शनिवार, 15 नवंबर 2014

329 .चंद गोल चिपटे

३२९ 
चंद गोल चिपटे 
खरे आरे तिरछे 
अभिव्यक्ति की रेखा चित्रें 
अव्यवस्थित उटपटांग 
फैले बेतरतीब जाले 
भय , हास्य , करुण , त्रास 
चारों ओर के विम्बित छाये 
भीतर गहरे पैठ कर 
दूर - दूर अँधेरे में जाकर 
लाते जो ढँक - ढँक 
फैलाते अपनों जख्मो से 
सुरभित सौम्य सुगंध 
जख्मो को खरीद - खरीद 
लहुओं को बेच - बेच 
दिल को कुरेद - कुरेद 
अपने को बार - बार छल 
देता जो अर्थ अनेक 
समझा जीवन के अर्थ अनेक 
सांसे जिसकी घुटती रहती 
पल - पल जी - जी कर 
जो मौत खरीदता 
खुद को मिटाकर भी 
औरों के हेतु प्रकाश फैलाता 
उनके ही दीप्त आभा को 
अँधेरी कविता कहा जाता !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २४ - ०४ - १९८४ 
कोलकाता ५ - ४७ pm 

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