मंगलवार, 16 मई 2017

762 . भगवती सरस्वती के अनन्य उपासक महर्षि याज्ञवल्क्य।


                                ७६२
भगवती सरस्वती के अनन्य उपासक महर्षि याज्ञवल्क्य। 
महर्षि याज्ञवल्क्य की जन्म - भूमि मिथिला है। मिथिला के लोग प्रारम्भ से ही मातृभक्त थे। महर्षि याज्ञवल्क्य भी परम मातृभक्त थे। वे बाल्यावस्था में अपने शिक्षा - गुरु की आज्ञा का उल्लंघन किया करते थे। माता के सामने वह किसी को भी ऊँचा स्थान देना नहीं चाहते थे। माता की भक्ति में वे इस तरह लीन रहा करते थे कि गुरु के ज्ञान और गुरु के गौरव का उनके ह्रदय पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता था। इसलिए गुरुदेव ने उन्हें शाप दे दिया था कि 
' तूं मूर्ख ही रहेगा । ' इस शाप को छुड़ाने के लिए सिवा माता की शरण के उनके पास दूसरा कोई उपाय नहीं था। बालक जाए भी तो कहाँ ? दुःख हो या महा दुःख , माता के बिना रक्षक संसार में कौन है ?
                                  याज्ञवल्क्य ने माता की स्तुति की। मनसा वाचा कर्मणा उन्होंने जो स्तुति की , उस पर माता का ह्रदय द्रवित हो उठा।  याज्ञवल्क्य शाप से ही छुटकारा नहीं पाना चाहते थे , वे यह भी चाहते थे कि विद्वान बनकर रहें। इसलिए माता से उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि ' मेरी बुद्धि निर्मल हो जाये , मैं विद्वान बनूँ। ' माता ने वैसा ही किया तथा बुद्धि - दात्री सरस्वती का रूप धारण कर  याज्ञवल्क्य को वैसा ही बनने  के लिए अपने आशीर्वाद दिए। माता एक ही है किन्तु अपने भक्तों यानी पुत्रों पर कृपा करने के समय जब जिस रूप में उसकी आवश्यकता होती है , वह उसी रूप में आकर रक्षा करती है। एक ही माता दूध पिलाते समय धायी का काम करती है , जन्म देने के समय जननी बन जाती है , मल - मूत्र साफ़ करने समय मेहतरानी बन जाती है , रोगी बनने पर वैद्य बन जाती है , सेवा - सुश्रुषा के समय दासी बन जाती है और न जाने अपने पुत्र के लिए वह क्या - क्या बन जाती है , इसे अनुभवी ही हृदयङ्गम कर सकता है।
महर्षि याज्ञवल्क्य को विद्वान बनना था , इसलिए माता ने सरस्वती का रूप धारण कर उनकी बुद्धि को , उनकी मेधा - शक्ति को और प्रतिभा को निर्मल बना दिया , वे संसार की सारी वस्तुएँ स्पष्ट देखने लगे।  स्तुति का प्रभाव ऐसा ही होता है।  
महर्षि याज्ञवल्क्य ने माता की ऐसी ही स्तुति की , जिससे वे प्रसन्न हो गई और वरदान दिया कि  ' तुम्हारी बुद्धि सूर्य की किरणों की तरह सर्वत्र प्रवेश करनेवाली होगी और जो कुछ अध्यन - मनन - चिंतन करोगे वह सब तुम्हे सदा - सर्वदा स्मरण रहेगा। ' यह है मातृ - भक्ति का प्रसाद। 
महर्षि याज्ञवल्क्य उसी समय से तीक्ष्ण बुद्धिवाले हो गए। उन्होंने जो कुछ भी लिखा , वह आज तक भारत में ही नहीं , भारत से बाहर भी आदर की दृष्टि से देखा जाता है। ' याज्ञवल्क्य स्मृति ' और उस का ' दाय भाग ' भारतीय कानून का एक महान अंश है। यह सब माता की कृपा का ही सुपरिणाम है। 
महर्षि याज्ञवल्क्य ने माता को सोते , जागते , उठते , बैठते - सदा - सर्वदा जो स्तुति की ,  प्रभावित होकर माता ने उनकी मूर्खता सदा के लिए दूर कर दी ; गुरु के शाप से छुड़ा दिया ; विद्या का अक्षय भंडार उनके सामने रख दिया। 
जिस स्तुति से महर्षि याज्ञवल्क्य ने माता की प्रार्थना की थी , उसे ' श्रीवाणी - स्तोत्रम ' ९ सरस्वती का महा - स्तोत्र ) कहा जाता है।  इस स्तोत्र में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि ' मैं गुरु के शाप से पीड़ित हूँ। मुहे माता ही इस शाप से छुटकारा दिला सकती है। माता के गौरव का भी महर्षि याज्ञवल्क्य ने वर्णन किया है।  अन्त में स्तोत्र की महिमा भी बताई गयी है कि मुर्ख - से - मुर्ख व्यक्ति भी यदि एक वर्ष तक इस स्तोत्र का पाठ करे , तो वह मूर्खता से मुक्त हो सकता है। नित्य पाठ करनेवाला महा - दुर्बुद्धि और महा मुर्ख भी महा - पण्डित और मेधावी  हो जाएगा। 
यह स्तोत्र तंत्र - शास्त्र का एक अमूल्य रत्न है।  यदि इस स्तोत्र के विषय में यह कहा जाय कि यह महर्षि याज्ञवल्क्य का ' अनुभूत प्रयोग ; है तो अति - रञ्जित नहीं होगा। 
                            ' श्रीवाणी - स्तोत्रम '
कृपा कुरु जगन्मातर्मामेवं  हत - तेजसं। 
गुरु - शापात स्मृति - भ्रष्टं विद्या - हीनं च दुःखितं।।१ 
ज्ञानं देहि स्मृति विद्यां , शक्ति शिष्य - प्रबोधिनीम। 
ग्रन्थ - कर्तृत्व - शक्तिं च , सु - शिष्यं सु - प्रतिष्ठितम।।२ 
प्रतिभाँ सत - सभायां च , विचार - क्षमतां शुभाम। 
लुप्तं सर्वं देव - योगात नवी - भूतं पुनः कुरु।।३ 
यथांकुरं भस्मनि च , करोति देवता पुनः। 
ब्रह्म - स्वरूपा परमा , ज्योति - रूपा सनातनी।।४ 
सर्व - विद्याधि - देवि या , तस्यै वाण्यै नमो नमः। 
विसर्ग - विन्दु - मात्रासु , यादाधिष्ठानमेव च।.५ 
तदधिष्ठात्री या देवि , तस्यै नीत्यै नमो नमः। 
व्याख्या - स्वरूपा सा देवी , व्याख्याधिष्ठात्री - रूपिणी।।६ 
यया विना प्र - संख्या - वान , संख्या कर्तुं न शक्यते। 
काल - संख्या - स्वरूपा या , तस्यै देव्यै नमो नमः।।७
भ्रम - सिद्धान्त - रूपा या , तस्यै देव्यै नमो नमः। 
स्मृति - शक्ति - ज्ञान - शक्ति - बुद्धि - शक्ति - स्वरूपिणी।।८ 
प्रतिभा - कल्पना - शक्तिः , या च तस्यै नमो नमः। 
सनत - कुमारो ब्रह्माणंम , ज्ञानं प्रपच्छ यत्र वै।.९ 
बभूव मूक - वत्सोsपि , सिद्धान्तं कर्तुमक्षमः। 
तदा जगाम भगवान , आत्मा श्रीकृष्ण ईश्वरः।।१० 
उवाच स च तां स्तौहि , वाणीमिष्टां प्रजा - पते। 
स च तुष्टाव तां ब्रह्मा , चाज्ञया परमात्मनः।।११ 
चकार तत - प्रसादेन , तदा सिद्धान्तमुत्तमम। 
तदाप्यनन्तं  प्रपच्छ , ज्ञानमेकं वसन्धरा।।१२ 
बभूव मूक - वत्सोsपि , सिद्धान्तं कर्तुमक्षमः। 
तदा तां स च तुष्टाव , सन्त्रस्तो कश्यपाज्ञया।।१३ 
ततश्चकार  सिद्धान्तम , निर्मलं भ्रम - भंजनम। 
व्यासः पुराण - सूत्रं च , प्रपच्छ वाल्मीकि यदा।।१४ 
मौनी - भूतश्च संस्मार , तामेव जगदम्बिकाम। 
तदा चकार सिद्धान्तं , तद वरेण मुनीश्वरः।।१५ 
सम्प्राप्य निर्मलं ज्ञानम , भ्रमान्ध्य - ध्वंस - दीपकम। 
पुराण - सूत्रं श्रुत्वा च , व्यासं कृष्ण - कुलोदभवः।।१६ 
तां शिवां वेद - दध्यौ च , शत वर्षं च पुष्करे। 
तदा त्वत्तो वरं प्राप्य , सत - कवीन्द्रो बभूव ह।.१७ 
तदा वेद - विभागं च पुराणं च चकार सः। 
यदा महेन्द्रः प्रपच्छ तत्त्व - ज्ञानं सदा - शिवम्।।१८ 
क्षणं तामेव संचिन्त्य , तस्मै ज्ञानं ददौ विभुः। 
प्रपच्छ शब्द - शास्त्रं च महेन्द्रश्च वृहस्पतिम।। १९ 
दिव्यं वर्ष - सहस्त्रं च स त्वां दध्यौ च पुष्करे। 
तदा त्वत्तो वरं प्राप्य , दिव्य - वर्ष - सहस्त्रकम।।२० 
उवाच शब्द - शास्त्रं च तदर्थं च सुरेश्वरम। 
अध्यापिताश्च ये शिष्याः यैरधीतं मुनीश्वरैः।।२१ 
ते च तां परि - संचिन्त्य ,प्रवर्तन्ते सुरेश्वरोम। 
त्वं संस्तुता पूजिता च , मुनीन्द्रैः मनु - मानवै: २२ 
दैत्येन्द्रैश्च सुरैश्चापि , ब्रह्म - विष्णु - शिवादिभिः। 
जडी - भूतः सहस्त्रास्य: , पञ्च - वक्त्रश्चतुर्मुखः।।२३ 
यां स्तोतुं किमहं स्तौमि , तामेकास्येन मानवः। 
इत्युक्त्वा याग्वल्क्यश्च , भक्ति - नम्रात - कन्धरः।।२४ 
प्रणनाम निराहारो , रुरोद च मुहुर्मुहः। 
ज्योति - रूपा महा - माया , तेन द्रष्टापयुवाच तम।.२५ 
सा कवीन्द्रो भवेत्युक्त्वा , बैकुण्ठं च जगाम ह। 
 याज्ञवल्क्य - कृतं वाणी - स्तोत्रमेतत्तु यः पठेत।।२६ 
स कवीन्द्रो महा - वाग्मी , वृहस्पति - समो भवेत्। 
महा - मूर्खश्च दुर्बुद्धि , वर्षमेकं यदा पठेत।।२७ 
स पण्डितश्च मेधावी , सु - कवीन्द्रो भवेद ध्रुवम।२८
साभार ---बिहार में शक्ति - साधना       
अशुद्धि हेतु क्षमा प्रार्थी। 

शुक्रवार, 12 मई 2017

761 . बिहार में शक्ति साधक राजा निमि द्वारा भगवती जगदम्बा की प्रार्थना।


                                    ७६१
बिहार में शक्ति साधक राजा निमि द्वारा भगवती जगदम्बा की प्रार्थना। 
मिथिला की शक्ति उपासना का परम्परा हजार , दो हजार , दस बीस हजार वर्ष की नहीं , अपितु वैदिक काल के चतुर्युग ( सत्य , त्रेता , द्वापर , कलि ) के आदि सत्य युग के प्रारम्भ की है। 
चक्रवर्ती महाराज इच्छवाकु के बारहवें पुत्र राजा निमि परम सुन्दर , गुणी , धर्मज्ञ , लोक - हितेषी , सत्य -वादी  , ज्ञानी , बुद्धिमान , प्रजा - पालन में तत्पर थे। राजा निमि ने विशेष दान युक्त अनेक यज्ञ किये। गौतम आश्रम के निकट एक पुर बसाया। स्मरण रहे , यह गौतम आश्रम आज भी मिथिलाञ्चल में ही है। 
                                एक बार राजा निमि की इच्छा हुई की जगदम्बा प्रीत्यर्थ एक विशेष यज्ञ करूँ।  ऋषि महात्माओं के निर्देशानुसार यज्ञ - सामग्री एकत्र की गई।  भृगु , अंगिरा , वामदेव , गौतम , वसिष्ठ , पुलत्स्य , ऋचिक , क्रतु आदि मुनियों को निमंत्रण दिया गया। अपने कुल गुरु श्रोवशिष्ठ जी से राजा निमि ने विनय - पूर्वक निवेदन किया - गुरुदेव , यज्ञ - विशेष की सभी व्यवस्था हो गयी है। कृपया आप इस यज्ञ में जगदम्बा का साङ्गोपाङ्ग पूजन - विधान संपन्न करें। 
                                    श्री वशिष्ठ जी ने कहा - महाराज , जगदम्बा के प्रीत्यर्थ देव राज इन्द्र भी एक यज्ञ कर रहे हैं।  उसके लिए वे मुझे आपसे पूर्व ही निमंत्रण दे चुके हैं।  अतः मैं पहले उनका यज्ञ करा आता हूँ।  तब आप मुझे निमंत्रण देंगे , तो मैं आकर आपका भी यज्ञ करा दूंगा। 
                                 यह सुनकर राजा निमि ने कहा - मुनिवर , यज्ञ को तो मैं सारी तैयारी करवा चूका हूँ।  अनेक मुनि भी एकत्र हो चुके हैं।  ऐसी दशा में यह कैसे स्थगित हो सकता है। आप हमारे वंश के गुरु हैं। अतः हमारे यज्ञ में आपको रहना ही चाहिए। 
  किन्तु वशिष्ठ जी ने राजा निमि के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और इन्द्र का यज्ञ करने चले गए।  लाचार होकर राजा निमि गौतम को पुरोहित बनाकर यज्ञ करने लगे। कुछ दिनों के बाद वशिष्ठ जी उनके यहाँ आये। राजा निमि उस समय सो रहे थे। सेवकों ने उन्हें जगाना उचित नहीं समझा।  अतः राजा निमि वशिष्ठ जी दर्शनार्थ नहीं आ सके। मुनि वशिष्ठ ने इसे अपना अपमान समझा और उन्होंने क्रोध - भरे शब्दों में कहा - राजा निमि मुझ से रोके जाने पर भी आपने नहीं माना , दूसरे को पुरोहित बना आपने यज्ञ कर ही लिया और अब मेरे सम्मुख भी नहीं आते। अतः मैं आपको शाप देता हूँ कि आपका यह देह नष्ट हो जाय और आप विदेह हो जाएँ। 
शाप से घबराकर राजा के सेवकों ने राजा निमि को जगा दिया। राजा निमि भी शाप की बात सुनकर क्रुद्ध हो उठे और वशिष्ठ जी के सामने आकर कहा कि - आपने मुझे अकारण ही शाप दे दिया। कुल गुरु होकर भी आपने मेरे अनुरोध को नहीं माना और दूसरे का यज्ञ कराने चले गए।  लौटकर आने पर आपने यह भी विचार नहीं किया कि मैं निद्रित होने के कारण आपके दर्शनार्थ नहीं पहुँच सका और क्रोध में आकर अनुचित शाप दे बैठे। ब्राह्मणों को ऐसा क्रोध होना उचित नहीं है।  आपने मुझ निरपराध को शाप दिया है अतः मैं भी आपको शाप देता हूँ कि आपका यह क्रोध - युक्त देह नष्ट हो जाये। इस प्रकार राजा निमि और श्रीवशिष्ठ एक दूसरे के शाप से ट्रस्ट हो दुखी हो गए। 
                             वशिष्ठ जी अपने पिता ब्रह्मा की शरण में पहुंचे और सारी घटना का वर्णन करते हुए विनय की --- मेरा यह शरीर तो पतित होगा ही , अन्य शरीर धारण करने के लिए किनको पिता बनाऊं , जिससे देह मुझे पुनः प्राप्त हो और मेरा ज्ञान नष्ट न हो ?
             ब्रह्मा ने कहा - तुम मित्रा - वरुण के शरीर में प्रवेश कर स्थिर हो जाओ। वहां से तुम अयोनिज जन्म पाओगे , इसी देह के समान सब काम कर पाओगे और तुम्हारा यह ज्ञान भी नष्ट नहीं होगा। 
                     इधर राजा निमि का यज्ञ समाप्त नहीं हुआ था। शाप - वश उनके शरीर का पतन होने लगा। ऋत्विज ब्राह्मण राजा के किंचित श्वास - युक्त शरीर को चन्दनादि सुगन्धित वस्तु लेपन करते हुए मन्त्र - शक्ति से रोके रहे। यज्ञ समाप्ति होने पर देवताओं ने राजा से कहा - राजा निमि।  आपके यज्ञ से हम लोग बहुत प्रसन्न हैं , आप वर मांगें। देवता - मनुष्यादि जिस शरीर में आपको रूचि हो , वही शरीर हम आपको दे सकते हैं।  राजा निमि ने कहा - मैं इस शाप ग्रस्त देह में नहीं रहना चाहता। आप मुझे यह वर दें कि देह के न रहने पर भी मैं सदा बना रहूं। 
                               इस पर देवता बोले - आप जगदम्बा से प्रार्थना करें। वे इस यज्ञ से प्रसन्न हैं , अतः आपकी कामना अवश्य पूर्ण करेंगी। 
                    तब राजा निमि ने श्री जगदम्बा का ध्यान कर प्रार्थना की , जिस पर वे प्रकट हुई और बोली -- तुम्हारा अस्तित्व समस्त प्राणियों की पलक पर सदा बना रहेगा। तुम्हारे ही द्वारा प्रत्येक देहि पलक गिरा सकेगा। तुम्हारे निवास के कारण मनुष्य - पशु -पतंगादि भूत - गण स - निमिष कहलायेंगे और देवता अ - निमिष। 
                                उक्त वरदान के फल - स्वरुप राजा निमि की देह प्राण - शून्य हो गई। अराजकता के भय से वंश - रक्षा के निमित्त मुनियों ने अरणि ( अग्नि निकालने वाला काष्ट - यंत्र ) से मन्त्रों द्वारा उस देह का मन्थन किया , जिससे उस देह से एक पुत्र का जन्म हुआ। मन्थन द्वारा जनक ( पिता ) से उत्पन्न होने के कारण उसे मिथि और जनक नामों से पुकारा गया।  राजा निमि विदेह हो गए थे , अतः उनके वंशज भी विदेह कहलाये। इस प्रकार राजा निमि का उक्त पुत्र मिथि - जनक विदेह नामों से प्रसिद्ध हुआ।  इन्ही राजा मिथि द्वारा मिथिला नाम की पुरी स्थापित हुई और उसी पूरी के नाम पर मिथिला देश की प्रख्याति हुई। 

गुरुवार, 11 मई 2017

760 . जय देवि वर देह करह उधार। तोहहु कयल मात जगत विचार।।


                                     ७६०
जय देवि वर देह करह उधार। तोहहु कयल मात जगत विचार।। 
वाण खरग चक्र पात्र धर हाथ। चरम गदा धनु बिन्दु तुअ साथ।।
केसरि उपर छलि त्रिभुवन माता। सुर असुर नर जग्रहुक धाता।।
जगत चंदन भन आदि सूत्रधार।  शंभु सदाशिव करथु बिहार।।
जगतचन्द ( मैथिली नाटकक उदभव अओर विकास )

बुधवार, 10 मई 2017

759 . हेरह हरषि दुख हरह भवानी। तुअ पद शरण कए मने जानी।।


                                       ७५९ 
हेरह हरषि दुख हरह भवानी। तुअ पद शरण कए मने जानी।।
मोय अति दीन हीन मति देषि। कर करुणा देवि सकल उपेषि।।
कुतनय करय सकल अपराध। तैअओ जननिकर वेदन बाघ।।
प्रतापमल्ल कहए कर जोरी। आपद दूर कर करनाट किशोरी।।
                                                                       ( तत्रैव )

मंगलवार, 9 मई 2017

758 . किदहु करम मोर हीन रे माता जनि दुष रे धिया।


                                        758 . 
किदहु करम मोर हीन रे माता जनि दुष रे धिया। 
किदहु कुदिवस कए रखलादहु जनि मृग व्याधक फसिया।।
किदहु पुरुब कुकृत फल भुग्तल निकल भेल ते काजे। 
किदहु विधिवसे गिरिवर नन्दिनि भेलि हे विमुख आजे।।
                  प्रतापमल्ल ( मैथिली शैव साहित्य )

सोमवार, 8 मई 2017

757 . असि त्रिशूल गहि महिष विदारिणि। जंभाविनि जगतारण कारिणि।।


                                 ७५७
असि त्रिशूल गहि महिष विदारिणि। जंभाविनि जगतारण कारिणि।। 
ण्ड मुण्ड वध कय सुरकाजे।  शुम्भ निशुम्भ वधइते देवि छाजे।।
सकल देवगण निर्भय दाता। सिंह चढ़ लिखा फिर माता।।
बहुपतीन्द्र देव कएल प्रणामे। देवि प्रसादे पुरओ मोर कामे।।

रविवार, 7 मई 2017

756 . ई जग जलधि अपारे। तठि देवि मोहि कडहारे।।


                                    ७५६ 
ई जग जलधि अपारे। तठि देवि मोहि कडहारे।।
धन जन यौवन सबे गुन आगर नरपति तेजि चल काय।ई सब संगति दिन दुयि बाटल आटल बिछुड़िअ जाय।।
जे किछु बुझि सार कए लेखल देखल सकल असारे। 
इन्द्रजाल जनि जगत सोहावन त्रिभुवन जत अधिकारे।।
तुअ परसादे साथ सभ पूरत दुर जायत दुख भाले। 
से मोय जानि शरण अवलम्बन सायद होयत संतारे।।
भूपतीन्द्र नृप निज मति एहो भन ई मोर सकल विचारे।देवि जननि पद पंकज भल्ल्हु  तेजि निखिल परिवारे।।
                                      ( मैथिली शैव साहित्य ) 

शनिवार, 6 मई 2017

755 . जय - जय दामिनि देवि भवानी। करह कृपा मोहि निय सुत जानी।


                                       ७५५ 
जय - जय दामिनि देवि भवानी। करह कृपा मोहि निय सुत जानी। 
मन कय दीप ज्योति कय ज्ञान। आरतिकरन सहस्त्र दले मान।।
आनन्द गोघृत मन कय भावे। नृप भूपतीन्द्र मल्ल भने गुणिगावे।।
                                                 ( मैथिली शैव साहित्य )

शुक्रवार, 5 मई 2017

754 . हे देवि शरण राख भवानि।


                                    ७५४ 
हे देवि शरण राख भवानि। 
मन वच करम करओ सान किछु से सवे तुअ पद जानि।।
हमे अति दीन खीन तुअ सेवा राखह निय जन जानि।।
अविनय मोर अपराध सम्भव मन जनु राखह आनि। 
अओर इतर जन जग जत से सवे गुण रसमय से वानि।।
तुअ पदकमल भमर मोर मानस जनमे जनमे एहो भानि। 
भूपतीन्द्र नृप एहो रस गावे जय गिरिजापति बानि।।
भूपतीन्द्रमल्ल  ( हिस्ट्री ऑफ़ मैथिली लिटरेचर )

गुरुवार, 4 मई 2017

753 . जय हिमालय नन्दनी।


                                      ७५३ 
जय हिमालय नन्दनी। 
हरक धरनि तोहे देवि गोसाउनि। चौदह भुवनक रानी। 
विष्णुक घर तोहे कमला सुन्दरि ब्रह्मा घर तोहे वानी।।
जत किछु जगत तोहर थिक विलसित तुअ गुण अपरूब भाँति। 
कहुखने बाला कहुखने तरुणी कहुखने अपरूब कांति। 
                                    ( मैथिली शैव साहित्य )

बुधवार, 3 मई 2017

752 . जय जय शंकरि शकर जाये। थिति कृति संहति कारिणि माये।


                                   ७५२
जय जय शंकरि शकर जाये। थिति कृति संहति कारिणि माये। 
जलद कतक शशि रूचि सम देहा। त्रिगुण विधायिनी त्रिगुण सिनेहा।।
हरि विधि वासव दिनपति चंद। तुअ पद पंकज के नहि दन्द।।
मल्ल अमित जित भूपति वाणी। पुरथु मनोरथ शम्भु भवानी।।
                                            ( मैथिली शैव साहित्य )

मंगलवार, 2 मई 2017

751 . नमो मृडानी गिरितनया।


                                     ७५१ 
नमो मृडानी गिरितनया। 
सुरजन ईश सकल जन पूजित पद सरोज सदय हृदया। 
देवि भवानीणि सुराधिप माया त्रिभुवन परिणि जलधि निलया।।
कण्ठ विराजित हाल फणमणि चौसठि पीठ महविजया। 
डिम डिम डिम डमरुक राविनि। 
कुट कुट कटक चारु चालिणि।
धयि धयि धयिअ बाज मृदङ्गिनि। 
धूमि धूमि धिमि मोद मोहिणि।।
देवि महेशरि मोहि निहारह शंकर ह्रदय सायानी। 
मल्ल जितामित्र भूपति वाणी पुरह मनोरथ हमर भवानी। 
जितामित्रमल्ल ( मैथिली शैव साहित्य )

सोमवार, 1 मई 2017

750 . भज मन जगजननी भव भाविनी।


                                       ७५०
भज मन जगजननी भव भाविनी। 
यो किछु कोयि करजन मानसा भरण पुरण करतारिणि। शिर पर चन्द्र मुकुट विराजे मुख वेसरि सोहे। 
सोहे तिलक पटम्बर कुण्डल देखि महेशर मोहे।।
                                                     ( तत्रैव )  

रविवार, 30 अप्रैल 2017

749 . भज मन जगजननी भव भाविनी।


                                    ७४९
भज मन जगजननी भव भाविनी। 
यो किछु कोयि करजन मानसा भरण पुरण करतारिणि। शिर पर चन्द्र मुकुट विराजे मुख वेसरि सोहे। 
सोहे तिलक पटम्बर कुण्डल देखि महेशर मोहे।।
                                                   ( तत्रैव ) 

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

748 . कृपा करह जगत जननी माता। तोहे भवानी सब लोक का धाता।।


                                    748 
कृपा करह जगत जननी माता। तोहे भवानी सब लोक का धाता।।
खीन सेवक हमे देखि कर करुना। कि कहब माता मोए तोहर गुना।।
जगतप्रकाश नृपति कर विनती। जनम होउ तोर पदे मती।।

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

747 . जत अपराध मोर क्षमह भवानि। होएतहु बेर बेर जानि अजानि।।


                                       ७४७
जत अपराध मोर क्षमह भवानि। होएतहु बेर बेर जानि अजानि।।  
शंकट बड़ भेल दुर कर दुख। सुदिठिहि देखि कए करू मोहि सुख।।
निअ शिशु जनु भिषि मगाबह मायि। सब दुख मोर देवि कहि नहि जाइ।।
जगतप्रकाश कह तोहे आधार। करुणा कर मोर कर उपकार।।

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

746 . अधिर कलेवर जानु हे कमलक पात जल तूल हे।।


                                       ७४६ 
अधिर कलेवर जानु हे कमलक पात जल तूल हे।
भवन कनक जन रजत आदि जात धिर नहि रह सब जने। 
सुत मित सब धन सुख दुख शरीर अधिर जानल सब मने। 
सिरजन शरीर ई ई सबका मन नृप अवयव दासे। 
मनहि पाबय पुने अधरम अपजस मन बसे पाव एत पासे।।
जगत प्रकाश आस कएल तोहर चान्दशेखर सिंह भाय। 
जगतजननि पथ हे थिर राखह दुहू जनक दुहू काय।।
                                   ( मैथिली शैव साहित्य )

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

745 . अनेक अपराध होए हमरा , क्षमह जगत मात।


                                       ७४५
अनेक अपराध होए हमरा , क्षमह जगत मात। 
किछु सेवा कएल मोए , नित नित करह सुदिठि पात।।
करुणा ते सुनि हमर विनिति पुरह तोहे भवानी। 
चारि पदारथ मागल मोए तोहे से देह सेवक जानि।।
अउर कि विनति करब हम तोह ई सब तोहहि जान। 
पद युग धरि कह प्रकाश नृप सरण नहि मोर आन। 

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

744 . नहि धन नहि जन नहि आन देवा। मोन कएल जननी तोहर एक सेवा।।


                                      ७४४ 
नहि धन नहि जन नहि आन देवा। मोन कएल जननी तोहर एक सेवा।।
तोर करुणा ते मोर सब परिपुर। निय पद सनो हम जनु कर दूर।।
नित नित मागल मय ई तुव पासे। पुरह भवानी हमर मन आसे।।
जगतप्रकाश मल्ल भूपति भासे। जे हमरा अरि कर तसु नासे।।
                                                                   ( तत्रैव )

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

743 . नहि आन गति हमरा माता।।


                                     ७४३ 
नहि आन गति हमरा माता।।
मोने मन वचन कएल तुअ सेवा। करुणा कर कुल देवा।।
मोर अपराध क्षमह तोहे माता।  मोर रिपु का कर घाता।।
एहे संसार तोहे देवि सिरिजर। तोहहि देह अभयवर।।
करे जोरि विनति कर प्रकाश। पुराबधु मोर आश।
                    जगतप्रकाशमल्ल ( प्रभावती हरण )

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

742 . सकल असार सार पद पंकज तोहर मनहि विचारल हे।


                                      ७४२
सकल असार सार पद पंकज तोहर मनहि विचारल हे। 
जे तोहे करब से करह भवानी हट कए ह्रदय लगाओल हे।। 
गुण , दोष मोहि एकओ नहि जानह दारुक पुतरि उदासिन हे। 
जे किच्छु करावह करओ से माता हमें नहि अपन स्वआधिन हे।
तोह छाड़ि आन काहु नहि समुझनो दीन न भाषणों वाणी हे।
भाव जञ्जाल जाल मोर जालह शरणागत मोहि जानी हे।  
तोहे ठकुरायिनि हमें तुअ सेवक ई अपने अवधारी हे। 
कत अपराध पड़त अगेआनाहि से सबे हलह समारी हे।। 
नृप जगजोतिमल एहन बुझाबए चण्डी चरन चित राखी हे। 
सब सिधि आबए भगवति झुमरि सुमरि सुमरि मन साखी हे।। 
                                                               ( मुदित कुबलयाश्व नाटक )

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

741 . दिग देल अरुण किरण परगास। आरति लाओब परशिव पास।।


                                      ७४१
दिग देल अरुण किरण परगास। आरति लाओब परशिव पास।।
रे रे भवानी शरण तोहारि। जननि कृपा करू भवभय तारि।।
दिन दश लागि करब बहु बात। ममतामोह भरम मदमात।।
परशिव वरिय सुधारस सार। अलि पद सरसिज भेदए पार।।
ऊग कलारवि दिगरस वेद। चाँद सुरुज खेल , पवनक भेद।।
विहि आसने गुण महानिसि सेव। गगनविन्दु रस शशिकर देव।।
नृप जगज्योति एहो रस गावे।  गुरु परसाद परम लए पावे।।
                                               ( गीतपञ्चारिका )  

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

740 . नयनक दोष कतय नहि होए। जननि कृपावसे दूकर धोए।।


                                      ७४० 
नयनक दोष कतय नहि होए। जननि कृपावसे दूकर धोए।।
करजोड़ि पए पड़ि विनमञो तोहि। एहि दुखभार संतारह मोहि।।
कतए कतए नहि कएलह उधार। पालि न मारिअ करह विचार।।
भयभञ्जनि तोहे माए भवानि। आबे किए बिसरलि अपनुकि वानि।।
नृप जगजोति कह न कर उदास। जतहि ततहि जग तोहरे आस।
                                                                                 ( तत्रैव  )

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

739 . दालिम दशन पाती अधर विद्रुम कांती।


                                     ७३९
दालिम दशन पाती अधर विद्रुम कांती। 
सुखक सदन प्रसन्न वदन पुनित चाँदक भाँती। 
                                      देवि हे तों हहि जगतमाता। 
सकल संयत मूनि अभिमत , चारि पदारथ दाता।।
नयन भौंह विलासे मदनवाण प्रगासे। 
विकल कमलयुगल ऊपर भ्रमन पाँति विकासे।।
दानव दलन शीले विहित समर लीले।  
जगततारिणि दुरित दारिनि विवुध पालन धीरे।।
नृप जगजोति गाबे तुअ पद मन लाबे। 
जेहन जलद चातक चाहए आन किच्छु नहि भावे।।
                                    ( मुदित कुबलयाश्व नाटक )  

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

738 . मातु भवानी शरण तोहारो जाओ बलिहारी।।


                                      ७३८
मातु भवानी शरण तोहारो जाओ बलिहारी।।
मन क्रम वचन अओर नहि भावत। 
एहि संसार काहे अटकावत।।
अओर कि अओर सनो मन मेरो तोह सनो। 
मोरब प्रीति जैसे शसि कुमुदिनि सनो।।
नृप जगजोति कह आस न कायक। 
जनम जनम तोहरे गुण गायक।।
चरण कमल तुअ शरण भए मोहि। 
अपने रोपि का मारह पालह।।
                                      ( मुदित कुबलयाश्व नाटक ) 

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

737 . भवभयभञ्जनि असुर विनासिनि।जगजनपविनि त्रिभुवनकारिनि।


                                     ७३७
भवभयभञ्जनि असुर विनासिनि।जगजनपविनि त्रिभुवनकारिनि।
मनसुखदायिनि रिपुगणमारिनि। जयजगदायिनि जय बलकारिणि।।
सुरगणनन्दिनि दुरितनिकन्दिनि। मृगपतिचारिणि समरविदारिणि।।
नृप जगजोति मति चण्डीचरनरति। राग मल्लार जाति ताल रूपक गति।।
                                                              ( मुदित कुवलयाश्व नाटक ) 

रविवार, 16 अप्रैल 2017

736 . मधुकैटभ महिषासुर मारल इन्द्र आदि देव तव जो करे।।


                                     ७३६
मधुकैटभ महिषासुर मारल इन्द्र आदि देव तव जो करे।।
धूम्रलोचन जम धरहि पठाओल चण्डमुण्ड रक्तबीज संहरे।।
समरे भवानि हाथे बैरि जिब गेल सुरमुनि मने हरख भेला। 
सवे दिगपाल अपन पद थापल सबक विषाद खनहि दुर गेला।।
ताहि उपर शुम्भ निशुम्भ विदारल चौदिस जय जय किन्नर गाव। 
जहा जहा संकट देवि उधरि लेह नृप जगजोतिमल भगतिहि लाव।।
                  जगज्ज्योतिर्मल्ल  ( कुञ्जविहारी नाटक )

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

735 . सबके सुधि अहाँ लै छी अम्बा हमरा किए बिसैर छी ये।।


                                      ७३५ 
सबके सुधि अहाँ लै छी अम्बा हमरा किए बिसैर छी ये।
थिकहुँ पुत्र अहीं केर हमहुँ , ई तँ अहाँ जनै छी ये। 
रैन दिवस हम मिनती करै छी , दर्शन किए ने दै छी ये।
अम्बा अम्बा जय जगदम्बा , तारण तरण करै छी ये। 
हमरा बेर में आँखि मुनै छी , ई नहि उचित करै छी ये।

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

734 . जय भगवती वरदायिनी मा मंगले मंगल करू


                                      ७३४
जय भगवती वरदायिनी मा मंगले मंगल करू 
जय शिवप्रिये शंकर प्रिये मा मंगले मंगल करू। 
जय अम्बिके जगदम्बिके जय चण्डिके मंगल करू।।
अनन्त शक्तिशालिनी अमोघ शस्त्रधारिणी। 
निशुम्भ - शुम्भ मर्दिनी त्रिशुलचक्र पायनी ,
हे ईश्वरी , परमेश्वरी रामेश्वरी मंगल करू।।
करात मुख कपालिनी विशाल मुण्डमालिनी ,
असीम कष्ट हारिणी त्रिमूर्ति सृष्टि धारिणी ,
दुःखहारिणी सुखदायिनी हे पार्वती मंगल करू।।
प्राकृत तुहीं साकृत तुहीं दया तुहीं क्षमा तुहीं ,
प्रथा तुहीं छटा तुहीं शुभा तुहीं कला तुहीं ,
हे ललित शक्तिप्रदायिनी सिद्धेश्वरी मंगल करू।।
                                                    अज्ञात कविक  

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

733 . जागू जागू जागू मैया जागू तजि ध्यान ये।


                                     ७३३
जागू  जागू जागू मैया जागू तजि ध्यान ये। 
अभागल चन्द्र आज पहुँचल दलान ये।
लाल वसन शोभे कञ्चन वदन ये। 
भाल बीच शोभे दूनू लाल नयन ये।
गला बीच फूलक माला खून सन लाल ये। 
नमरल कारी कारी गला शोभे हार ये।
तोरि - लोड़ि फूल अनबै रक्त चन्दन ये। 
साँझ - प्रात पूजन करबै मनुआँ मगन ये।
जगमातु की सुनु दीनक गान ये। 
हमरा ऊपर कने खोलू अहाँ ध्यान ये।
चन्द्र कहथि मैया कतए नुकायल छी। 
अहाँ दर्शन लेल हमहुँ बेहाल छी।
                                                      चन्द्रकान्त झा 

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

732 . जयति भवानी हे कल्याणी , सकल ताप परिताप हरु


                                      ७३२
जयति भवानी हे कल्याणी , सकल ताप परिताप हरु
देबहुँके दुःख दूर कयल मा , अधमाधम हम , पाप हरु। 
जगत विदित अछि कथा अहाँक , घट घट वासिन हे मइया  
कखनहु काली कखनहु दुर्गा , रूप धारिनी हे मइया 
कामाख्या विंध्याचल दौड़ी , हमर मोह भवचाप हरु।।देबहुँके।।
जखन - जखन दुख बढ़लै , बनलौ , दैत्य विनासिनि हे मइया 
रणमे शुम्भ - निशुम्भ संहारल , महिषा मर्दिनी हे मइया 
मरुभूमि केर मृगा सनक मन , हमर दुःखक अभिशाप हरु।।देबहुँके।।
रंक निमिष भरिमे हो राजा , दौड़े आन्हर हे मइया 
बौका गाबय गीत , चढ़ै गिरवर पर नांगर हे मइया 
चरण ' चरणमणि ' विलखि पुकारी , हमर कलंकक छाप हरु।।देबहुँके।।
                                                             चंद्रमणि 

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

731 . हे माय अहाँ बिनु आश ककर


                                      ७३१ 
                     हे माय अहाँ बिनु आश ककर
जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर , हे माय अहाँ बिनु आश ककर ? 
जं माय अहाँ दुःख नहि सुनबइ , तँ जाय कहु ककरा कहबइ ?
करू माफ़ जननि अपराध हमर , हे माय अहाँ बिनु आश ककर ?
हम भरि जग सँ ठोकरायल  छी , माँ अहींक शरण में आयल छी , 
देखु हम पड़लहुँ बीच भँवर , हे माय अहाँ बिनु आश ककर ?
काली - लक्ष्मी - कल्याणी छी , तारा - अम्बे - ब्रह्माणी छी ,
अछि पुत्र ' प्रदीप ' बनल टूगर , हे माय अहाँ बिनु आश ककर ?
                                         प्रभुनारायण झा ' प्रदीप '

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

730 जननी , तोहर चरण जौं पाबी।


                                      ७३०
जननी , तोहर चरण जौं पाबी। 
मलयानिल चर्चित चरणाम्बुज - छवि पर शीश चढावी।। 
जननी , तोहर चरण जौं पाबी।।
गंधराज कलिकोष - उर्मिला सँ नख - पंक्ति दहाबी ,
परमानन्द विभोर - मगन - मन उर - पंकज फलकाबी।।१।।
माटी पानि , गोधन तन - भूतल मोर मराल नचाबी ,
संयम शील बढ़य जन गण मन सौरभ पाबि गुलाबी।।२।।
वीणक गुंज - कुंज सागर - तट - निर्झर - कंठ - सलाबी। 
दिवाराति संध्या ऊषा पर नयन नीर छलकाबी।।३।।
गरुता अपन शारदा - धरणी पर हिलकोरि बहाबी। 
समटि स्वतंत्र - मंत्र गंधारणव रव आकण्ठ घुलाबी।।४।।
जननी , तोहर चरण जौं पाबी। 

रविवार, 9 अप्रैल 2017

729 . जननी ! लिअ आब सुधि मोर।


                                     ७२९
जननी ! लिअ आब सुधि मोर। 
पामर दीन विहीन ज्ञान हम जानि न महिमा तोर।।
यौवन मद मे मक्त छलहुँ मा ! वनिता भोग विभोर। 
हिंसा क्रोध प्रलोभक वस मे कैल स्मरण नहि तोर।।
यमक बराहिल जरा पकड़लक अपना तन नहि जोर। 
" काञ्चिनाथ " अगति मे करइत छी मा ! मा ! मा !सोर।।
                                  " काञ्चिनाथ " झा ' किरण ' 

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

728 . जननि , वीणा - वादिनी ! व्याप्त छी संसार में अहँ ,


                                      ७२८
जननि , वीणा - वादिनी ! व्याप्त छी संसार में अहँ ,
विपुल - लोकाहलादिनी ! जननि , विणा - वादिनी !
मोह तिमिरक नाश हो। विगत रजनी भेल , मिहिरक , 
आब शारद - हास हो। विजय मंगल - शंख फूकू ,
अयि अशेष - निनादिनी ! जननि , वीणा - वादिनी !
युवक देशक क्षुब्ध यौवन ! अग्नि - बीज बजाउ , जय - जय 
करथु निर्भय क्रान्ति - वाहन। दिअह नव साहस , अखण्डित 
शक्ति प्राणोन्मादिनी।  जननि , वीणा - वादिनी !
                                                 आरसी प्रसाद सिंह  

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

727 . गोसाउनि---------------------- जय कमलासिनि। करुणागार।


                                       ७२७
                                   गोसाउनि
जय कमलासिनि। करुणागार। 
जननी ! महेश्वरि ! त्रिभुवनसारे !
रचित चतुर्भुज रुचिर बिहारे !
कुशलं वितरतु भगवति तारे !
अभिनव - भूषण - भय विनयस्ते !
मञ्जु - विपञ्ची - पुस्तक हस्ते !
श्यामनन्द विनोदिनि ! शस्ते !
शुभ्रतमे ! मम दवि नमस्ते !
                                                      श्यामानन्द झा   

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

726 . दिअ दरशन करूशन करुणामयि , सुरमुनि ठाढ़ दुआर।


                                        ७२६
दिअ दरशन करूशन करुणामयि , सुरमुनि ठाढ़ दुआर। 
दास भवन होअ उत्सव , जगत जननि दरबार।।
मणिद्वीप सुवरनमय सुरतरु तर अभिराम। 
रतन वेदि मणिमण्डप तुअ शुभ शोभाधाम।।
कखन देखब भरि लोचन , मूरति परम ललाम। 
प्रणत चरन युग सेवब , करब अनेक प्रणाम।।
ब्रह्मा हरिहर जेहि भज , आनक ककर हिसाब। 
कवि गणनाथ विनत भल , विनत मोदमय गाव।।  

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

725 . शंकरि त्रिभुवन जननि शुभंकरि , करुणामय पर शिवनारी।


                                     ७२५
शंकरि त्रिभुवन जननि शुभंकरि , करुणामय पर शिवनारी।
विश्वम्भर करुणाकर शङ्कर , उमाकान्त हर त्रिपुरारी।।
तुअ चरनन सेवारत अनुखन , काशीवास शरणसारी। 
सोमनाथ गणनाथ विनय कर , पुरहु आस कुमतिन टारी।। 

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

724 . एहि कलिकाल उच्च द्विजवर कुल जनम तकर निरवाह अम्बे।


                                     ७२४
एहि कलिकाल उच्च द्विजवर कुल जनम तकर निरवाह अम्बे। 
कयलहुँ सकल दयामयि अपनहिं , उर भरि पसर उछाह अम्बे।। 
गुरुवर भय उपदेशि निमाहल , क्रमहि सकल आदेश - अम्बे। 
काशी में थिर बास देल मोहि , भव विधि छूटल कलेश - अम्बे। 
एलहुँ सदन अपन बुझि गृह मोर , राखब नियत निवास - अम्बे। 
तुअ पद प्रेमधार हिअ उमड़ल , नयन युगल परमास - अम्बे।।
स्नेह भरल थर - थर तन पुलकित , गदगद बोल अनूप - अम्बे।।
कएल नेहाल दास करुणामयि , जीवन्मुक्त सरूप - अम्बे।।
प्रणत मगन गणनाथ जोरि कर , माँग एक वरदान - अम्बे। 
तुअ पद रत थिर तारिणि कहइत , त्यागथि देह परान -अम्बे।।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

723 . समदाउनि --------- अकथ तत्व तुअ तारिणि अम्बे महिमा अगम अपार।


                                      ७२३ 
                                  समदाउनि 
अकथ तत्व तुअ तारिणि अम्बे महिमा अगम अपार। 
पुरुष शरीर मनुज तनु धयलहु राम विदित संसार।।
अनुपम श्याम अङ्ग सम सुन्दर नयन युगल रतनार।।मर्यादा गुण सकल विहित विधि जग व्यवहार प्रचार।।
धन्य धन्य ' गणनाथ ' भेल लखि लखि छवि गुणसार।।
                                                              गणनाथ

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

722 . आब करू जनुदेरि हे मैया , मैथिल दिशि हेरु।।

                                     ७२२
आब करू जनुदेरि हे मैया , मैथिल दिशि हेरु।।
जनिके  सम्पत्ति आन दुहै अछि , अपने बन्हल मनु नेरु। 
मिथिला काम धेनु पय वञ्चित , छिन्न मलीन दुख भेरू।।
' लोचन ' मान बचाबथि कोन विधि , उद्दम चढथि सुमेरु। 
करुणामयि जननी अपने छी , नाम ककर हम टेरू।।
                                      ( मिथिला मोद )  

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

721 . ७२१ चण्डि ! तोहर मिथिला देश।।


                                       ७२१
चण्डि ! तोहर मिथिला देश।।
जकर सुपच्छिम भाग वैशाली , धारि सुन्दर वेश। 
जाहि भूमिसँ जन्म लेलहुँ , भै सुता मिथिलेश।।
तकर महिमा हीन दिन - दिन भाव भाषा भेष। 
करथि लोचन विनय कर पुर , हरु क्लेश अशेष।।
                         त्रिलोचन झा ( मिथिला - मोदसँ )  

गुरुवार, 30 मार्च 2017

720 . श्यामा --------------- श्यामा चरण कमल हम पूजब जेहि पूजे त्रिपुरारी।। सखी।।


                                    ७२०
                                 श्यामा 
श्यामा चरण कमल हम पूजब जेहि पूजे त्रिपुरारी।। सखी।।
विधि हरिहर जेहि ध्यान धरथि नित स्तुतिरत सभ असुरारी।। 
रत्नमुकुट मणि नूपुर राजित मुण्डमाल छवि न्यारी। 
भक्तानुग्रह कारिणि शंकरि मन्द हसन सुखकारी।।
राजलक्ष्मी शरणागत जानिय भव सँ लेहु उबारी।। सखी।।
                                                         राजलक्ष्मी 

बुधवार, 29 मार्च 2017

719 . जननी तनय विनय सुनु थोर हमर ह्रदय करू वास।


                                      ७१९
जननी तनय विनय सुनु थोर हमर ह्रदय करू वास। 
जननी सतत जपत मनु तोर जबतक मम घट स्वास।।
जननी कालिक पराक्रम थोर जनन मरन भय त्रास। 
जननी निरभय पद तुअ कोर जतय तनय कर वास।।
जननी करती करमक डोर लक्ष्मीपति मन आस। 
जननी तुअ सुत अति मति भोर हेरहु निज पद दास।।
                                                     ऋद्धिनाथ झा  

सोमवार, 27 मार्च 2017

718 . जानकी--------------- मङ्गलमयि मैथिलि महारानी।। ध्रु।।


                                     ७१८
                                  जानकी 
मङ्गलमयि मैथिलि महारानी।। ध्रु।।
मङ्गलमयि मिथिला भूमिक जे , स्वासिनि सब गुणखानी।  
मैथिल जनकाँ मोद प्रदायिनि , महि तनया वर -दानी।।
आदि शक्ति जगतारिणि कारिणि , हरनि सकाल दुखखानी। 
श्री साकेतधाम स्वामिनि , श्रीरामचन्द्र पटरानी।।
विष्णु भवन लक्ष्मी रूपा जे , शंकर भवन भवानी। 
कृष्ण संग वृषभानु नन्दिनी , विधि घर मधि जे बानी।।
निज जनहित अवतरि महिमण्डल , करथि दुष्ट दलहानी।।
महिमा अमित पार के पाओत , वेद ने सकथि बखानी।।
करू उद्धार कृपामयि मिथिलाकेँ , निज नैहर जानी। 
राखु शरण ' यदुवर ' जनकाँ नित रक्षा करू निज पानी।।
                              ( मिथिला - गीतांजलि ) 

रविवार, 26 मार्च 2017

717 . दुर्गा------------------------ सिंह चढलि माता असुर - निकन्दिनि मोदिनि डोल गति - दापे।


                                      ७१७
                                      दुर्गा
सिंह चढलि माता असुर - निकन्दिनि मोदिनि डोल गति - दापे।  
आयुध उग्र शोभए आठो कर जाहि डरे अरि उर काँपे।।
दूर्वा - दल सन कान्ति मनोहर , सिरें शोभ चान कलापे। 
प्रणत मुकुन्द मांगए वर दुर्गे , हरिअ त्रिविध भव - तापे।। 
                                                         तन्त्रनाथ झा 

शनिवार, 25 मार्च 2017

716 . ब्रह्माणी-------------------- ब्रह्मशक्ति जे चढिय आइलि , हंसयुक्त विमान यो।


                                     ७१६
                                  ब्रह्माणी 
ब्रह्मशक्ति जे चढिय आइलि , हंसयुक्त विमान यो। 
कमल आसन देखु सुन्दर , शोभए कुण्डल कान यो।  
चारि मुख तह वेद बाँचथि , पीत वसन विराज यो। 
कुश कमण्डलु दण्ड लय कर , चललि दैत्य समाज यौ। 
दृग लाल परम विशाल शोभित , मुकुट सुभग समारि यौ। 
सिंचित जल रण फिरहि चौदिस , शोभए भुज चल चारि यौ। 
शरण कए मन मोर सिरजल , जगत गति नहि जान यौ। 
कोहि से मन विकल कएलह , शिवदत्त पद भान यौ।
                                                              शिवदत्त  

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

715 . समदाउनि ----------- कि कहब जननि कहए नहि आबए छमिअ सकल अपराध।।


                                       ७१५
                                   समदाउनि 
कि कहब जननि कहए नहि आबए छमिअ सकल अपराध।। 
नबओ रतन नव मास वितित भेल तुअ पद लगि परमान। 
चललहुँ आज तेजि सेवकगण आकुल सभक परान।।
सून भवन देखि धिर न रहत हिअ नयन झहरि रह नोर। 
गदगद बोल अम्ब तन धर - धर हेरिअ लोचन कोर।।
चारि मास तत युगसम बुझ पड़ केहि विधि मन धर धीर। 
करुणागार दीन जनतारिणि हरिअ सकल उर पीर।।
मांगथि वर गणनाथ रमेश्वर महाराज अधिराज। 
दारा सुअन सहित मिथिलेश्वर चिर जिवथु शुभकाज।।

बुधवार, 22 मार्च 2017

714 . कमला ----------------- जय जय जगजननि भवानी त्रिभुवन जीवन - रूप।


                                      ७१४
                                   कमला 
जय जय जगजननि भवानी त्रिभुवन जीवन - रूप। 
हिमगिरिनन्दिनि थिकहुँ दयामय कमला कालि स्वरुप।। 
विधि हरि हर महिमा नहि जानथि वेद न पाबथि पार। 
आनक कोन कथा जगदीश्वरि विनमौ बारंबार।।
पूर्वज हमर जतय जे बसला आश्रित केवल तोर। 
श्रीमहेश नृप तखन शुभंकर किंकर भए तुअ कोर।।
विद्या धन निधि विधिवश पबिअ माधवसिंह नरेश।
वागमती तट भवन बनाओल दरभंगा मिथिलेश।।
हमरहु जखन राज सँ भेटल अंश अपन तुअ पास। 
पूर्ण आश धए तृणहिक धरमे कएलहुँ जननि निवास।।
क्रमिक समुन्नति शिखर चढ़ाओल करुणामयि जगदम्ब। 
राज - दार तनया देल सुत - युग राजभवन अविलम्ब।।
वागमतीक त्याग तुअ देखिअ राजनगर तुअ वास। 
राजक केन्द्र प्रधान बनाओल तुअ पद धरि विश्वास।।
सम्प्रति जलमय जगत बनाओल लीला अपरम्पार। 
राजनगर निज रक्षित राखल ई थिक करुण अपार।।
करब प्रसन्न सेवन सँ अंहकेँ ई नहि अछि अब होश। 
वसहज प्रमोद जननि करू सुत पर एकरे एक भरोस।।
जखन शरीर सबल छल तखनहु सेवत नहि हम तोहि। 
अब अनुताप - कुसुम अंजलि तजि किछु नहि फुरइछ मोहि। 
कर युग जोड़ि विनत अवनत भए करथि रमेश्वर अम्ब। 
सत चित आनन्द - रूप - दान मे करब न देवि विलम्ब।।
                                      म ० रामेश्वर सिंह 

मंगलवार, 21 मार्च 2017

713 . भगवती------------------ जय जय सकल असुर कुल नाशिनि , आदि सनातनि माया।


                                      ७१३
                                   भगवती
जय जय सकल असुर कुल नाशिनि , आदि सनातनि माया। 
गिरिवर वासिनि , शंकरवासिनि निज जन पर करू दाया।।
श्यामल रुचिर वदन तुअ राजित तड़ित विनिन्दिक नयने। 
बघछाल पहिरन कटि अति शोभित , फणि कुण्डल युग काने।।
रुचिर मुण्ड - हार उर राजित , खड्ग कर्त्तृवर हाथे। 
मोह कपाल लिधुर परिपूरित , अरु महिषासुर माथे।।
फुजल चिकुर छवि के कवि कहि सक कोउ , लोहित बिन्दु मुराजे।।
पद्मासिनि दाहिन रहु अनुखन , निज सेवक मन जानी। 
मिथिला महिपति शुभमति पूरिअ , विश्वनाथ कवि वानी।।
                                                       विश्वनाथ    

सोमवार, 20 मार्च 2017

712 . दक्षिणकालिका ------- जय जय जननी जोति तुअ जगभरि , दक्षिण पद युत नामे।


                                      ७१२
                              दक्षिणकालिका
जय जय जननी जोति तुअ जगभरि , दक्षिण पद युत नामे। 
शिशु शशि भाल , पयोधर उन्नत , सजल जलद अभिरामे।।
विकट रदन , अतिवदन भयानक , फूजल मञ्जुल केशा। 
शोणितमय रसना अति लहलह , असृकमय  सृक देशा।।
तीन नयन अति भीम राव तुअ , शवकुण्डल दुहु काने। 
शव - कर - काटि सघन पाँती कय , चहुदिशि कटि परिधाने।।
शिव शवरूप उरसि तुअ पद - युग , सदा वास समसाने। 
फरेब कर रब चहुदिशि शोभित , योगिनिधन परधाने।।
श्रीकृष्ण कवि भन , तुअ अपरूप गति , के लखि सक जगमाता। 
मिथिला - पतिक मनोरथदायिनि , सचकित हरिहर धाता।।
                                                             श्रीकृष्ण  

रविवार, 19 मार्च 2017

711 . मातङ्गी ------ राजय जगमग माँ शिवरानिया।


                                        ७११
                                   मातङ्गी  
राजय जगमग माँ शिवरानिया। 
रतन सिंहासन बैसि विण ल' कर बजबैत मधुर लय ध्वनिआँ।। 
चकमक चान चमकि लस भालहिं मधु - मद - मूनल नैन। 
वल्लकि - निक्वण - मोदित कण - कण कलकल कौरमुखक श्रुत बैन।।
विपुल नितम्ब अरुण - पट - मण्डित उरसिज - निहित - निचोल। 
मुसुकि - मुसुकि मधु मतङ्गनन्दिनि शंखपत्र चुम जनिक कपोल।।
कदम - कुसुम - कृत - माल - कलित - धृत कवरि भार , चित्राङ्कित भल। 
न्यस्त एक पद - पदमहिं से रहि दाहिनि ' मधुप 'हुँ करथु नेहाल।।

शनिवार, 18 मार्च 2017

710 . त्रिपुरभैरवी --------- समुदित सहस - सूर्य -किरणाबलि कान्ति - कलित - अभिरामा।


                                     ७१०
                               त्रिपुरभैरवी
समुदित सहस - सूर्य -किरणाबलि कान्ति - कलित - अभिरामा।   
अरुण - क्षौम - परिधान - धारिणी पुर प्रलयंकर वामा।।
वारिजात - वन्दित - वदनश्री स्मित - विजितामृत धामा। 
रक्ते रञ्जित पीनपयोधरवती सर्वदा श्यामा।।
त्रिविध - ताप - तम तरिणि तारिणी रुनझुन रसना - धामा। 
तनुक - तनुक त्रिनयनि त्रिदेव - तोषित पूरित जनकामा।।
पुस्तक - जपमालाभय वर विलसितकर निकर ललाम। 
शिशु - शशि - रत्न - सुशोभि - मकुट - मंडित , खंडित भव - भामा।।
मञ्जु मुंडमाला नागबाला पद - निपतित - सुररामा। 
देथु भैरवी - कामगवी ' मधुप ' हूँ करथु नेहाल।।
                                                         मधुप 

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

709 . दुर्गासप्तसती---------------- जय जय दुर्ग - दलनि मन दुर्गे , दुरित निवारिणि माये।


                                    ७०९
                            दुर्गासप्तसती
जय जय दुर्ग - दलनि मन दुर्गे , दुरित निवारिणि माये। 
महिष निशुम्भ शुम्भ सहारिणि , भव तारिण भव जाये।।माहे ० 
अरि सँ मिलि अनुचर नृप सुरथक , जखन हरल धन - धामे। 
एकसर भागि गहन बन अएला जत मुनि मेधस नामे।। माहे ० 
सतत विकल मन घुमइत अनुखन नहि छल किछु विसरामे। 
दुष्टों प्रजाजनक कल्याणक चिन्ता आठो यामे।। माहे ० 
भेटल वैश्य समाधि ततहि जे , छल आकुलित उदासे। 
पुत्र कपुत्र छीनि धन तकरा , देने छल वनवासे।। माहे ० 
परिचय बुझि नृप सुरथ पुछल कहु किए अंह एहन हताशे। 
कहि सभ कथा समाधि , कहल नृप ! सुनिअ हमर अभिलाषे।। माहे ० 
यदपि कुपुत्र भेल , पुनि तकरे , अछि कुशलक जिज्ञासे। 
जानि पड़य नहि हमर किएक मन लपेटल ममता पाशे।। माहे ०
सुनि नृप कहल सुनिअ हमरो मन , अछि एहने अज्ञाने। 
लूटल राज सबहि जन मिलि पुनि तकरे कुशलक ध्याने।। माहे ० 
बुझितहु मन नहि बुझए एकर अछि , कारण कओन विशेष। 
चलु दुहुजन मिलि मेघस ऋषि सँ लेब एकर उपदेश।। माहे ० 
मेधस ऋषिक समीप पहुँचि दुहु नत शिर कएल प्रणामे। 
अति विनीत भए बितल कथा कहि , कहल अपन मनकामे।। माहे ० 
मेधस कहल सुनिअ दुहु जन अहं हमर वचन दए काने। 
थिक मायाक खेल सभटा ई , सुविदित शास्त्र प्रमाने।। माहे ० 
थिकथि योगमाया ई विष्णुक हिनकर चरित अपारे। 
करथि सृष्टि ; पालथि , ओ नाशथि , अपरूप अछि बेबहारे।। माहे ० 
जकर दहिन , ई से नहि धन - सुख पबइत अछि निर्वाने। 
जकर वाम , तकरहि दुख - जीवन , घोर नरक अबसाने।। माहे ० 
मधुकैटभ हनि विधिक कएल जे त्राण प्राण भगवाने। 
से हिनकहि अतुलित बल - महिमें , कहइछ सकल पुराने।। माहे ० 
जखन महिष सन प्रबल असुर सँ हारल देव - समाजे। 
तखन शक्ति ई तकरहु मारल राखल इन्द्रक लाजे।। माहे ० 
दुष्ट निशुम्भ - शुम्भ पुनि देवक , छिनल जखन अधिकारे। 
नाना रूप धएल देवी ई , कएल असुर संहारे।। माहे ० 
धूम्रनयन ओ चंड - मुंड हनि , रक्तक लेलनि पराने। 
भेल अकंटक राज सुरेशक , कएल देव यश गाने।। माहे ० 
एहि विधि जखन दनुज - बाधा सँ हो पीड़िन संसारे। 
तखन - तखन दुष्टक दलनक हित , लेथि देवि अवतारे।। माहे ० 
तेँ अम्बाक ध्यान कए दुहुजन , करू पूजन सविधाने। 
भेटत राज अतल धन पाएब , पाएब सुविमल ज्ञाने।। माहे ० 
सुनि दुहुजन देवीक चरणमे , कएल अपन मन लीने। 
कए संयम पूजल निशिवासर , निद्राहार विहीने।। माहे ० 
तीन वर्ष पर देवि प्रकट भए पुरल दुहुक मन - कामे। 
पलटल सुरथक राज , समाधिक , भेल ज्ञान अभिरामे।। माहे ० 
सएह अहाँ दुर्गे मिथिलेशक , संकट करिअ विनाशे। 
ईशनाथ सुतकेँ नहि बिसरब , अछि मनमे विश्वासे।। माहे ० 
                                                    ईशनाथ झा       

बुधवार, 15 मार्च 2017

708 . धूमावती -------------- धयल षोडसी श्यामा सुषमा धामा अपन नयान।


                                       ७०८
                                   धूमावती
धयल षोडसी श्यामा सुषमा धामा अपन नयान। 
कयल त्रिपुर - सुन्दरी नयन - अभिरामा अनुखन ध्यान।।  
कर - कमला कोमल कमला कय ह्रदय - कमल सन्धान। 
तारिणि तारा तरल द्वितीया दिस टकटकी निदान।।
छली शारदा हमर उपास्या वीणा पुस्त संग। 
स्मितमुखी गीत कवित संगीत ललित लय भरथि उमंग। 
अथवा मदिरारुण - नयन मधु - वयना छवि छविवंति। 
घर - आँगन चानन छिटकाबथि भरथि सुरभि रसवंति।।
किन्तु नियत छल , उचरल मंत्र अदृष्ट , दुष्ट परिणाम। 
इष्ट बनलि आयली घर हमर अदृष्ट देवता वाम।।
धूमावती सती , वयसा वरिष्ठ , वचसा कटु क्लिष्ट। 
रूप बिरुपा , प्रकृति अनूपा , कृतिहु विकृत , नहि शिष्ट।।
मलिनवसन घर - द्वारि बहारथि बाढ़नि हाथहि नित्य। 
जेना कोनो आयलि छथि वेतन - भोगिनि कोनहु भृत्य।।
सूप हाथ किछु किछु सदिखन फटकैत अन्न भरिपुर। 
बिच - बिच गुन - गुन सोहर लगनी गबइत बिनु धुनि सूर।।
शययागृह सँ भनसा - घर जनिका रूचि बढ़ल विसेष। 
जे पड़ोसिनिक बात पुछै छथि , खबरि न देश - विदेश।।
ज्ञान जनिक बच्चा - जच्चा धरि ध्यानों धरे कुटुम्ब। 
अक्षर जनिक गोसानि नाओं धरि पोथी पतरा लम्ब।।
मन छल विमन , कोना खन काटब विरुचि , न रूचि विज्ञानं। 
दृगक प्यास भेटैत कोना ? ताकल भगवति भगवान।।
देखल अहा ! भगवति ! धूमावती निरूपित रूप। 
स्वयं महाविद्या परतच्छे तन - मन सबहु अनूप। 
स्वर्ण अन्न सँ भरल सूप , बाढ़नि स्वच्छता प्रतीक। 
श्रमक स्वास्थ्य - सौन्दर्य दिव्य आन्तरिक रूप रूचि लीक।।
पुनि छलि लगहि छिन्नमस्ता करइत जे नव - संकेत। 
छिन्न अपन मस्तक कय उर - रुधिरहु दय भरी निकेत।।
विदित महाविद्या धूमावति हमर देवता इष्ट। 
धन्य जीवनक क्षण , क्षणभरि यदि दर्शन पुरल अभीष्ट।।
श्यामा उमा अन्नपूर्णा सभ एतय समन्वित रूप। 
धन्य कयल अनुरक्त भक्तकेँ , जयतु देवि अनुरूप।।
                                                  सुरेन्द्रझा ' सुमन '

सोमवार, 13 मार्च 2017

707 . भगवती ------ जय भय भंजनि , सुर - मुनि रञ्जनि , जय इन्द्रादिक शरणे।


                                       ७०७
                                   भगवती
जय भय भंजनि , सुर - मुनि रञ्जनि , जय इन्द्रादिक शरणे।
के नहि पूजि पाओल वांछित फल , श्रुति - वन्दित तुअ चरणे।।
जय जय मधुकैटभ - बधकारिणी महिषासुर कए नाशे। 
सुरगणकेँ स्वर्गहि पठाओल , कएल दूर सभ त्रासे।।
धूम्रनयन सन विकट दैत्य केँ डाहि मिलाओल माटी। 
चण्ड मारि मुंडक दाढ़ी धए , झटिति लेल शिर काटी।।
रक्त बीज सन अतुल पराक्रम जकर न बधक उपाय। 
तकरा दाबि दांतितर लगले काँचे लेलहुँ चिबाए।।
जकरा भय - कातर इन्द्रादिक , स्वर्गहु सँ रहु काते। 
तेहने निशुम्भ - शुम्भकेँ मारल , शमन कएल उतपाते।।
निशिवासर भगवति - पद - सेवक कवि जीवानन्द भाने। 
श्रीकामेश नृपति काँ हेरिह सुरथ नृपाल समाने।।  
                                                                       जीवानन्द