बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

323 .जो रही सदा एक अनबुझ पहेली

३२२ 
जो रही  सदा एक अनबुझ पहेली 
कोई और नहीं नाम है उसका जिंदगी 
कुछ घर और कुछ वन में 
कुछ गिरी और कुछ रेत में 
मिटती नहीं निशान जिसकी 
नाम उसका है जिंदगी 
जिंदगी अनोखा बाग है 
जो महकती है कर्मधार से
जिंदगी एक आग है 
जो जलती है प्रेम पाश से 
जिंदगी एक मेल है 
जो मिलता है नभ और धरती से 
जिंदगी एक खेल है 
जो जीता जाता हार से 
जिंदगी एक फूल
जो खिलता कुछ खोने से 
जिंदगी एक गीत है 
जो बजता तारों के टूटने से 
जिंदगी एक बाग है 
जो गुलजार सदा सुख दुःख के शबनम से 
लिखी गयी जो 
मिलन  विरह के छंदों से 
किसी का भाग्य 
किसी का दुर्भाग्य जिंदगी 
बिखर गयी मिलन की राह में 
सजी सिमटी किसी की जिंदगी 
जिंदगी नहीं मंजिल 
यह एक राह है 
झरने का निरंतर प्रवाह है 
बुल बुला बन कर विलीन हो जाना 
जिंदगी का एक खेल है 
जिंदगी किसी के पपीहे की प्यास है 
उसकी आह नहीं है 
उसे तो प्रेम रूपी स्वाति की चाह है 
जिंदगी एक हिमखंड 
बाहर से जिसमे शीतलता 
भीतर में दाह है 
प्यार की राह में 
बदनाम मेरी जिंदगी 
चढ़ गयी जिसके हॉट में 
हुई नीलाम मेरी जिंदगी 
जिंदगी मौत की डगर है 
जिंदगी नदी में एक नगर है 
जिंदगी जुआ का दान नहीं 
पासे का उलट पलट है 
जिंदगी निर्दोष नजरों में 
एक गहरा जख्म है 
प्यार की नगरी में 
जिंदगी उजड़ी एक नाव है 
पत्थर के मूर्ती पर 
है बलिदान किसी की जिंदगी 
जो मरा प्यास से 
नाम है वो जिंदगी 
जो लुटे अरमान किसी का 
नाम है वो जिंदगी 
किसी को ठोकर लगाये 
किसी के चरण पूजाये 
 नाम है वो जिंदगी
खिलने से पहले जो मुरझाये 
हंसने से पहले जो रुलाये 
नाम है वो जिंदगी 
हो घोर अँधेरा 
फैलादे सर्वत्र उजाला 
नाम है वो जिंदगी !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १७ - ०४ -  १९८४  / ३ - ०२ pm 

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

322 .वज्र ह्रदय मोम हो उठा

३२२ 
वज्र ह्रदय मोम हो उठा 
दिल पर जैसे ही 
प्रेम का रंग चढ़ा 
मंजरियाँ किलक उठी 
कोयल टेर गयी 
स्वर कोई पहचाना 
बन अनजाना अनचिन्हा 
दूर मुझसे होती चली गयी 
पेशानी पे मेरे 
शिकन आयी और चली गयी 
दिशाएं दिनमान रहित 
पथ वन चौराहे 
बन पगडण्डी 
कह गए बात बेमानी 
बहुत रोका 
लाना ही नहीं चाहा 
आखिर तुम लुढ़का ही गयी 
बन आँखों का पानी !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १७ - ०४ - १९८४ २ - १७ pm 

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

321 .ह्रदय के सुरभित द्वार

३२१ 
ह्रदय के सुरभित द्वार 
खुले थे 
विश्वासों के बसंती झोंके 
विचर रहे थे 
मैं विनम्र किसी मूर्तिकार की कल्पना 
शालीनता से 
चांदनी रात में 
शिलाखंड पर बैठा 
अपलक इक्षाओं को निहार रहा था 
भीतर मेरे 
कोई जो आकर बैठा था 
कोई और नहीं 
वही   
जिसे मैंने अपना समझा था 
जिसने खुद से ऊब कर 
अपने उदासी के घेरे से 
मौन सुनेपन के झोंके से 
स्वयं स्वागत किया था 
बाहर आ
हंसती स्वरलहरियां 
ओठों पे उसके 
मैंने सजा दिया
जीवन का अर्थ समझा 
उसे जीना सीखा दिया 
पर खुद मैं 
बाहर ही रह गया 
और उस निष्ठुर ने 
मेरे लिए ही 
द्वार अपना बंद कर दिया ! 

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १७ - ०४ - १९८४   

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

320 . मेरे खुरदुरे विचारों ने

३२० 
मेरे खुरदुरे विचारों ने 
भविष्य के भुवन पर 
नक्काशी रचे 
मेर कामनातीत पुतलियों ने 
स्व को भुला दिया 
पल - पल 
मेरे मरने की प्रक्रिया 
अबाध चलती रही 
हर पल की मौत 
मेरे नए जीवन की 
साँसें हैं 
सिद्धांत वही रहते 
पर अर्थ बदल जाते 
और मेरे ही लोचनो पर 
आत्मा मेरी विद्रूप करती 
आत्मा की हर परत पर 
एक नयी परत डालती है !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १७ - ०४ - १९८४   २ - ०० pm 

मंगलवार, 14 अक्तूबर 2014

319 .गाँव सौराठ

३१९
गाँव सौराठ 
लगे जहाँ सभा 
कहते हैं उसे सौराठ सभा 
बहुत प्राचीन समय से 
वर कन्या के पिता 
होकर इकट्ठे बनाते थे सभा 
वर दान कन्या दान के निमित से 
लगती थी पहले ये सभा 
गाँव पिलsखवार में
हुआ एक अमंगल
गाँव सौराठ में 
लगा ब्राह्मणों को एक पाप 
गौ हत्या का गाँव सौराठ में 
दरभंगा महाराज के समय 
हुए एक महान साधक 
गाँव सौराठ में 
गाँव के जिनके 
परित्याग कर दिया था लोगों ने 
प्रयास से जिनके 
महाराज प्रसन्न हुए 
अनुनय विनय से  उनके
और लगने वाले सभा को 
पिलsखवार से उठा कर 
दे दिया गाँव सौराठ को 
चली आ रही ये परम्परा 
सम्मिलित  होते जिसमे 
लाखों मिथिलावासी 
कोई दूजा वर्ण नहीं 
पंजीकार भी यहाँ बैठते 
विवाह जहाँ पंजीकृत होता 
भावनात्मक , सम्पर्कात्मक एवं 
सम्बन्धात्मक भाव जहाँ सन्निहित होता 
गाँव वो सौराठ कहलाता
बिहार में जिला मधुबनी से तीन  किलोमीटर की दुरी 
जहाँ मैथिल ब्राह्मणों का गाँव बसता 
पर नेता बनने के चक्कर में 
अदूरदर्शिता से आच्छादित 
नवयुवक वर्गों ने 
इस मर्यादित परम्परा के गौरव को 
विनष्ट कर डाला है 
भाषणो के बौछार से 
समझते जो कुछ नहीं 
समझने का वो दावा करते 
बोलना जिन्हे आता नहीं 
लोगों को वो भाषण पिलाते 
जो खुद नहीं करते 
वो औरों से करने को कहते 
किताबी बातों से 
सब का मन बहलाते 
अव्यवहारिक बातों से 
सबको व्यवहारिक बनाते 
समाज को नष्ट कर नेता कहलाते 
जो समाज को ग्राह्य नहीं 
अल्पबुद्धि से कानून से मनवाते 
समाज के सामने मैं का महत्व दर्शाते 
खुद जो सड़ी मान्यताओं से लिपटे 
स्वार्थी की दुनियाँ में जिनकी साँसे पलती 
वो ही समाज को बदलने का दावा करते !

सुधीर कुमार ' सवेरा '      

318 . जुर शीतल एक पर्व है

३१८ . 

जुर शीतल एक पर्व है 

परम्परागत 

अनचाही एक खेल है 

सदियों पहले 

आखेट का जब युग था 

दो गाँवों के बीच 

काफी फासले होते थे 

पेट भरने के वास्ते  

जंग्लों मे शिकार को 

झुंड बनाकर लोग जाया करते थे 

दिन वो खुशी का या मनहूस रहा होगा 

जब शिकार किया गया 

एक दूसरे का सीमा पड़ गया होगा 

और तर्को से न होकर 

लाठी के बल अधिकार 

जताया गया होगा 

तारीख वो चौदह अप्रैल ही होगा 

जो तारीख परम्परा बन गायी 

असल तो उसी दिन 

समाप्त हो गया 

नकल बेअकल को 

ढोना पड़ गया 

उठ कर इस दिन 

बड़े लोग 

छोटों के सर पे 

दीर्घायु का आशिर्युक्त 

जल छिड़कते हैं 

फिर दिन भर 

लाठी से धूल माटी 

और पानी से 

मनोरंजन जी भर कर 

शाम के तीन और चार के होते ही 

पिलsखवार [पिक्लक्ष्यवाट]और मंगरौनी

[मंगलबनी]

एक तरफ

मगरपट्टी और खोइर् एक तरफ 

गाँवों के परती जमीन में 

सज जाते हैं आमने सामने 

दो सेनाओं की तरह 

मानवता इंसानियत का परित्याग कर 

अपने ही परिजनों और दोस्तों के बीच 

रोड़े बाजी हो जाती है शुरू 

अब तो वर्षों से 

सरकार ने पुलिस की व्यवस्था कर दी है 

फिर भी इस अमानुषी खेल को 

उठा नहीं सकी 

अब कुछ घायल होते हैं 

कभी कोई प्राणों से हाथ भी धो देते हैं 

ढेले लाठी भाला बल्लम 

बरछी तीर धनुष ढेलबंस 

इतने सारे हथियारों की होड़ 

पीछे से बुजुर्गों का जोश भरा शोर 

कारण जिसके 

लड़ने वालों के पाँव हो नहीं पाते कमजोड़ 

उधर सूर्य अस्तगामी होता 

इधर लोग घरगामी होते हैं 

परम्परा कितनी विचित्र होती है

प्रबुद्ध भी सही को सही 

गलत को गलत नहीं कह पाते 

इस तरह जुर शीतल मनाये जाते हैं  
  
जो भी हो 

परम्परा निभाना भी एक गज़ब अनुभूति है 

अपने अपने शौर्य की स्मृति है !



सुधीर कुमार ' सवेरा ' 

सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

317 . वर्षों बाद

३१७ .


वर्षों बाद  

गया था गांव 

बिन विवाद 

आशियाँ सब वैसे ही थे 

पर रास्ते सुने थे 

कमरों की स्ंख्या 

उतने ही थे 

आदमी घट गए थे 

घर बाहर 

बस वृक्ष रह गए थे 

फल गांव छोड़ चुके थे 

कांतिविहीन चेहरे 

सब के बोझिल मन थे 

गांव तब जवान था 

बचपन जब मेरा नादान था 

किलकारियाँ गांव की 

खामोश हो गयी थी 

बहारें आती थी 

पर खामोश 

गांव की किलकारियाँ  

बड़े बड़े शहरों के 

किसी आत्मा विहीन
घरों मे झोपडों मे कैद थी 

गांव का बचपन 

गांव का अल्हड़पन 
  
सब समाप्त था 

वक्त ने मजबुरी बनकर  

गांव के तन को 

बुढ़ापे से ढँक दिया था |


सुधीर कुमार ' सवेरा ' १७ - ०४ - १९८४ 

316 . युगों युगों शताब्दियों से

३१६ .

युगों युगों शताब्दियों से 

न खत्म होने वाले कालांतरों से 

साँसों का वो कतरा 

शायद भावनाओं मे बहकर 

या लम्हों को 

अपना समझ कर तुने अंक मे 

जॉ अपने भर लिये 

समुद्र ने अपनी गंभीरता 

जब खो दी थी 

जुदा था तभी 

हम दोनों का 

शब्द विहीन सम्बन्ध 

अनकहा अनसुना अनचाहा नहीं 

दो चाहा 

शब्दों की व्याख्या से अलग 

अपना है वो सम्बन्ध |


सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०९ - ०४ - १९८४ 

३ - ४५ pm  

315 . जब भी

३१५.

जब भी 

आया कोई 

तेरे विचारों के आगोश मे 

जोड़कर तुझ से 

अपनापन का रिश्ता 

चाहा लेना 

जैसे ही 

प्रेम का तुझ से मीठा पानी

सब तुझ से दुर चले गए 

जान गए जब 

तू है समुद्र का खारा पानी 

हर बर 

खुद की तेरी पहचान 

खुद को न अपना सकी कभी 

कड़वा कषैला  

तेरा ओछापन 

तेरी उपरी मिठास 

कभी न 

तेरी उपरी पहचान ढाँप पायी |


सुधीर कुमार ' सवेरा ' ११ - ०४ - १९८४ 

७ - ३५ pm 

314 . आशियाँ तुम

३१४ . 

आशियाँ तुम 

अपना बनाकर 

लुत्फ जब 

जिंदगी का 

उठाने लगे 

दिन दो चार भी 

अभी गुजरे न थे

खुद अपने वादों से 

शर्माने लगे 

यादों के मेरे 

दफनाने लगे 

हर ऑर से 

मुझे ही वो 

भुलाने लगे |


सुधीर कुमार ' सवेरा ' ११ - ०४ - १९८४ १०-३० am 

313 . वक्त की तीखी किरणो ने

३१३ .


वक्त की तीखी किरणो ने 

ओठों के 

हँसते शबनमी बुंदों को 

सवेरे की 

लाली देखने से ही पहले 

जला डाला  |


सुधीर कुमार ' सवेरा '

312 .ये है क्लेम एंड प्रिभेन्षन सेक्सन

३१२ .

ये है क्लेम एंड प्रिभेन्षन सेक्सन 

जहां होता नहीं कोई रिपोर्ट मेन्षन 

यदा कदा गर कभी हो जाता इंट्री 

पर हो पता नहीं कभी भ़ी रिकॉभरी 

यह है एक तरह का चेम्बर 

जिसमे रहते पूरे दस मेंबर 

ये सब के सब स्टाफ हैं 

बनाते केवल बात हैं 

इनका केवल एक है काम 

लेते रहना लाटरी का नाम 

ये आफिस क़म कैंटीन है 

काम यहाँ जुर्म संगीन है 

चाय पीते यहाँ दिन बीते 

फाइल यहाँ कोई न खुलते 

डींग हाँकना है इनका काम 

सभी हाँके बस अपना नाम 

किसका किससे क्या चक्कर है 

नमकीन है ओ या शक्‍कड़ है 

काम हो कम बातें ज्यादा 

बस यही एक है इनका नारा 

टेबुल पे सर रख कर सोना 

बस यही दिन भर इनको है करना |


सुधीर कुमार ' सवेरा ' २५ - ०२ - १९८४ 

रविवार, 12 अक्तूबर 2014

311 . एक बार फिर से

३११ .


एक बार फिर से 

तेरे दर पे आ के खुद से 

खुद को जिंदा जला लिया 

अपने ही जख्मों को 

स्वंय कुरेद कर 

फिर से हरा कर लिया 

गम को पी पी कर 

स्वंय को है गला लिया 

तूने तो बेवफाई कर भी
खुद को है बसा लिया 

अपने घर को है संवार लिया 

मैं ही एक नासमझ 

तुझ से वफा कर भी 

खुद को उजाड़ लिया 

गम को पी पी कर 

खुद को गंवा लिया 

तेरे दर पे आ कर 

फिर से एक बार 

अपने जख्मों पे 

नमक है छिड़क लिया |

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २५ - ०२ - १९८४ 

१-०५ am 

शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

310 . खोटी हो तृप्ति

310 .


खोटी हो तृप्ति 

हो जाती है मंद बुद्धि 

हो जाते दरवाजे सब बंद 

ज्यों अशुद्ध हों सरस्वती के छंद |


सुधीर कुमार ' सवेरा ' २५ - ०६ - १९८४

कोलकाता ६.०० pm 


309 .नयी शहर नयी बागवान मुबारक हो तुझे

३०९ . 

नयी शहर नयी बागवान मुबारक हो तुझे 


नयी मंजिल नयी डगर मुबारक हो तुझे 

नयी जिंदगी नया हमसफर मुबारक हो तुझे 

नये दोस्त नया प्यार् मुबारक हो तुझे 

नयी चाह नये कदम मुबारक हो तुझे |


सुधीर कुमार ' सवेरा ' १०-०३-१९८४ कोलकाता 

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

308 . हे माँ विपत्ती मे मेरी रक्षा करो

३०८ .

हे माँ विपत्ती मे मेरी रक्षा करो 

ऐसी शक्ति दो की मैं विपदा से न डरूँ

अगर तुम ने दुख ताप से व्यथित चित मे 

सांत्वना न दी तो कोई बात नहीं 

लेकिन ऐसा करो की मैं दुख पर विजय पा सकूं 

यदि मेरा कोई सहाय न मिले 

तो इतना ही हो की मेरा अपना बल न टूटने पाये 

अगर मेरे संसार का कुच्छ नुकसान हो जाये 

मैं केवल वंचना ही पाऊँ  

तो भी ऐसा हो की मैं अपने मन मे क्षीणता न
 मानूं 
तुम मुझे बचाओ 

यह मेरी प्रार्थना नहीं है 

केवल इतनी शक्ति दो की मैं तैर सकूं 

कोई बात नहीं अगर तुमने मेरा भार हल्का

  करके 

सांत्वना न दी 

केवल ऐसा ही हो की मैं दस भर को ढो सकूं 

सुख के दिनो मे सिर झुका कर तुम्हारा मुंह

पहचान लूंगा 


लेकिन दुख की रात मैं 

जिस दिन सारी पृथ्वी मुझे वंचना कह रही हो 

उस दिन ऐसा हो की तुम्हारे उपर संदेह न करूं 

बस इतनी ही तो अपेक्षा है |


सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०८ - ०९ - १९८४