सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

614 . गौरी - जय हरिगमनी जय हरिगमनी देधु अभयवर हर रमनी।


                                      ६१४
                                      गौरी 
जय हरिगमनी जय हरिगमनी देधु अभयवर हर रमनी। 
अति विकराल कपाल भाल मृग शोभित कच तट झलक मनी। 
लम्बित कच तर छपित छपाकर भुज पर भूषण भुजंग फनी।  
खप्पर वर करबाल ललित कर शुम्भ निशुम्भ दम्भवनी। 
रिपु भट विकट निकट झटपट कय धय पटकल चटपट अवनी। 
कुपित वदन पर नयन विराजित अरुण अरुण युग कमल सनी। 
लह लह रसन दसन दाड़िमबिज निज गण जनमल दुःख समनी। 
सुर नर मुनि हरखित सब सुनि हरि हर घर के तोहर सनी। 
रक्तबीज महिषासुर हारल असुर संहारल समर धनी। 
हमर कुमति तुअ पद पय गति बिसरिय जनु मोहि एको छनी। 
जगत जननि पद पंकज मधुकर सरस सुकवि यह लाल भनी। 
( गौरी स्वयंवर ) लालकवि 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें