BLUE SKY ,
YOU ARE TRUTH ,
I AM LIE ,
YOU ARE WITH ,
MANY CHARMFUL STARS & SATELITES ,
BUT MY STAR WITH ,
TWISTED WAY & FLIMSY LIGHT ,
BUT MY IMBRICATE BRAIN ,
PRESSED TO THINK ,
EITHER YOU ARE GREAT OR I ,
IF YOU , MATTER IS NOTHING ,
OTHERWISE WHY I AM SO WEAK ,
EASSY QUESTION BUT BIG ANSWER ,
I HAVE NOTHING TO DO ,
EXCEPT THIS TRUTH ,
IN EVERY INSPIRATION ,
AND EXPIRATION ,
I REMEMBER ,
NOT FORGOTTEN ,
THAT I AM WHAT & WHY ,
AND BY WHICH I AM ,
EXHISTING MY LIFE .

Sudhir kumar " Savera "
20.05.80.

227 .I LOVE HER BY HER NAME ,


                                     227 .


I LOVE HER BY HER NAME ,
I LOVE HER BY HER SHAME ,
I LOVE HER BY HER SOUL ,
I LOVE HER BY HER SANCTITY ,
I LOVE HER BY HER DUETY ,
I LOVE HER BY HER BEAUTY ,
BUT SHE HATE ME BADLY .

Sudhir kumar " Savera " 
18.06.80.

226 .A WREAK .


                                     226 .


A WREAK .

I AM A WREAK ,
FREE IN ALL THE WEEK ,
AFTER THE KALIK ,
I GET DOWN IN THE HILL ,
SOME TIMES HERE & ,
SOME TIMES THERE ,
GO WITHOUT ANY FEAR ,
TO THE MOUNTAIN ,
WHEN I KEEK ,
I AM A WREAK ,
AS LIKE A DUCK ,
WHICH SWIMS IN THE RIVER ,
I AM IN THE SKY ,
WHERE I GET MY FLIGHT ,
I LOVE THE HILL ,
WHEN I MAKE MY KISS ,
BY WHICH FORMS A FIELD ,
I AM A WREAK .

Sudhir kumar " Savera " 
25.12.80.

225 . NOW A DAYS .


                                     225 .


NOW A DAYS .

I LAUGHED ,
WHEN SHAW COUPLE ,
I WEPT ,
WHEN SHAW DIVORCE ,
IT WAS NOTHING ,
ONLY MARRIAGE IS HAIST ,
AND REPEANT AT LATTER ,
I HOPED ,
WHEN READ IN COLLEGE ,
I DIE
WHEN CAME OUT ,
IT WAS NOTHING ,
I RAPED EXAMINATION ,
ALSO BY INSTITUTE ,
I ANGUISHED ,
WHEN SHAW DRINKING ,
L.S.D , HASHIS & SMOKING ,
DISTRIBUTED ALL AROUND ,
THE YOUTH ,
SWEAT POISION INSTILLING ,
WITHOUT HIS FEELING ,
I ABLUSHED ,
WHEN SHAW CHILDS ,
WITHOUT CLOTH & HOUSE ,
WHO IS YOUNGER WAY TO GROW ,
I AM BROADLY SPEAKING ,
INTELECTUALS ARE ABUSED ,
ILITERATES ARE ABSURDLESS
I DIE ,
WHEN SEE ,
EVE TEASING TO ABTACTATED,
I SURPRISED ,
WHEN SEE ,
I AM LIVING INSIDE ,
THE SELFISH SOCIETY .

Sudhir kumar " Savera "
28.05.80.

224 . BEFORE THE BIRTH ,


                                      224.


BEFORE THE BIRTH ,
AFTER THE DEATH ,
IT IS A MYSTERIOUS CASE ,
COME OUR RACE ,
KNOW WHAT IS MY GUESS ,
THAT IS THE TIME OF SPACE ,
WHICH IS WITHOUT BODY & FACE ,
WITHOUT SORROW & PAIN ,
EVERY THING IS FALSE ,
WHICH YOU WILL GUESS .

Sudhir kumar " Savera " 
12.02.80.

223 . DARLING .


                                    223 .


DARLING .

O MY DEAR ,
I LOVE YOU CLEAR ,
I LOVE YOU YOU LOVE ME ,
LOVE ME , LOVE ME ,
O MY DEAR
LET ME COMPLIMENT ,
YOU ON YOUR HAIR ,
PLEASE GIVE ME A CUP OF TEA ,
IF YOU FEEL & SEE ,
IF YOU WILL FADE UP ,
DON’T WORRY GIVE UP ,
MY DEAREST DISPRESSED ,
DARLING ,
I CAN’T STAND AT ANY MORE ,
MY LITTLE HEART ,
I LOVE YOU VERY MUCH ,
I LOVE YOU DARLING ,
I WISH I COULD DIE NOW .

Sudhir kumar " Savera "
18.02.80.

222 . FLIMSINESS .


                                       222 .

                            FLIMSINESS .

OUR MIND ,
ALWAYS REMIND ,
DO THIS WORK ,
BUT ,
WE ARE MISSING ,
DON’T WORRY ,
WOULD BE TOMORROW ,
BUT ,
THAT TOMORROW ,
IS COMING  ?
NEVER ,
WE FELL IN TO FUTURE ,
DUE TO OUR NATURE ,
I SAY TO THOSE ,
WHO WANT TO BE GREAT ,
DO CARE ,
JUST HERE ,
DO THERE ,
YOU ARE WHERE .

Sudhir kumar " Savera "
10.03.80.

221 . SHRINKING .


                                    221 .


SHRINKING .

DON’T BE FRAIL ,
YOU ARE NEVER TRIVIAL ,
ONLY YOU CAN FEEL ,
FOR A MOMENT ,
INSTILLING IN HAIL ,
I SAITH YOU ,
IT IS NOTHING ,
YOU ALWAYS SANG A SONG ,
IS IT A PHILOSPHY ,
HOW CAN IT A REALITY ,
BUT YOU KNOW ,
AS YOU SEE IN THE EVERY MORNING ,
MY LITTLE HEART ,
DOES ALWAYS ALERT ,
WHY YOU BECOMES FLIMSY ,
YOU HAVE A SOUL ,
WHICH IS VERY STRONG ,
GOTTEN AN ABILITY ,
TO DO ANY THING .

Sudhir kumar " Savera "
11.03.80.

220 . ETERNAL BLISS .


                                   220 .


ETERNAL BLISS .

LOVE IS MY MIND ,
LOVE IS MY HEART ,
ONLY LOVE IS OUR SOUL ,
A LESSION OF GOD ,
ANCIENT TAMPLE WALL ,
FINALLY STRIVE US ,
LOVE IS GOD IS LOVE ,
AFTER ALL ALL THING IS LOVE ,
OUR PIOUS HEART ,
STORM BY ONLY LOVE ,
IN THIS MANNER ,
LOVER & BELOVER ,
ARE TOW SIDE OF SAME COIN ,
THEY BECOMES TWO BODIES ,
WITH ONE SOUL ,
ARE JOINED WITH ONE THREAD ,
OF LOVE ,
LIKE THIS ALL ,
MAY BECOMES ONE ,
IF HAVE A PURE LOVE ,

Sudhir kumar " Savera " 
13.03.80.

219 . UNEQUIVOCALLY VISION .


                                    219 .


UNEQUIVOCALLY VISION .

O OUR YOUNG BROYHERS ,
RUN UP COME HERE ,
ONE TIME WAS FOR FREEDOM ,
WHEN YOU SPLASHED BY BLOOD ,
AS IT OFTEN STATES ,
YOU HAVE A HIGH ABILITIES ,
FOR THE SAKE OF COUNTRY ,
YOU DO ONE THING HEARTLY ,
DEFICIENCY OF BLODY REVOLUTION ,
PLEASE SHED THESE CORRUPTION ,
IN SOCIETY PLENTY OF CORRUPTION ,
WITH THIS GANDHI’S COUNTRY ,
WOULD BE WITHER ,
ONLY YOU CAN SAVE ,
SO COME COME OUR DANDY ,
HASTLY DO IT WITH VIGOURSLY ,
WOULD BE SAVE THAN ,
WE & OUR CULTURE ,

Sudhir kumar " Savera " 
19.03.80.