रविवार, 18 अक्तूबर 2015

556 . ७ - माँ कालरात्रि


५५६ 
७ - माँ कालरात्रि 
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता !
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी !!
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा !
वर्धन्मूर्धवजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी !!
माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से  जानी जाती है ! इनके शरीर का रंग घने अन्धकारकी तरह एकदम काला है ! सिरके बाल बिखरे हुए हैं ! गले में विद्धुत की तरह चमकनेवाली माला है ! इनके तीन नेत्र हैं ! ये तीनो नेत्र ब्रह्माण्ड के सदृश गोल हैं ! इनसे विध्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं ! इनकी नासिकाके श्वास - प्रश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालाएँ निकलती रहती हैं ! इनका वाहन गर्धव - गदहा हैं ! ऊपर उठे हुए दाहिनी हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं ! दाहिनी तरफ का नीचेवाले हाथ अभयमुद्रा में हैं ! बायीं तरफ के उपरवाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचेवाले हाथ में खड्ग है !
माँ कालरात्रि का स्वरुप देखने में अत्यंत भयानक है , लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देनेवाली हैं ! इसी कारण इनका एक नाम शुभंकरी भी है ! अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है ! 
दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है ! इस दिन साधक का मन सहस्त्रार चक्र में स्थित रहता है ! उसके लिए ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है ! इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरुप में अवस्थित रहता है ! उनके साक्षात्कारसे मिलनेवाले पुण्य का वह भागी हो जाता है ! उसके समस्त पापों - विघ्नों का नाश हो जाता है ! उसे अक्षय पुण्य लोकों की प्राप्ति होती है ! 
माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करनेवाली हैं ! दानव , दैत्य , राक्षस , भूत , प्रेत आदि इनके स्मरणमात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं ! ये ग्रह बाधाओं को भी दूर करनेवाली हैं ! इनके उपासक को अग्नि - भय , जल - भय , जंतु - भय , शत्रु - भय , रात्रि - भय आदि कभी नहीं होते ! इनकी कृपा से   वह सर्वथा भय - मुक्त हो जाता है ! 
माँ कालरात्रि के स्वरुप - विग्रह को अपने ह्रदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उनकी उपासना करनी चाहिये ! यम , नियम , संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिये ! मन , वचन , काया की पवित्रता रखनी चाहिये ! वह शुभंकरी देवी हैं ! उनकी उपासना से होनेवाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती ! हमें निरंतर उनका स्मरण , ध्यान और पूजन करना चाहिये !

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