बुधवार, 7 अगस्त 2013

277 . तुम्हारी वो दिल्लगी थी


२७७.

तुम्हारी वो दिल्लगी थी 
मेरे दिल को लगी 
तेरे लिए वो खेल था 
मेरे तो जान पे आ बनी 
तुझे शायद न पता था 
पर मैंने तो बता दिया था 
मैं बड़ा सुकोमल कचा घड़ा हूँ 
जानकर ही तूं 
इस काबिल बनी 
मुझे यूँ ठोकर मारा 
मैं न घर का रहा न घाट का 
तूं तो फिर भी किसी घर की हुई 
मैं हर बार किसी घाट पे बिकता रहा !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २७ - ०४ - १९८४ 
३ - १८ pm कोलकाता  

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