शनिवार, 27 सितंबर 2014

297 . आप बोसा बिना गिने अनगिनत लिए ,


२ ९ ७
आप बोसा बिना गिने अनगिनत लिए ,
दिन गिना करते थे इस दिन के लिए ,
ले करके पूछूंगा दो बोसे रुखसार के ,
कैसे मिजाज हैं मेरे परवर दिगार के ,
मेरे फरमाइशी बोसे पे , पहले तो वो इतराये ,
फिर सिमट के आ गए , बाँहों में शरमाने के बाद !

दिल से कहते थे न ऐसी राह चल !
ठोकर खा कर गिरा अच्छा हुआ !!

दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ तो हुई ,
लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया !

आज दिले बर्बाद की जिद है ,
 रोएँ तबतलक दामन से लिपट के ,
तड़पते देखता हूँ जब कोई शय ,
उठा लेता हूँ उसे अपना समझ कर !

दिल में रखो किसी को दिल में रहो किसी के !
सीखो अभी तरीके कुछ रोज दिलवरी के !!

सिवा इसके कोई तमन्ना नहीं है !
फकत आपको देखना चाहते हैं !!

आराम तमाम उम्र के सीने में दफ़न है !
हम चलते फिरते लोग मजार से कम नहीं !!

सुधीर कुमार ' सवेरा '

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