शनिवार, 23 मई 2015

493 . माँ काली

४९३ 
माँ काली 
मारा तुमने मधु कैटभ 
क्यों न हरती मेरा कष्ट 
विषय वासनाओं के मधु पर 
भटक रहा मेरा तन मन 
कितने असुर मेरे मन में 
कितने बसते मेरे तन में 
राग द्वेष की ज्वाला में 
रह न पाती बुद्धि वश में 
काले भुजंग की नैया 
लगती मुझको शीतल शैया 
कैसे पहुँचाऊँ तुझ तक 
व्यथा कथा मैं दीन - हीना 
ओ ! कृपालु करुणामयी माँ 
राह मैं तेरी तकूँ 
कण - कण में तुझको निहारूं 
एक भ्रम एक वहम 
मेरे अंतर में हो उपजाती 
मेरे ये मधु कैटभ माँ 
अब तुम्ही इन्हे सम्भालो 
अपने चरणो में मुझे लगालो !

सुधीर कुमार ' सवेरा '

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