गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

617 . श्री दुर्गा - जै जै दुर्गा दुर्ग प्रताप। तुअ भुजबल डर दानव काप।।


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                                   श्री दुर्गा  
जै जै दुर्गा दुर्ग प्रताप। तुअ भुजबल डर दानव काप।।
सिंह चढ़लि कर लेल कृपाण। कोपि चलल रण रूप भयान।।
दानव दल दलि कैल ओरान। पिउल रुधिर नहि भेल अघान।।
रसन पसार दसन विकराल। ऐसन अरिदल कैल हत काल।।
चण्ड मुण्ड रन खण्डल डारी। शुम्भ - निशुम्भ जुगल रण मारी।।
महिष असुर रण कैल प्रकोप। ताहि निपाति कएल आलोप।।
असुर निपाति सुरहि सुख देल। तुअ रणविजय विदित जग भेल।।
कान्हाराम भन गोचर बानी। सदा सभा शुभ करिय भवानी।।
( गौरी स्वयंवर नाटिका )   कान्हाराम

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