बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

552 . ३ - चन्द्रघण्टा

५५२ 
३ - चन्द्रघण्टा 
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चन्द्कोपास्वकैर्युता !
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता !!

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम ' चन्द्रघण्टा ' है ! नवरात्रि - उपासना में तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन आराधन किया जाता है ! इनका यह स्वरुप परम शान्तिदायक और कल्याणकारी है ! इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है , इसी कारण से इन्हें चन्द्रघण्टा देवी कहा जाता है ! इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है ! इनके दस हाथ हैं ! इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि विभूषित हैं ! इनका वाहन सिंह है ! इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्दत रहने की होती है ! इनके घण्टे की सी भयानक चाँद ध्वनि से अत्याचारी दानव - दैत्य - राक्षस सदैव प्रकम्पित रहते हैं !
नवरात्र की दुर्गा - उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्त्व है ! इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है ! माँ चन्द्रघण्टा की कृपा से उसे अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं ! दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनायी देती हैं ! ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं ! 
माँ चन्द्रघण्टा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएं विनष्ट हो जाती हैं ! इनकी आराधना सद्यः फलदायी हैं ! इनकी मुद्रा सदैव युद्ध के लिए अभिमुख रहने की होती है , अतः भक्तों के कष्ट का निवारण ये अत्यंत शीघ्र कर देती हैं ! इनका वाहन सिंह है अतः इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है ! इनके घण्टे  की ध्वनि सदा अपने भक्तों की प्रेत - बाधादि से रक्षा करती रहती हैं ! इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घण्टे की ध्वनि निनादित हो उठती है ! 
दुष्टों का दमन और विनाश करने में सदैव तत्पर रहने के बाद भी इनका स्वरुप दर्शक और आराधक के लिए अत्यंत सौम्यता एवं शान्ति से परिपूर्ण रहता है ! इनकी आराधना से प्राप्त होनेवाला एक बहुत बड़ा सद्गुण यह भी है कि साधक में वीरता - निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का भी विकास होता है ! उसके मुख नेत्र तथा सम्पूर्ण काया में कान्ति - गुण की वृद्धि होती है ! स्वर में दिव्य अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है ! माँ चन्द्रघण्टा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शान्ति और सुख का अनुभव करते हैं ! ऐसे साधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है ! यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखलायी नहीं देती , किन्तु साधक और उसके सम्पर्क में आनेवाले लोग इस बात का अनुभव भलीभांति करते रहते हैं ! 
हमें चाहिये कि अपने मन , वचन , कर्म एवं काया को विहित विधि विधानके अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके माँ चन्द्रघण्टा के शरणागत होकर उनकी उपासना - आराधना में तत्त्पर हों ! उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं ! हमें निरन्तर  उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिये ! उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति को देनेवाला है !   

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