गुरुवार, 15 सितंबर 2016

585 . श्रीतारा


                                                  ५८५ 
                                   श्रीतारा 
जय जय जय भय भन्जिनि भगवति आदि शक्ति तुअ माया । 
जनि नव सजल जलद तुअ तनुरुची पदरूचि पंकज छाया।।
मुण्डमाल वघछाल छुरित छवि लम्बित उदर उदारा। 
असि कुबलय कर कांती खप्पर सर्व रूप अवतारा।।
विकट जटा तन चान तिलक लस भूषण भीषम नागे। 
खल खल हास आकाश निवासिनि मुद्रा मंडित मार्ग।।
तरुण अरुण सम विषम विलोचन पीन पयोधर भारे। 
रकत रकत रसना लह लह कर रदन वदन विकराले।।
भनथि महेश कलेश निवारिणि त्रिभुवन तारिणि माता। 
शव वाहिनि देवी रहू की करत कोपि विधाता।।
       ( मैथिल भक्त प्रकाश ) महाराज महेश ठाकुर 

कोई टिप्पणी नहीं: