रविवार, 15 नवंबर 2015

561 . छठि व्रत ( प्रतिहार षष्ठी )


५६१ 
छठि व्रत ( प्रतिहार षष्ठी )
प्रतिहार पदक दू गोट अर्थ कयल गेल अछि ! एकटा संवादवाहक दोसर सूर्यक रथ ! जहिना नीक समदिया कार्यसाधक होइत अछि तहिना ई व्रत कएला पर लोकक मनोरथक पूर्ति होइत छैक ! दोसर रथ पर जेना सुखसँ बैसल जाइछ तहिना ई व्रत केला सँ सूर्य प्रसन्न होइत छथि !
                                 ई व्रत सप्तमी युक्त षष्ठी करी किन्तु पंचमी युक्त षष्ठी नहीं करी ! सूर्यक पहिल अर्घ  ओहि दिन दी जहिया उदयकालमें कनिओ काल षष्ठी पडैक ! पश्चात सप्तमीओ भ जाइ त छति नहि ! प्रातः काल उदय काल में कनियो काल सप्तमी रहला पर दोसर अर्घ दियनि !
                                 ई सूर्यक पूजा थिक ! साँझ में षष्ठी में पहिल अर्घ आ प्रातःकाल सप्तमीमे दोसर अर्घ देल जाइत अछि ! जे वस्तु साँझ में अर्पित होइत अछि सएह भिनसरमे सेहो ! आरोग्य लाभ एहि व्रतक मुख्य उद्देश्य अछि ! " आरोग्यं भास्करदिच्छेत् " एहि तरहक पुराणक वचन अछि ! तखन सामर्थशाली देवता भक्तक सब मनोरथक पूर्ति करैत छथि ! एहि व्रतमे जाति वा धर्मक बंधन नहि अछि ! महिला पुरुष सभ एहि व्रतक अधिकारी होइत छथि ! देश विदेश में ई व्रत कयल जाइत अछि ! 
                                      ई सूर्यक व्रत अछि ई व्रत कएलासँ व्रतीकेँ सब तरहक मनोरथक पूर्ति होइत अछि ! छठि करयवाला चौठ के नहा क अर्वा - अरवाइन खाइत छथि ! पंचमी दिन दिनभरि उपवास राखि सायंकाल नव चूल्हि पर नव कोहामे अरबा चाउरमे गुड द पायस बनबैत छथि तकरा डालीक अनुसार अथवा एके ठाम उत्सर्ग क अपनो खाइत छथि आ प्रसादो बँटैत छथि ! षष्ठी दिन व्रत करयवाली या वाला सांझुक पहर नित्यक्रिया सं निवृत भ पवित्र वस्त्र पहिर नदी वा पोखरि लग जा सूर्यक मुहे बैसि जतेक गोटाक निमित अर्घ्य देबाक रहैत छनि ततेक डाली , सूप वा ढाकन में अर्घ्य सामिग्री जेना ठकुआ , भुसवा , करा , फल , फूल , पान , सुपारी , धूप , दीप , अंकुरी जुटा लैत छथि ! 
                                   ब्राह्मण आ विधवा कुश तील जल ल आ सधवा दुवि अक्षत ल संकल्प करैत छथि - " नमोअद्य कार्तिक मासीय शुक्ल पक्षीय षष्ठमयां तिथौ ( गोत्रक नाम ल क  ) जनम - जन्मातरार्जित ज्ञाताज्ञात कायिक वाचिक मानसिक सकल पाप क्षयपूर्वक चिरंजीवी पुत्र पौत्रादि गोधन धन्यादि समृद्धि सुख सौभाग्य अवैधव्य सकल कमावाप्ति - काम अद्य प्रातश्च सूर्यायार्धमहं दास्ये !" ई संकल्प करैत छथि ! तखन अक्षत लै - " नमो भगवन सूर्य इहागच्छ इहतिष्ठत " कहि सराइमे अक्षत राखि जल ल - एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीय पुनराचमनीय नमो भगवते श्री सूर्यनारायणाय नमः " कहि जल चढ़ा फूलमे लाल चानन लगा , लाल फूल , दूबि , अक्षत पकवान सहित जल ल के सूर्य के देखैत नमोस्तु सूर्याय नमः ! कहि सब डाली उत्सर्ग क घर चलि अबैत छथि आ पुनः सब सामान उत्सर्ग क कथा सुनैत छथि !  
                               छठि व्रत कथा 
एक समय नैमिषारण्य में सर्वशास्त्रज्ञ शौनक मुनि सूतजी सं जिज्ञासा कयलनि कि एहि पृथ्वी पर जे लोक सब तरहक रोग सँ ग्रस्त अछि , ककरो सन्ताने नहि होइत छैक त ककरो पुत्र अल्पायु में मरि जाइत छैक तकरा लोकनिक दुःखक नाश कोना हेतैक ? सूतजी ताहि पर कहब प्रारम्भ कयलनि ! ठीक इएह बात सत्यव्रती भीष्म पुलस्त्य मुनि सं पूछने छलखिन से हमरा बुझल अछि ! ई कथा कहनाहर आ सुननाहर दुनूक पापक विनाश होइत छैक ! प्राचीन काल में एकटा बलवान आ ईर्ष्यालु दुष्ट क्षत्रिय राजा छलाह ! हुनका पूर्व जन्मक पापे कुष्ट भ गेलनि ! हुनका यक्ष्मा रोग सेहो ध लेलकनि ! ऒ एहन जिंदगी सं मरण नीक बुझि गेलाह ! ठीक ओहि समय में एकटा शास्त्रज्ञ , धर्मात्मा , तेजस्वी ब्राह्मण ओहिठाम पहुँचलाह ! राजा हुनका देखि अत्यंत प्रसन्न भेलाह ! हुनक पूर्ण स्वागत सत्कार कएलनि आ विनम्र भाव सं प्रश्न कैलनि जे हम कुष्ट आ यक्ष्मा रोग सं पीडीत छी ! कियो पुत्र विहीन छैथ ! कोनो व्यक्तिक सन्तान नहि जीवैत छनि ! एहि स्त्रीके पति त्यागि देने छैक ! एहि सभ दुःखक कि निदान ? तखन  ओ ब्राह्मण विचारलनि जे सूर्यदेव लोकक सब तरहक पाप के नाश क आरोग्य प्रदान करैत छथि ! तैं ओ राजा के कहलखिन जे आहांलोकनि सूर्यक व्रत करैत जाउ अवश्य कल्याण होएत ! तखन ओ ब्राह्मण हुनकालोकनिक पञ्चमीक खरनासँ ल सप्तमीक प्रातःकालक अर्घ्य ( छठि व्रतक पूर्ण विधान ) बुझौलनि ! ओ सब ओही तरहे कैलनि तँ सभक क्लेश दूर भ गेलैनि ! तकर बाद एकटा जे नीक वंशक ब्राह्मण दरिद्र , मुर्ख अविवाहित छलाह ओ एके वर्ष ई व्रत कयलनि तँ ओ अत्यंत यशस्वी ओ सुखी भ गेलाह ! ओ राजा सेहो जखन पाँच वर्ष व्रत कएलनि तखन हुनको मंत्री सब अपनामे विचारि राजा लग आबि हुनका अपन सभक अगुआ बना क सेना ल विद्रोहीके मारि भगौलनि आ राजा पूर्व जकाँ निष्कंटक राज्य करए लगलाह ! 
                                     अतः जे केओ ई व्रत कएलनि सब मनवांछित फल प्राप्त कएलनि ! जे केओ ई व्रत क कथा सुनि शक्ति अनुसारे कथावाचककेँ दक्षिणा देती तिनका सब तरहक क्लेश दूर भ जेतनी ! 
                                      कथा सुनलाक बाद पूजित देवताके प्रणाम क विसर्जन क ब्राह्मणके दक्षिणा आ प्रशाद द व्रती पारण करथि !  

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

560 .धनतेरस - श्री लक्ष्मी पूजनोत्सव


५६०
धनतेरस - श्री लक्ष्मी पूजनोत्सव 
समुद्र - मंथन के अंतिम दिन यानी प्रकाश पर्व दीपावली के दो दिन पूर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को पूरे देश में धनतेरस मनाने की परंपरा है ! इस दिन कोई वस्तु - विशेषकर बर्तन या धातु विशेषकर सोना - चांदी खरीदना सगुन होता है ! इस दिन भगवान विष्णु की पूजा किसी लालच में नहीं , बल्कि शुद्ध भाव से करनी चाहिए !
लक्ष्मी से स्थूल तात्पर्य है - अर्थ ! 
लक्ष्मी - पूजा वस्तुतः अर्थ का पर्व है ! गणेश , दीप - पूजन और गौ द्रव पूजन इस पर्व की विशेषतायें हैं ! गोधूलि लग्न में पूजा प्रारम्भ करके महानिशि काल तक महालक्ष्मी के पूजन को जारी रखा जाता है ! 
माँ महालक्ष्मी को आठ चीजें बेहद प्रिय - १ - एक आँख वाला श्रीफल ! २ - शंख ! ३ - कौड़ी ! ४ - कमल गट्टा ! 
५ - चाँदी ! ६ - श्रीयंत्र ! ७ - धनकुबेर ! ८- मोती ! 
वैदिक काल से लेकर वर्तमान काल तक लक्ष्मी का स्वरुप अत्यंत व्यापक रहा है ! ऋग्वेद की ऋचाओं में ' श्री ' का वर्णन समृद्धि एवं सौंदर्य के रूप में हुआ है ! अथर्वेद में पृथ्वी सूक्त में ' श्री ' की प्रार्थना करते हुए ऋषि कहते हैं " श्रिया माँ धेहि " अर्थात मुझे श्री की प्राप्ति हो ! श्रीसूक्त में ' श्री' का आवाहन जातवेदस के साथ हुआ है ! ' जातवेदोमआवह ' जातवेदस अग्नि का नाम है ! अग्नि की तेजस्विता तथा श्री की तेजस्विता में भी साम्य है !
विष्णु पुराण में लक्ष्मी की अभिव्यक्ति दो रूपों में की गई है - श्री रूप और लक्ष्मी रूप ! श्रीदेवी को कहीं - कहीं भू देवी भी कहते हैं ! इसी तरह लक्ष्मी के दो स्वरुप हैं ! सच्चिदानन्दमयी लक्ष्मी श्री  नारायण के ह्रदय में वास करती हैं ! दूसरा रूप है भौतिक या प्राकृतिक संपत्ति की अधिष्टात्री देवी का ! यही श्री देवी या भूदेवी हैं ! सब संपत्तियों की अधिष्ठात्री श्रीदेवी शुद्ध सत्वमयी है ! इनके पास लोभ , मोह , काम , क्रोध और अहंकार आदि दोषों का प्रवेश नहीं है ! यह स्वर्ग में स्वर्गलक्ष्मी , राजाओं के पास राजलक्ष्मी , मनुष्यों के गृह में गृहलक्ष्मी , व्यापारियों के पास वाणिज्यलक्ष्मी और युद्ध विजेताओं के पास विजयलक्ष्मी के रूप में रहती हैं ! 
                                    अष्टसिद्धि और नवनिधि की देवी श्रीलक्ष्मी भौतिक मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं ! कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को जब सूर्य और चन्द्र दोनों तुला राशि में होते हैं , तब दीपावली का त्योहार मनाया जाता है ! इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर की तरंगों पर शयन - गामी होते हैं और श्रीलक्ष्मी भी दैत्य भय से विमुख होकर कमल के उदर में सुख से सोती हैं ! 
भारतीय पद्धति के अनुसार आराधना , उपासना व् अर्चना में आधिभौतिक , आध्यात्मिक और आधिदैविक - इन तीनों रूपों का समन्वित व्यवहार होता है ! दीपावली में सोना - चांदी आदि के रूप में आधिभौतिक लक्ष्मी से संबंध स्वीकार करके पूजन किया जाता है ! घरों को दीपमाला आदि से सुसज्जित करना लक्ष्मी के आध्यात्मिक स्वरुप की शोभा बढ़ाने का उपक्रम है !
                                    देवी की जितनी भी शक्तियां मानी गयी हैं , उन सब की मूल भगवती लक्ष्मी ही हैं ! ये ही सर्वोत्कृष्ट पराशक्ति हैं ! लक्ष्मी नित्य सर्वव्यापक हैं ! पुरुषवाची भगवान हरी हैं और स्त्रीवाची लक्ष्मी ! इनसे इतर कोई नहीं हैं ! 
                                     सामान्यतः दीपावली पूजन का अर्थ लक्ष्मी पूजा से लगाया जाता है , किन्तु इसके अंतर्गत गणेश गौरी , नवग्रह , षोडशमातृका , महालक्ष्मी , महाकाली , महासरस्वती , धनकुबेर , तुला और मान की भी पूजा होती है ! मान्यता है कि ये सभी श्रीलक्ष्मी के साथ अंग - सदृश होते हैं ! 
                                   हिरण्यवर्णां हरिणी सुवर्णरजतस्रजाम ! चन्द्राम हिरण्मयीं , लक्ष्मी जातवेदो मा वह !
ऋग्वेद में ऐश्वर्य और समृद्धि के लिए वैदिक उपासना का विधिवत वर्णन है ! विश्व में प्राचीन सिंधु सभ्यता की खुदाई में दीप लक्ष्मी की खंडित मूर्तियां मिली थी , जो तत्कालीन भारतीय सम्पन्नता और श्री - वैभव की सूचक है ! भारतीय संस्कृति में श्रीलक्ष्मी के अनेक रूप मिलते हैं ! गौ , घोड़े , हाथी , रथ आदि को लक्ष्मी की मान्यता प्राप्त है ! गौ कामधेनु है ! घोड़े अश्वशक्ति , हाथी गजलक्ष्मी और रथ वाहनश्री हैं ! ये क्रमशः कृषि , कल - कारखाने , उद्दोग - धंधे और परिवहन व्यापार के प्रतीक हैं ! : व्यापारे वसति लक्ष्मी " !
                                          ' अहम राष्ट्र संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथम यज्ञियानाम ! तां मा देवा व्यदधुः पुरूत्रा मुरिस्थात्रां भुर्यावेशयन्तीम् ! श्रीलक्ष्मी कहती हैं - मैं ही जगत की लक्ष्मी और धन ऐश्वर्य की देवी हूँ ! 
                                     समस्त जगत में श्रीलक्ष्मी का राज है ! रूद्र , वसु , वरुण , इंद्र , अग्नि आदि रूपों में श्रीलक्ष्मी शोभायमान होती हैं ! वे सभी भूतों में लक्ष्मी के रूप में विराजमान रहती हैं ! ' या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता ' ! सूर्य में उषा लक्ष्मी है , जिसे यूनानी भाषा में अरोरा कहा जाता है ! चन्द्र में ज्योत्सना लक्ष्मी है , जिसे यूनान में डायना कहते हैं ! सागर में नीरजा लक्ष्मी हैं , जिसे निरीड कहते हैं और पृथ्वी में वसुमती रत्नगर्भा के रूप में लक्ष्मी निवास करती हैं ! वसु का अर्थ है धन ! पृथ्वी रत्नो की खान है ! रत्न - गर्भा है ! वह स्वर्ण - गर्भा के साथ - साथ रजत गर्भा और अयस गर्भा है ! विश्व की सारी नारियों में ये रूप गुण और सौंदर्य पाये जाते हैं ! समस्त विश्व की नारियां श्रीलक्ष्मी की संतति है , जो अपनी संस्कृति - सभ्यता और परंपरा का निर्वहन कर रही हैं !
                                      नारी प्रकृति की अद्भुत रचना है ! वह लक्ष्मी की अंश है ! जहाँ लक्ष्मीरूपा नारियां सम्मानित होती हैं , वहां क्षीर सागर से लक्ष्मी प्रकट होती हैं और ओलपिंक पर्वत से रीया , मेयो , लारा सिरिन , प्रासग्रीन आदि अप्सराएं आ जाती हैं !
                                     ईरान में पैरिक देव जाति की नारियां जल लक्ष्मी कहलाती थी ! फ़ारसी में पैरिक परी है , जिसे अप्सरा कहा जाता है ! अप जल का बोधक है , जिसका अर्थ होता है जल में बिहार करने वाली !
                                    समुद्र मंथन से जो चौदह रत्न निकले थे , उनमे श्रीलक्ष्मी के साथ अप्सरा भी थीं ! अप्सरा आधुनिक अरब , ईराक , ईरान की नारियां हैं ! यानि कि वे श्रीलक्ष्मी की संताने हैं ! श्वेतवर्ण नारी यूरोप की पहचान है ! यूरोप में एक श्वेता लक्ष्मी थीं !
                                    यूरोप का नामकरण युरोपा से हुआ है ! युरोपा वैदिकी रूपसी उर्वशी थी ! स्वर्ग की लक्ष्मी शची है , जिन्हे यूनान में हेरा कहा जाता है ! वहां राष्ट्रिय समृद्धि की सूचक है !
                                     भारतीय नारियां श्रीलक्ष्मी को अपना आदर्श मानती हैं ! उनके श्रृंगार , परिधान और रूप सज्जा का अनुकरण करती हैं ! यूरोप की नारियां अपनी सौंदर्य देवी वीनस , निरिड और ओसियाड के परिवेश को अपनाती हैं ! इतालवी युवतियां फेमिना की तरह सजती - संवरती हैं ! इस प्रकार पुरे विश्व में श्रीलक्ष्मी की सौंदर्य - सत्ता हैं ! 
                                    आभूषण - विवाह के समय कन्या सोने के हार , चांदी की माला और अन्य आभूषणों को पहनकर लक्ष्मी स्वरूपा होती हैं , क्योंकि श्रीलक्ष्मी को स्वर्ण और रजत के अलंकार प्रिय होते हैं ! लोक - परंपरा के अनुसार स्वर्ण में श्रीलक्ष्मी निवास करती हैं ! दीपावली के दिन लोग सोने - चांदी की पूजा कर श्रीलक्ष्मी का आवाहन करते हैं !
                                    परिधान - विवाह के समय लक्ष्मी जी ने लाल परिधान यानी चुनरी पहनी थी ! विष्णु जी ने पीला वस्त्र धारण किया था ! आज भी लोक परंपरा में कन्या और वर को क्रमशः लाल और पीला परिधान धारण किये हुए देखा जा सकता है ! 
                                    यूरोप की नारियां श्वेत रंग का परिधान पहनती हैं ! श्वेत रंग शांति का सूचक है ! आशय यह कि विवाहोपरांत दाम्पत्य जीवन में शांति बनी रहे !
                                    अरब , ईराक , ईरान की नारियां हरे रंग की वस्त्र पहनती हैं जो मंगल का प्रतीक है ! 
                                      वाहन - गृह देवी को ज्योतिर्लक्ष्मी का दर्जा मिला है ! वैदिकी श्रीलक्ष्मी के वाहनों का वर्णन ऋग्वेद में है और उसकी परंपरा का पालन आज भी लोकजीवन में पाया जाता है ! बारात में गृहलक्ष्मी की विदाई के लिए हाथी , घोडा , रथ , पालकी का उपयोग होता है ! आज रथ के स्थान पर मोटरकार , बग्घी आदि का प्रचलन है ! श्रीलक्ष्मी के आगे पीछे घोड़े और रथ होते हैं ! हाथी का नाद सुनकर लक्ष्मी प्रसन्न होती है ! 
                                        राजलक्ष्मी के लिए गज , अश्व , कोष , रथ , सैन्य आदि नाम जुड़े हुए हैं ! प्राचीन यूनान में नाइट ( अश्वलक्ष्मी ) की पूजा होती थी ! नारियां घोड़े पर सवार होकर नाइट बनती थीं ! नाइट का मुख घोड़े का है और शेष अंग नारी का ! श्रीलक्ष्मी का मुख चन्द्रमा के समान है ' चन्द्रा प्रभासां - यशसा ज्वलतीम् ' ! वह कमल धारण करती हैं ! ' पद्मे स्थित पद्म वर्णा ' ! 
                                         यूरोप में डायना                 ( चन्द्रलक्ष्मी ) की पूजा होती थी ! ब्रितानी युवतियां अपने मुख का लेपन करती हैं , ताकि वे डायना का स्वरुप बनें ! 
                                        श्रीलक्ष्मी लाल कमल धारण करती हैं ! लाल कमल लक्ष्मी का प्रतीक है ! लाल कमलों से आच्छादित सरोवरों को लक्ष्मी का जल महल मानकर दीपदान किया जाता है ! रंगोली में कमल को उकेरा जाता है ! 
                                      फ़्रांस की फ़्लोरा रंग - बिरंगे फूलों की देवी थीं ! एथेंस की विद्दा देवी मिनर्वा जहाँ अंतर्ध्यान हुई थीं , वहां जैतून उग आया था ! यूनानी नारियां जैतून के फूलों से सजकर मिनर्वा सदृश होती हैं !
                                     दीपावली 
दीपक ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है ! ह्रदय में भरे हुए अज्ञान और संसार में फैले हुए अंधकार का शमन करने वाला दीपक देवताओं की ज्योतिर्मय शक्ति का प्रतिनिधि है ! इसे भगवान का तेजस्वी रूप माना जाता है ! बीच में एक बड़ा घृत दीपक और उसके चारों ओर   ११ - २१ अथवा इससे भी अधिक दीपक प्रज्वलित करें ! दीप जलाने का तात्पर्य है - अपने अंतर को ज्ञान के प्रकाश से भर लेना , जिससे ह्रदय और मन जगमगा उठे ! अंधकार से सतत प्रकाश की ओर बहते रहना ही दीपावली की प्रेरणा है !  वैदिक काल में यज्ञ एक तरह से सांस्कृतिक समारोह थे ! यज्ञ साधारण भी होते थे और असाधारण भी ! कुछ यज्ञों ( अश्वमेघ - राजसूय ) को तो मात्र राजा महाराजा ही कर सकते थे , लेकिन कुछ यज्ञों का संपादन नियमित रूप से आर्य गृहस्थों द्वारा किया जाता था ! गोपद ब्राह्मण के मुताबिक इन यज्ञों में से अग्न्याधान और अग्निहोत्र प्रतिदिन के यज्ञ थे ! अमावस्या और पूर्णिमा के दिन दशपूर्णमास यज्ञ होते थे ! फाल्गुन पूर्णिमा , आषाढ़ पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा को चातुर्मास यज्ञ किये जाते थे ! उत्तरायण - दक्षिणायन के आरम्भ में जो यज्ञ होते थे वे अग्रहायण नवसस्थिष्टि यज्ञ कहलाते थे , जो कालांतर में दीपावली का त्यौहार बन गए ! यज्ञ पर्वों में ही संपन्न होते थे ! पर्व जोड़ या संधि को कहते हैं ! यह संधि पर्व ऋतू और काल संबंधी हुआ करती थी ! सायं - प्रातः , संधि , पक्ष संधि , मास संधि , ऋतू संधि , चातुर्मास संधि , अयन संधि , पर यज्ञ होते थे ! ये संधियाँ पर्व कहाती थी ! यज्ञ समाप्ति पर अवभृथ स्नान होता था ! अब यज्ञों की परिपाटी तो लगभग बंद हो गई हैं , लेकिन पर्वों पर विशेष तीर्थों पर स्नान ध्यान अब भी धर्म - कृत्य माना जाता था ! वैदिक - काल में उत्तरायण और दक्षिणायन का विशद विचार था ! यजुर्वेद में इसका विस्तार से वर्णन है ! दीपावली परिवर्तन से संबंधित त्यौहार है ! इस समय सूर्य दक्षिणायन होते हैं ! साथ ही नयाशस्य धान्य आता है ! इसलिय खील खाई जाती है , तथा दीपोत्सव मनाया जाता है ! दीपावली , जो वास्तव में अयन यज्ञ था , द्रविड़ और आग्न्येय संस्कृतियों से मिलकर श्रीलक्ष्मी का त्यौहार बन गया ! 
                                      जहाँ होती स्वक्षता - सफाई और पवित्रता श्री लक्ष्मी वहीँ जाती ! घर - समाज - देश चारों ओर हो स्वक्षता और सफाई तो श्रीलक्ष्मी दौड़ी चली आयेगी !

रविवार, 25 अक्तूबर 2015

559 . कोजागरा !


५५९ 
कोजागरा
ई पावनि आश्विन शुक्ल पूर्णिमा के मनाओल जाइत अछि ! एहि दिन लोक अपन घर आँगन नीक क नीपैत छैथि ! साँझ में दोआरि परसँ भगवतीक चीनवार तक एकटा अरिपन देल जाइत अछि पिठारसँ तहन भगवतीकेँ लोटाक जलसँ घर करैत छथि ! भगवतीक चिनवार पर कमलक अरिपन द ओहि पर सिंदूर लगा एकटा लोटामें जल भरि राखि ओहि पर आमक पल्लव द तामक सराइमे एकटा चानीक रुपैया राखि ताहि पर लक्ष्मी पूजा करैत छथि ! प्रसाद में अँकुरी , पान , मखान , केरा , मिसरी तथा नारियल भोग लगबैत छथि ! तहन प्रसाद बाँटल जाइछ ! ई कार्य घरक जे प्रसद्धि महिला से करैत छथि ! भगवती घर करक मन्त्र - " अन धन लक्ष्मी घर आउ ! दलिद्रा बाहर जाउ !! "

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

558 .९ - सिद्धिदात्री

५५८ 
९ - सिद्धिदात्री 
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि !
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी !!
माँ दुर्गाजी की नवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है ! ये सभी प्रकारकी सिद्धियों को देनीवाली हैं ! मार्कण्डेयपुराण के अनुसार अणिमा , महिमा , गरिमा , लघिमा , प्राप्ति , प्राकाम्य , ईशित्व और वशित्व - ये आठ सिद्धियाँ होती हैं ! ब्रह्मवैवर्त्यपुराण के श्रीकृष्ण् - जन्मखण्ड में यह संख्या अट्ठारह बतायी गयी है ! इनके नाम इस प्रकार हैं - 
१ - अणिमा २ - लघिमा ३ - प्राप्ति ४ - प्राकाम्य 
५ - महिमा ६ -  ईशित्व , वाशित्व ७ - सर्वकामावसायिता ८ - सर्वगत्व ९ - दूरश्रवण १० - परकायप्रवेशन ११ -वाकसिद्धि १२ - कल्पवृक्षत्व 
१३ - सृष्टि सृष्टि १४ - संहारकरणसामर्थ्य १५ - अमरत्व १६ -सर्वन्यायकत्व १७ - भावना १८ - सिद्धि 
माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं ! देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था ! इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था ! इसी कारण वह लोक में ' अर्धनारीश्वर ' नाम से प्रसिद्ध हुए ! माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं ! इनका वाहन सिंह है ! ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं ! इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में चक्र , ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प है ! नवरात्र - पूजन के नवें दिन इनकी उपासना की जाती है ! इस दिन शास्त्रीय विधि - विधान और पूर्ण निष्ठां के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है ! सृष्टि में कुछ भी उसके लिये अगम्य नहीं रह जाता ! ब्रह्माण्ड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमे आ जाती है ! 
प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरन्तर प्रयत्न करे ! उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो ! इनकी कृपा से अत्यंत दुःख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है ! 
नव दुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं ! अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा - उपासना शास्त्रीय विधि - विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नवें दिन इनकी उपासना में प्रवृत होते हैं ! इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है ! लेकिन सिद्धिदात्री माँ के कृपा पात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है , जिसे वह पूर्ण करना चाहे ! वह सभी सांसारिक इक्षाओं , आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूपसे माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा - रस - पीयूषका निरन्तर पान करता हुआ विषय - भोग - शून्य हो जाता है ! माँ भगवती का परम सानिध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है ! इस परमं पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती ! माँ के चरणों का यह सानिध्य प्राप्त करने के लिए हमें निरन्तर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करनी चाहिये ! माँ भगवती का स्मरण , ध्यान , पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परमशान्तिदायक पद की ओर ले जाने वाला है ! 

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

557 . ८ - महागौरी

५५७ 
८ - महागौरी 
माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है ! इनका वर्ण पूर्णतः गौर है ! इस गौरता की उपमा शंख , चन्द्र और कुन्द के फूल से दी गयी है ! इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गयी है - ' अष्टवर्षा भवेद गौरी ' ! इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं ! इनकी चार भुजाएँ हैं ! इनका वाहन वृषभ है ! इनके उपरके दाहिने हाथ में अभय - मुद्रा और नीचेवाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है ! ऊपरवाले बायें हाथ में डमरू और नीचे के बायें हाथ में वर - मुद्रा है ! इनकी मुद्रा अत्यंत शान्त है ! 
अपने पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शिव को पति - रूप में प्राप्त करने के लिये बड़ी कठोर तपस्या की थी ! इनकी प्रतिज्ञा थी की ' व्रियेहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं महेश्वरात् ' ( नारद पाँचरात्र ) गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार भी इन्होने भगवान शिवके वरण के लिये कठोर संकल्प लिया था - 
                    जन्म कोटि लगि रगर हमारी !
                   बरउँ संभु न त रहउँ कुँआरी !!
इस कठोर तपस्या के कारण इनका शरीर एकदम काला पड़ गया ! इनकी तपस्या से प्रसन्न और संतुष्ट होकर जब भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया तब वह विधुत प्रभा के समान अत्यन्त कान्तिमान - गौर - हो उठा ! तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा ! 
दुर्गा पूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है ! इनकी शक्ति अमोध और सद्यः फलदायिनी है ! इनकी उपासना से भक्तों के सभी कल्मष धुल जाते हैं ! उसके पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं ! भविष्य में पाप - संताप , दैन्य - दुःख उसके पास कभी नहीं आते ! वह सभी प्रकारसे पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है ! 
माँ महागौरी का ध्यान - स्मरण , पूजन - आराधन भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है ! हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिये ! इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है ! मनको  अनन्यभावसे एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिये ! ये भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती हैं ! इनकी उपासना से आर्तजनों के असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं ! अतः इनके चरणों की शरण पाने के लिए हमें सर्वविध प्रयत्न करना चाहिये ! पुराणों में इनकी महिमा का प्रचुर आख्यान किया गया है ! ये मनुष्य की वृतियों को सत की ओर प्रेरित करके असत का विनाश करती हैं ! हमें प्रपत्तिभाव से सदैव इनका शरणागत बनना चाहिये !

रविवार, 18 अक्तूबर 2015

556 . ७ - माँ कालरात्रि


५५६ 
७ - माँ कालरात्रि 
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता !
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी !!
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा !
वर्धन्मूर्धवजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी !!
माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से  जानी जाती है ! इनके शरीर का रंग घने अन्धकारकी तरह एकदम काला है ! सिरके बाल बिखरे हुए हैं ! गले में विद्धुत की तरह चमकनेवाली माला है ! इनके तीन नेत्र हैं ! ये तीनो नेत्र ब्रह्माण्ड के सदृश गोल हैं ! इनसे विध्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं ! इनकी नासिकाके श्वास - प्रश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालाएँ निकलती रहती हैं ! इनका वाहन गर्धव - गदहा हैं ! ऊपर उठे हुए दाहिनी हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं ! दाहिनी तरफ का नीचेवाले हाथ अभयमुद्रा में हैं ! बायीं तरफ के उपरवाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचेवाले हाथ में खड्ग है !
माँ कालरात्रि का स्वरुप देखने में अत्यंत भयानक है , लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देनेवाली हैं ! इसी कारण इनका एक नाम शुभंकरी भी है ! अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है ! 
दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है ! इस दिन साधक का मन सहस्त्रार चक्र में स्थित रहता है ! उसके लिए ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है ! इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरुप में अवस्थित रहता है ! उनके साक्षात्कारसे मिलनेवाले पुण्य का वह भागी हो जाता है ! उसके समस्त पापों - विघ्नों का नाश हो जाता है ! उसे अक्षय पुण्य लोकों की प्राप्ति होती है ! 
माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करनेवाली हैं ! दानव , दैत्य , राक्षस , भूत , प्रेत आदि इनके स्मरणमात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं ! ये ग्रह बाधाओं को भी दूर करनेवाली हैं ! इनके उपासक को अग्नि - भय , जल - भय , जंतु - भय , शत्रु - भय , रात्रि - भय आदि कभी नहीं होते ! इनकी कृपा से   वह सर्वथा भय - मुक्त हो जाता है ! 
माँ कालरात्रि के स्वरुप - विग्रह को अपने ह्रदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उनकी उपासना करनी चाहिये ! यम , नियम , संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिये ! मन , वचन , काया की पवित्रता रखनी चाहिये ! वह शुभंकरी देवी हैं ! उनकी उपासना से होनेवाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती ! हमें निरंतर उनका स्मरण , ध्यान और पूजन करना चाहिये !

शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

555 . ६ - कात्यायनी


५५५ 
६ - कात्यायनी 
चन्द्रहासोज्जवलकरा शार्दूलवरवाहना !
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवधातिनि !!
माँ दुर्गा जी के छटवें स्वरुप का नाम कात्यायनी है ! इनका कात्यायनी नाम पड़ने की कथा इस प्रकार है - कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे !उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए ! इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे ! इन्होने भगवती पराम्बाकी उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी ! उनकी इक्षा थी कि माँ भगवती उनके घर पुत्रीके रूपमें जन्म लें ! माँ भगवतीने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली थी !
कुछ काल पश्चात् जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा , विष्णु , महेश तीनोंने अपने - अपने तेजका अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया ! महर्षि कात्यायनने सर्वप्रथम इनकी पूजा की ! इसी कारण से यह कात्यायनी कहलायीं !
ऐसी भी कथा मिलती है कि  ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूपसे उत्पन्न भी हुई थीं ! आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी , अष्टमी तथा नवमी तक - तीन दिन - इन्होने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था !
माँ कात्यायनी अमोध फलदायिनी हैं ! भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए व्रज की गोपियों ने इन्हींकी पूजा कालिंदी - यमुना के तट पर की थी ! ये व्रजमण्डल की अधिष्ठात्री देवी के रूपमें प्रतिष्ठित हैं ! इनका स्वरुप अत्यंत ही भव्य और दिव्य है ! इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला और भास्वर है ! इनकी चार भुजाएं हैं ! माताजी का दाहिनी तरफ का उपरवाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचेवाले वरमुद्रामें है ! बायीं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचेवाले हाथ में कमल - पुष्प सुशोभित है ! इनका वाहन सिंह है !
दुर्गापूजा के छटवें दिन इनके स्वरुप की उपासना की जाती है ! उस दिन साधक का मन ' आज्ञा ' चक्र में स्थित होता है ! योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है ! इस चक्र में स्थित मनवाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है ! परिपूर्ण आत्मदान करनेवाले ऐसे भक्त को सहज भाव से माँ कात्यायनी के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं ! माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ , धर्म , काम , मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है ! वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है ! उसके रोग , शोक , संताप , भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं ! जन्म - जन्मान्तर के पापों को विनष्ट करने के लिए माँ की उपासना से अधिक सुगम और सरल मार्ग दूसरा नहीं है ! इनका उपासक निरन्तर इनके सान्निध्य में रहकर परमपद का अधिकारी बन जाता है ! अतः हमें सर्वोतोभावेन माँ के शरणागत होकर उनकी पूजा उपासना के लिए तत्पर होना चाहिये !

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

554 .५ - स्कन्दमाता


५५४ 
५ - स्कन्दमाता 
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्व्या !
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी !!
माँ दुर्गाजी के पाँचवें स्वरुप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है ! ये भगवान स्कन्द ' कुमार कार्तिकेय ' नाम से भी जाने जाते हैं ! ये प्रसिद्ध देवासुर - संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे ! पुराणों में इन्हें कुमार और शक्तिधर कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है ! इनका वाहन मयूर है ! अतः इन्हें मयूरवाहन के नाम से भी अभिहित किया गया है ! 
इन्हीं भगवान स्कन्द की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस पांचवें स्वरुप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है ! इनकी उपासना नवरात्रि - पूजा के पांचवें दिन की जाती है ! इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है ! इनके विग्रह में भगवान स्कन्द जी बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं ! स्कन्दमातृस्वरूपणी देवी की चार भुजाएं हैं ! ये दाहिनी तरफ की ऊपरवाली भुजा से भगवान स्कन्द को गोद में पकडे हुए हैं और दाहिनी तरफ की नीचेवाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई है उसमे कमल - पुष्प हैं ! बायीं तरफ की ऊपरवाली भुजा वरमुद्रा में तथा नीचेवाली भुजा जो ऊपरकी ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुईं हैं ! इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है ! ये कमल के आसनपर विराजमान रहती हैं ! इसी कारण से इन्हें पदमासना देवी भी कहा जाता है ! सिंह भी इनका वाहन है !
नवरात्र पूजन के पाँचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्त्व बताया गया है ! इस चक्र में अवस्थित मनवाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है ! वह विशुद्ध चैतन्य स्वरुप की ओर अग्रसर हो रहा होता है ! उसका मन समस्त लौकिक , सांसारिक , मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना माँ स्कंदमाता के स्वरुप में पूर्णतः तल्लीन होता है ! इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिये ! उसे अपनी समस्त ध्यान - वृतियों को एकाग्र रखते हुए साधन के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए !
माँ स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं ! इस मृत्यु लोक में ही इसे परम शान्ति और सुख का अनुभव होने लगता है ! उसके लिए मोक्षका द्वार स्वयमेव सुलभ हो जाता है ! स्कन्दमाता की उपासना से बालरूप स्कन्दभगवान की उपासना भी स्वयमेव हो जाती है ! यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है , अतः साधक को स्कन्दमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए ! सूर्यमण्डल की अधिष्टात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कान्ति से संपन्न हो जाता है ! एक अलौकिक प्रभामण्डल अदृश्यभाव से सदैव उसके चतुर्दिक परिव्याप्त रहता है ! यह प्रभामण्डल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता रहता है ! 
अतः हमें एकाग्रभाव से मन को पवित्र रखकर माँ की शरण में आने का प्रयत्न करना चाहिये ! इस घोर भवसागर के दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है !

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2015

553 . ४ - कूष्माण्डा


५५३ 
४ - कूष्माण्डा 
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च !
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे !
माँ दुर्गाजी के चौथे स्वरुप का नाम कूष्माण्डा है ! अपनी मन्द , हलकी हंसी द्वारा अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से अभिहित किया गया है !
जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था , चारों ओर अंधकार ही अन्धकार परिव्याप्त था , तब इन्हीं देवी ने अपने ' ईषत ' हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी ! अतः यही सृष्टि की आदि - स्वरूपा , आदि शक्ति हैं ! इनके पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व था ही नहीं ! इनका निवास सूर्यमण्डल के भीतर के लोक में है ! सूर्य लोक में निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है ! इनके शरीर की कान्ति और प्रभा भी सूर्य के समान ही देदीप्यमान और भास्वर हैं ! इनके तेज की तुलना इन्हीं से की जा सकती है ! अन्य कोई भी देवी - देवता इनके तेज और प्रभाव की समता नहीं कर सकते ! इन्ही के तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं ! ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है !
इनकी आठ भुजाएँ हैं ! अतः ये अष्ट भुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं ! इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डलु , धनु , बाण , कमल - पुष्प , अमृतपूर्ण कलश , चक्र तथा गदा हैं ! आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है ! इनका वाहन सिंह है ! संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा कुम्हड़े को कहते हैं ! बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय हैं ! इस कारण से भी ये कूष्माण्डा कही जाती हैं !
नवरात्र - पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरुप की ही उपासना की जाती है ! इस दिन साधक का मन ' अनाहत ' चक्र में अवस्थित होता है ! अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचञ्चल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरुप को ध्यान में रखकर पूजा - उपासना के कार्य में लगना चाहिए ! माँ कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग - शोक विनष्ट हो जाते हैं ! इनकी भक्ति से आयु , यश , बल और आरोग्य की वृद्धि होती है ! माँ कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होनेवाली हैं ! यदि मनुष्य सच्चे ह्रदय से इनका शरणागत बन जाये तो फिर उसे अत्यंत सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती हैं ! 
हमें चाहिए कि हम शास्त्रों - पुराणों में वर्णित विधि - विधान के अनुसार माँ दुर्गा की उपासना और भक्ति के मार्गपर अहर्निश अग्रसर हों ! माँ के भक्ति - मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है ! यह दुःख स्वरुप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है ! माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग हैं ! माँ कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधियों - व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख , समृद्धि और उन्नति की ओर ले जानेवाली हैं ! अतः अपनी लौकिक - पारलौकिक उन्नति चाहनेवालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए ! 

बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

552 . ३ - चन्द्रघण्टा

५५२ 
३ - चन्द्रघण्टा 
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चन्द्कोपास्वकैर्युता !
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता !!

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम ' चन्द्रघण्टा ' है ! नवरात्रि - उपासना में तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन आराधन किया जाता है ! इनका यह स्वरुप परम शान्तिदायक और कल्याणकारी है ! इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है , इसी कारण से इन्हें चन्द्रघण्टा देवी कहा जाता है ! इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है ! इनके दस हाथ हैं ! इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि विभूषित हैं ! इनका वाहन सिंह है ! इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्दत रहने की होती है ! इनके घण्टे की सी भयानक चाँद ध्वनि से अत्याचारी दानव - दैत्य - राक्षस सदैव प्रकम्पित रहते हैं !
नवरात्र की दुर्गा - उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्त्व है ! इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है ! माँ चन्द्रघण्टा की कृपा से उसे अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं ! दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनायी देती हैं ! ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं ! 
माँ चन्द्रघण्टा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएं विनष्ट हो जाती हैं ! इनकी आराधना सद्यः फलदायी हैं ! इनकी मुद्रा सदैव युद्ध के लिए अभिमुख रहने की होती है , अतः भक्तों के कष्ट का निवारण ये अत्यंत शीघ्र कर देती हैं ! इनका वाहन सिंह है अतः इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है ! इनके घण्टे  की ध्वनि सदा अपने भक्तों की प्रेत - बाधादि से रक्षा करती रहती हैं ! इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घण्टे की ध्वनि निनादित हो उठती है ! 
दुष्टों का दमन और विनाश करने में सदैव तत्पर रहने के बाद भी इनका स्वरुप दर्शक और आराधक के लिए अत्यंत सौम्यता एवं शान्ति से परिपूर्ण रहता है ! इनकी आराधना से प्राप्त होनेवाला एक बहुत बड़ा सद्गुण यह भी है कि साधक में वीरता - निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का भी विकास होता है ! उसके मुख नेत्र तथा सम्पूर्ण काया में कान्ति - गुण की वृद्धि होती है ! स्वर में दिव्य अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है ! माँ चन्द्रघण्टा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शान्ति और सुख का अनुभव करते हैं ! ऐसे साधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है ! यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखलायी नहीं देती , किन्तु साधक और उसके सम्पर्क में आनेवाले लोग इस बात का अनुभव भलीभांति करते रहते हैं ! 
हमें चाहिये कि अपने मन , वचन , कर्म एवं काया को विहित विधि विधानके अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके माँ चन्द्रघण्टा के शरणागत होकर उनकी उपासना - आराधना में तत्त्पर हों ! उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं ! हमें निरन्तर  उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिये ! उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति को देनेवाला है !   

रविवार, 11 अक्तूबर 2015

551 . २ - ब्रह्मचारिणी



                     फोटो गूगल से साभार 
५५१ 
२ - ब्रह्मचारिणी 
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू  !
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिणियनुत्तमा !!
माँ दुर्गा की नव शक्तियों का दूसरा स्वरुप ब्रह्मचारिणी का है ! यहाँ ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या है ! ब्रह्मचारिणी अर्थात तप की चारिणी - तप का आचरण करनेवाली ! कहा भी है - वेदस्तत्वं तपो ब्रह्म - वेद , तत्व और तप ब्रह्म शब्द के अर्थ हैं ! ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरुप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है ! इनके दाहिने हाथमे जपकी माला एवं बायें हाथ में कमण्डलु रहता है !
अपने पूर्वजन्म में जब ये हिमालय के घर पुत्री - रूप में उत्पन्न हुई थीं तब नारद के उपदेश से इन्होने भगवान शंकर जी को पति - रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन तपस्या की थी ! इसी दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया ! एक हजार वर्ष उन्होंने केवल फल मूल खाकर व्यतीत किये थे ! सौ वर्षों तक केवल शाकपर निर्वाह किया था ! कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखते हुए खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के भयानक कष्ट सहे ! इस कठिन तपश्चर्या के पश्चात तीन हजार वर्षों तक केवल जमीन पर टूटकर गिरे हुए बेलपत्रों को खाकर वह अहर्निश भगवान शंकर की आराधना करती रहीं ! इसके बाद उन्होंने सूखे बेलपत्रों को भी खाना छोड़ दिया ! कई हजार वर्षों तक वह निर्जल और निराहार तपस्या करती रहीं ! पत्तों को भी खाना छोड़ देने के कारण उनका एक नाम अपर्णा भी पड़ गया !
कई हजार वर्षों की इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का वह पूर्वजन्म का शरीर एकदम क्षीण हो उठा ! वह अत्यंत ही कृशकाय हो गयीं थी ! उनकी यह दशा देखकर उनकी माता मेना अत्यंत दुःखित हो उठीं !उन्होंने उन्हें उस कठिन तपस्या से विरत करने के लिए आवाज दी ' उ मा ' अरे ! नहीं , ओ ! नहीं ! तबसे देवी ब्रह्मचारिणी का पूर्वजन्म का एक नाम उमा भी पड़ गया था ! 
उनकी इस तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया ! देवता ऋषि , सिद्धिगण , मुनि सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूतपूर्व पूर्णकृत्य बताते हुए उनकी सराहना करने लगे ! अंतमे पितामह ब्रह्माजी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें सम्बोधित करते हुए प्रसन्न स्वरों में कहा - हे देवि ! आजतक किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की थी ! ऐसी तपस्या तुम्हीं से संभव थी ! तुम्हारे इस अलौकिक कृत्य की चतुर्दिक सराहना हो रही है ! तुम्हारी मनोकामना सर्वोतोभावेन परिपूर्ण होगी ! भगवान चंद्रमौलि शिव जी तुम्हे पति रूप में प्राप्त होंगे ! अब तुम तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ ! शीघ्र ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं ! 
माँ दुर्गा जी का यह दूसरा स्वरुप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देनेवाला है ! इनकी उपासना से मनुष्यमें तप , त्याग , वैराग्य , सदाचार , संयम की वृद्धि होती है ! जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता ! माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है ! दुर्गापूजा के दूसरे दिन इन्हींके स्वरुप की उपासना की जाती है ! इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होता है ! इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है !   

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2015

550 . माँ दुर्गाजी इस सृष्टि की आदि शक्ति हैं !



                              साभार - गूगल 
५५० 
माँ दुर्गाजी इस सृष्टि की आदि शक्ति हैं ! पितामह ब्रह्माजी , भगवान विष्णु और भगवान शंकरजी उन्हीकी शक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति , पालन पोषण और संहार करते हैं ! अन्य देवता भी उन्हीकी शक्तिसे शक्तिमान होकर सारे कार्य करते हैं ! माँ दुर्गाजी के नव रूप हैं ! उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं ----
१ - शैलपुत्री 
२ - ब्रम्ह्चारणी 
३ - चंद्रघंटा 
४ - कुष्मांडा 
५ - स्कंदमाता 
६ - कात्यायनी 
७ - कालरात्रि 
८ - महागौरी 
९ - सिद्धिदात्री !
माँ दुर्गाजी द्वारा ये नव रूप धारण किये जानेके विविध हेतु हैं ! दुर्गापूजाके अवसरपर इन नव रुपोंकी पूजा - उपासना विधि - विधानके साथ की जाती है ! हमें माँ के इन नव रुपोंसे परिचित होना चाहिए ! इन रुपोंके पीछे निहित तात्विक अवधारणाओंका परिज्ञान हमारे धार्मिक , सांस्कृतिक , सामाजिक , विकासके लिए अपरिहार्य रूपसे आवश्यक है !
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१ - शैलपुत्री 
वन्दे वांछितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम !
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् !!

माँ दुर्गा अपने पहले स्वरुप में " शैलपुत्री " के नाम से जानी जाती हैं ! पर्वतराज हिमालयके वहाँ पुत्रीके रूपमे उत्पन्न होनेके कारण इनका यह " शैलपुत्री " नाम पड़ा था ! वृषभ - स्थिता इन माताजीके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल - पुष्प सुशोभित हैं ! यही नव दुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं !अपने पूर्वजन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं ! तब इनका नाम सती था ! इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था ! एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया ! इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना - अपना यज्ञ - भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया ! किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यग में निमंत्रित नहीं किया ! सती ने जब सुना की हमारे पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं , तब वहां जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा ! अपनी यह इक्षा उन्होंने शंकर जी को बतायी ! सारी बातों पर विचार करनेके बाद उन्होंने कहा - " प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं ! अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है ! उनके यज्ञ - भाग भी उन्हें समर्पित किये हैं , किन्तु हमें जान बूझकर नहीं बुलाया है ! कोई सूचनातक नहीं भेजी है ! ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेष्कर नहीं होगा ! शंकर जी के इस उपदेशसे सती का प्रबोध नहीं हुआ ! पिता का यज्ञ देखने , वहां जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी ! उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जानेकी अनुमति दे दी !
सती ने पिता के घर पहुँच कर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात - चीत नहीं कर रहा है ! सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं ! केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया ! बहनो की बातों में व्यंग और उपहास के घाव भरे हुए थे ! परिजनों के इस व्यव्हार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुंचा ! उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकर जी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है ! दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे !यह सब देख कर सती का ह्रदय क्षोभ , ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा ! उन्होंने सोंचा भगवान शंकर जी की बात न मान , यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है ! 
वह अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं ! उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जला कर भस्म कर दिया ! व्रजपात के समान इस दारुण - दुःखद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया ! 
सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया ! इस बार वह ' शैलपुत्री ' नाम से विख्यात हुई ! पार्वती , हेमवती भी उन्ही के नाम हैं ! उपनिषद की एक कथा के अनुसार इन्हीने हेमवती स्वरुप से देवताओं का गर्व - भंजन किया था !
' शैलपुत्री ' देवी का विवाह भी शंकर जी से ही हुआ ! पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी वह शिवजी की अर्धांग्नी बनी ! नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्त्व और शक्तियाँ अनन्त हैं ! नवरात्र - पूजन में प्रथम दिवस इन्ही की पूजा और उपासना की जाती है ! इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं ! यहीं से उनकी योगसाधना का प्रारम्भ होता है ! ----------- साभार   

बुधवार, 2 सितंबर 2015

549 .बचपन का गाँव क्यों इतना याद आता

                                    यादें 
( रक्षा बंधन के पावन अवसर पर बेटे उज्जवल सुमित और बिटिया सिद्धिदात्री )
५४९ 
बचपन का गाँव क्यों इतना याद आता 
जबकि सड़कें और घर थे बेहद कच्चे 
हर साल छपड़ परते थे छाड़ने 
सामने कुंआं था नहाने धोने को पोखर थे 
विकसित हुआ गाँव कुंएं मूंदे गए 
घर और सड़कें हो गए पक्के 
मोटर और टंकी लग गए घरों में 
टीवी कम्प्यूटर से हो गए लैस 
टूट गए पोखर के कछाड़ 
पानी हो गए कीचड़ समान
जहाँ हर नर नारी बच्चे बूढ़े थे नहाते 
आज पता नहीं क्यों वो बचपन के गाँव बहुत याद आते 
इसी पोखर में था तैरना सीखा 
बचपन में यहीं संस्कार भी थे मिलते 
जब बड़े बुजुर्गों को संध्या करते थे देखते  
विकास के दौड़ में जल संरक्षण को भूले 
कल को बोरिंग कहाँ से चलेंगे क्यों नहीं समझते 
घर और सड़कों की तरह दिल में भी कंकर पत्थर हैं भरते 
पता नहीं क्यों वो गाँव आज याद बहुत हैं आते !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०४ -०२ - २०१३ 
१० - ०८ pm  

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

548 . बड़े ही कठिन हैं पर ऐ पग तूँ बढे चलो

                                      यादें 
( बेटा उज्जवल सुमित बिटिया सिद्धिदात्री के पाणी ग्रहण के सुअवसर पर अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए )
५४८
बड़े ही कठिन हैं पर ऐ पग तूँ बढे चलो 
नजर अपनी तूँ चारों तरफ गड़ाए रखो 
तुम्ही से आएगा नव विहान 
बस धैर्य तुम अपना बनाये रखो 
मत खोने दो अपनी चेतनता 
बस हौसला बनाये रखो 
तुम सुभाष , आजाद , भगत के वंशज 
बस नस नस में बिजली फड़काए रखो 
महाराणा प्रताप सरीखे तुम 
विपदाएँ क्या बिगाड़ लेंगी तेरा 
चाणक्य की तरह मूल से भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंको 
बस पग को न थकने दो हौसला बनाये रखो 
अपमान और दुत्तकार पीओ नीलकंठ की तरह 
समाज को गर्त में जाने से पर रोक लो 
तीता खट्टा मीठा स्वाद मत देखो 
बस लोहे के चने चबाये जाओ 
सबों को साथ ले इस महासंग्राम को विजयी करो 
बस पग को न थकने दो हौसला बनाये रखो !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०३ - ०२ - २०१३ 
७ - ३० pm  

सोमवार, 31 अगस्त 2015

547 . मेरा अनुभव रोहतांग पास से रामेश्वरम तक

                             यादें 

( बेटा उज्जवल सुमित बिटिया सिद्धिदात्री के विवाह में


 अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए )


५४७


मेरा अनुभव रोहतांग पास से रामेश्वरम तक 


कहता है यही कि आम जनता है बेहद सज्जन और 


ईमानदार


कुछ मुटठी भर लोग समाज से लेकर राजनीतिक 


तक 


हैं नपुंसक लालची कायर भ्रष्ट लाचार और कमजोर 


जिसका है चहुँ ओर शोर जो दिख रहा चारों ओर 


ऐसा नहीं समाज अपना किसी ओर 


  

पर मानव मन पर पड़ता है इसका असर 

जो दिखता है वैसा ही लगता है हर ओर 


गर जो होती थोड़ी जनतांत्रिक और संवेदनशील 


सरकार 


तततक्षण होती शख्त कार्रवाई आर या पार 


ऐसे असफल नेता जी करते जब हम पर शासन  


पर दुर्दिन के मारे हमारे भाग्य हाय रे लाचार 


जिसे हमने अपने हाथों से ही कर डाला है ताड़  - ताड़ 


वर्ना हम अभी तक यूँ आंसू न बहाते होते 


कोई जंतर मंतर पर यूँ न भूखों मरते होते 


समाज में सच बोलने वाले यूँ न मारे - मारे फिरते


ब्रिटिश कालीन पुलिसिया कानून इतने सारे 


इस लोकतंत्र को कभी मिलेगा क्या न्याय नहीं 


वो तो था शासक और शासन के प्रति भय पैदा करने 


के लिए


अब तो चाहिए जनता की रक्षा और सम्मान के लिए !





सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०६ - ०१ - २०१३ 



२-३० pm  

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

546 . रात भर सो नहीं पाया

                                     यादें
( बेटा उज्जवल सुमित बिटिया सिद्धिदात्री के विवाह में अपने कर्तव्य का निर्वहन करते  हुए )
५४६
रात भर सो नहीं पाया 
व्यवस्था पर दिल कचोटता रहा मन मसोसता रहा 
ढाई घंटे जनता ने ढाई घंटे व्यवस्था ने 
गर जो बर्बाद न किये होते 
आज दामनी भी हमारे साथ होती 
तुर्रा उसपे चिंतक बड़े - बड़े  
खोज रहे हैं ईलाज खड़े - खड़े 
विषबेल के पत्ते - पत्ते डाली - डाली 
हैं सारे के सारे सड़े गले पड़े 
जड़ किसी को भला दीखता क्यों नहीं 
हैं जहाँ लालच भ्रष्टाचार के मट्ठे पड़े 
कुछ कहते जेंडर ही जेंडर का भला करेंगे 
कुछ कहते जाति ही जाति का भला करेंगे 
पर देखा हमने जेंडर ने कैसा इंसाफ किया 
दरिंदों ने तो मरने की हालत में सिर्फ था ला छोड़ा 
अव्यवस्था ने तो उसे पूरी तरह से मार ही डाला
कोई हो जाति कोई हो धर्म कोई हो लिंग 
फर्क इससे नहीं पड़ता है कोई 
कितना है इंसान वो कर्तव्यनिष्ठ ईमानदार 
इंसाफ इससे है मिलता किसी को !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०५ - ०१ - २०१३ 
०१ - १६ pm   

बुधवार, 26 अगस्त 2015

545 . पूछते हो हम व्यवस्था विरोधी हैं

                                    यादें
( बेटा उज्जवल सुमित छठ पूजा के अवसर पर )
५४५ 
पूछते हो हम व्यवस्था विरोधी हैं 
तो हैं हम व्यवस्था विरोधी हैं 
पूछते हो क्या संविधान में भरोसा नहीं 
तो है हमें संविधान में पूरा भरोसा है 
भरोसा नहीं है तो उसके आड़ में तुम्हारी अव्यवस्था पर 
तुम्हे तो इतनी सुविधा मिल गयी है न्यारी 
कि जाकर अमेरिका के वालमार्ट से भी 
खरीदारी कर लो तुम सारी 
पर देखा भी है कभी गरीबी और ग़ुरबत 
कैसे जिन्दा हैं तेरे शोषण के कारण 
वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा नहीं चलेगा 
एक विशाल गरीब भारत तूने पैदा कर दिया 
वो फ़ौज गरीबी की बढ़ी तो छिपने की भी जगह नहीं मिलेगी 
हो जाओ तैयार गरीबों ने अब पाञ्चजन्य शंख फूंक दिया 
भ्रष्टाचार के तवे पर रोटी सेंक मकान बनवा दिया 
ठिकाने का इंतजाम नहीं जिंदगी भर की पूंजी और आशियाँ उजाड़ दिया 
शोर है बहुत कि कुछ करोड़ों में हो गया सौदा 
हम ऐसे बने सौदा कि बहुत सस्ते में बिक गए 
सौदागर ही निकले अपनों से कुछ भले 
कुछ तो मोल लगाया उन्होंने 
अपने नेता तो बेमोल ही बेच डाला दे के धोखा 
पहले 
साईं  इतना दीजिये जा में कुटुंब समाये 
मैं भी भूखा ना रहूँ साधू भूखा न जाये 
 अब 
साईं इतना दीजिये जा में टाटा अम्बानी समाये 
मैं राजा बन जाऊं बाँकी सब भूखो मर जाये ! 

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ३१ - १२ - २०१२ 
१० - ३५ pm 

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

544 . गुलाम थे पर ईमान था

                                     यादें
( धर्म पत्नी जी बिटिया एवं बेटे उज्जवल सुमित दिवाली की तैयारी में )
५४४ 
गुलाम थे पर ईमान था 
आजाद हुए और बेईमान हो गए 
गद्दारों ने ही गुलाम बनाया था 
हो कर आजाद बेच रहे सब कुछ 
पूरी आजादी से जो कुछ अपना था 
जमीन बेच रहे खनिज बेच रहे 
इंसान बेच रहे ईमान बेच रहे 
ऐ खरीदारों आओ हम वतन बेच रहे 
गरीब बेच रहे मजदुर बेच रहे 
आम अवाम किसान बेच रहे !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०५ - १२ - २०१२ 
०८ - १५ pm  

फिर इतने भ्रष्टाचार का क्या है कारण 
बस इतना ही कि मनुष्य चुनने का 
आजतक नहीं कर पाये नवजागरण !
०१ - १२ - २०१२ 
०६ - ५० pm 
दुःख दर्द के साये में कट रही है जिंदगी ऐसे 
जैसे हों ठूंठ बरगद के कोटरे में अपना आशियाँ  !
०३ - १२ - २०१२ 
०९ - १५ am 
जहाँ ठोस सबूतों और स्व स्वीकृति पर भी 
किसी देशद्रोही आतंकवादी निर्मम हत्यारे को भी 
सजा देने में लग जाते हों वर्षों वर्ष 
वहां हम उम्मीद लगाये बैठे हैं 
भ्रष्ट नेताओं को इसी जन्म में मिलेगी सजा यार !

जो सरकार एक ईमानदार I R S को भी 
कहती हो बार - बार गन्दी नाली का कीड़ा 
सोंचो जरा वहां यारों 
एक आम गरीब आदमी के लिए होगा कौन सा विशेषण धरा ?

दुःख दर्द के निर्मम थपेड़ों ने 
छिन्न भिन्न कर डाली मेरी सौम्यता ! ४ - १२ - २०१२ 
१० - ०० am 

दोस्त बनाकर अपना आपने जो दिया सम्मान 
जानकर हजार मेरी बुराईयाँ छोड़ न देना मेरा साथ !

राष्ट्र का सम्मान हो कैसे राष्ट्र भाषा का करके अपमान 
राष्ट्रिय पंचायत में विदेशी भाषा का कर रहे सम्मान !
०५ - १२ - २०१२ 

विदेशी भाषा से खोज रहे हम अपना राष्ट्रिय समाधान 
जानत नहीं जिसे आम अवाम गरीब मजदुर और किसान !

सुधीर कुमार ' सवेरा '

सोमवार, 24 अगस्त 2015

543 . नव चेतना नव विहान

                                     यादें 
     ( बेटे उज्जवल सुमित दिवाली की तैयारी में )
५४३ 
नव चेतना नव विहान
कितना कहें कितना समझाएं 
आपको अपना जान
जानत सकल जहान 
पकड़ ईमानदारी का पथ 
करें भविष्य निर्माण 
लूट रहे मिल लूटेरे हमको 
सबक ईमानदारी का समझाओ उनको 
बैठे - बैठे दिन रेन बीते अनेकों 
कमजोड़ जानकर ही वे सताते हैं हमको 
दौलत कुर्सी के भूखे भेड़ियों 
कौड़ियों के मोल समझाने आ रहे आपको 
घड़ा पाप का छल छला रहा 
हैवानियत सीमा पार जा रहा 
भीड़ ही नहीं केवल बदलते सूरत 
घड़ बैठे भी लेंगे तेरी खैरियत 
बस आपस में नहीं है लड़ना झगड़ना 
अपनी भावनाओं से मत उनको खेलने देना 
धरना प्रदर्शन आन्दोलनों का दौड़ 
बस यूँ ही चलता रहे हर ओर 
क्रांति की धार न पड़े मध्यम 
बांकी इतिहास बदलने में हम हैं सक्षम 
बस इतना रहे ध्यान 
हो जिसका शुद्ध विचार 
हो निष्कलंक जीवन 
हो मन में अपार त्याग 
हो रखता अपमान सहने की शक्ति अपार 
बस ऐसे ही व्यक्ति का रखें ध्यान 
जो बनाये लोकतंत्र की अगली सरकार !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २९ - ११ - २०१२ 
७ - ५७ pm   

रविवार, 23 अगस्त 2015

542 . तेरा सच बोलना तौबा तौबा

                                    यादें
          ( बेटे उज्जवल सुमित का जन्मदिन )
५४२ 
तेरा सच बोलना तौबा तौबा 
तेरा सच लिखना तौबा तौबा 
तेरा सच देखना तौबा तौबा 
तेरा सच सुनना तौबा तौबा 
तेरा सच पढ़ना तौबा तौबा 
तेरा सच को पसंद करना तौबा तौबा 
सच मत सुनो 
सच मत कहो सच मत देखो 
सच से तोड़ो नाता रिश्ता 
सच हुआ अब जान लेवा 
सच से जाती अब नौकरी 
सच से जाते लोग अब जेल 
देखो भाई सच का ये खेल 
ये कैसा सत्यमेव जयते !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २८ - ११ - २०१२ 
६ - ३५ pm  

शनिवार, 22 अगस्त 2015

541 . पूछा जो फुटपाथ पे किसी से कहाँ है सरकार

                                     यादें 
              ( बेटे उज्जवल सुमित का जन्म दिन )
५४१ 
पूछा जो फुटपाथ पे किसी से कहाँ है सरकार 
कहा किसी ने B M W में आते हैं सरकार 
राहगीरों बदनसीबों को कुचल जाते हैं सरकार 
चाहते हो जिंदगी तो कहीं और जाओ 
यहाँ बेमौत मार देते हैं सरकार 
पूछा जो अस्पतालों में किसी से कहाँ है सरकार 
कहा किसी ने चले जाओ यहाँ से 
कहीं छत गिर पड़ेगी और मर जाओगे मेरे सरकार 
देखा जो एक रोज मॉल तो लगा यहीं है सरकार 
हर तरफ माल उड़ाते दिख रहे थे सरकार 
देखा जो एक रोज बियर बार डांस बार 
हर तरफ माल लुटाते दिख रहे थे सरकार 
वाह - वाह मेरी सरकार हाय -  हाय मेरी सरकार !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १६ - ११ २०१२ 
०६ - ३२ pm 

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

540 . सनातन सत्य

                                      यादें
             ( बेटे उज्जवल सुमित का जन्म दिन )
५४० 
सनातन सत्य 
बीत गया जीवन आधा सोने में 
आधे को बिगाड़ दिया लड़ने झगड़ने में पाने खोने में 
यह दुर्लभ जीवन यूँ ही न जाये निरुद्देश्य रीत 
करें अमृत साधना शक्ति सृजन प्रेरणा उत्साह से प्रीत 
न खुद कर पाये इन अमोध शक्तियों से प्राप्त आनंद 
न ही कर पाये कुछ भी औरों के कोई कार्य सिद्ध 
सब कुछ पाकर सब कुछ खो देना 
अज्ञानता के मद में क्या खोना क्या पाना 
पाकर सब कुछ न मिलने से ज्यादा बद्द्तर हो गया 
मूढ़तावश सब कुछ धूल धूसरित हो गया 
जीवन में जीती हुई सारी बाजी हार गए 
जिसके लिए आये थे वही मंतव्य भूल गए 
जाना था कहाँ , कहाँ था गंतव्य 
रास्ता भूल किधर को चले और कहाँ पहुँच गए 
आज जो मेरा है कल किसी और का 
आज के बाद कल किसी और का 
क्षण - क्षण कमाकर पल - पल गंवाकर बचाया क्या 
छल - कपट झूठ - फरेब ईर्ष्या - द्वेष से पाया क्या 
बचाने और अधिक पाने की चाह में 
पेट भर कभी खाया नहीं 
जब भूख थी तो भोजन पाया नहीं 
अब जब भूख है तो मुंह में दांत नहीं 
डाक्टरों ने भी दी खाने की इजाजत नहीं 
फिर क्यों जोड़ा किसके लिए बचाया 
कहावत है पूत कपूत तो धन क्यों संचय 
पूत सपूत तो धन क्यों संचय 
जो जोड़ा कमाया बचाया 
उपरवाले बस उसका चौकीदार बनाया 
गर जो कुकर्मो से कमाया 
उसी रास्ते से है निकल जाना 
जो दिख रहा वही तो है माया 
पाकर जिसको है खोया सब मोह माया 
आनंद तलाशना उसमे डूबे रहना 
अकारण पीड़ा से बचना तो है बस ज्ञान कमाना 
संसार में पीड़ा और पश्चाताप के अलावा क्या 
समझो और समझाओ ज्ञान रस के सिवा उपाय क्या ?

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २० - १० - २०१२ 
११ - १८ am  

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

539 . जिस मूर्ति को पूज्य बनाता

                                      यादें
              ( बेटे उज्जवल सुमित का जन्म दिन ) 
५३९ 
जिस मूर्ति को पूज्य बनाता 
वही यारों धोखा दे जाता 
इस वकील / जज का बड़ा मन में सम्मान था 
स्वार्थ उनका वो जाने 
इस उम्र में विवशता वो माने 
ऐसे लोग भी करें थेथरोलॉजी 
तो हम जैसे क्या कह पाएंगे जी 
अंधेर नगरी चौपट राजा 
टके सेर खाजा टके सेर भाजा 
जिसने अपना कर्तव्य निभाया ( चैनल / पत्रकार )
जिसने लूट खसोट मचाया 
अपाहिजों का भी हक़ मार गया 
हो तो हो सबकी मलामत 
ताकि रह पाये चोर की इज्जत सलामत !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १५ - १० - २०१२ 
१० - ०९ pm