सोमवार, 11 जनवरी 2016

562 . काली पीठ समस्तीपुर 848101




ब्रह्मलीन श्री श्री १००८  पं. कैलाश झा उर्फ़  ( लाल बाबा ) ( कालिकानन्द बाबा ) संस्थापक काली पीठ समस्तीपुर ८४८१०१ ( १० - ०२ - १९४० ----- ११ - ०७ - २०११ )   काली पीठ के 
स्थानीय कार्यक्रम - चारों नवरात्र यथा -चैत्र , आषाढ़ी , आश्विन एवं माघी नवरात्रि ! महा काली पूजा - दीपावली को ! महा लक्ष्मी पूजा - कोजगरा एवं दीपावली को ! महा सरस्वती पूजा - बसंत पञ्चमी को ! शत चण्डी यज्ञ - चैत्र नवरात्र में ! खिचड़ी का भोग - प्रत्येक शनिवार संध्या को ! खीर का भोग - प्रत्येक मंगलवार संध्या को ! भजन संध्या - प्रत्येक बृहस्पतिवार , शनिवार एवं विशेष पर्व त्योहारों पर ! हवन - प्रत्येक पूर्णिमा , अमावश्या एवं विशेष पर्व त्योहारों पर !
समस्तीपुर जंक्शन के समीप शहर के टुनटुनिया गुमटी (फुट ओवरब्रिज) से सटे कालीपीठ की भव्यता और दिव्यता देखते ही बनती है। यह मंदिर परंपरागत स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। यहां तीनों महाशक्तियां महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती विराजमान हैं। मंदिर में एकबार आने मात्र से परम शांति की अनुभूति होती है। कहते हैं कि यहां आने वाले भक्तों का तीनों महाशक्तियां मिलकर कल्याण करती हैं। सच्चे मन से जो कुछ भी मांगा जाता है, वह मनोरथ अवश्य पूरा होता है। मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है।
 इस कालीपीठ का निर्माण 1982 में मधुबनी जिला के  पिलखवार  निवासी पं कैलाश बाबा पुत्र स्व मुरलीधर झा माता कामा देवी  के द्वारा हुआ था। इसकी स्थापना की जड़  में बड़ी रोचक कहानी है।  
ब्रह्मलीन श्री श्री १००८  पं. कैलाश झा आर एम एस में नौकरी करते थे। ई सन 1971 में उनका तबादला समस्तीपुर स्टेशन स्थित आर एम एस में हो गया । यहाँ आने की इक्षा धारणा उनकी कभी नहीं थी पर भाग्य का खेल किसे पता होता है सो वे यहां आ गए। वे बचपन से शक्ति के परम उपासक थे। युवा अवस्था में ही इन्होने तप बल से जनकल्याण हेतु अनेक सिद्धियां अर्जित कर ली थी ! अपने सेवा काल में भी दुर्गासप्तशती पाठ की निरंतरता उनकी कभी भंग नहीं हुई यह क्रम ट्रेन ड्यूटी में भी अबाध जारी रहा  ! यहां आने के कुछ वर्षों  बाद अपनी नौकरी के साथ - साथ  वे जितवारपुर शमसान घाट स्थित मां काली की सेवा भी  करने लगे । इनके सेवा आराधना  काल में स्थान का चतुर्दिक विकास हुआ । समाज में काफी यश प्रतिष्ठा प्राप्त हुई ! कुछ अपरिहार्य कारणों से इस स्थान का उन्हें परित्याग करना पड़ा ! वहां एक अँधा भक्त बाबूजी माँ की सेवा में निःस्वार्थ भाव से रत रहता था जिसकी आँखे कालांतर में ठीक हो गयी , भक्तों का कहना है कि बाबूजी के आशीर्वाद से उसे दृष्टि प्राप्त हुई ! बाबूजी के स्थान छोड़ने के उपरांत बाबूजी ने स्थान की पूजा पाठ की जवाबदेही उसे ही सौंपी ! स्थान छोड़ने के उपरांत  इनमे अगाध आस्था रखने वाला भक्त समाज घर पर ही पहुँचने लगे इससे मकान मालिक काफी असहज होने लगे परन्तु उनकी माँ की आराधना निरंतर चलती रही !  वे वर्ष 1980 में सावन पूर्णिमा को हवन यज्ञ करने के विचार से सायकिल पर हवन सामग्री रख कर स्टेशन होते हुए थानेश्वर महादेव स्थान की ओर चल पड़े । थानेश्वर स्थान के ठीक उत्तर दिशा में टुनटुनिया गुमटी के पास सिग्नल के तार में सायकिल का पैडल उलझ जाने के कारण सायकिल से उतरना पड़ा ! उसी क्षण उनके मन में ख्याल आया कि थानेश्वर स्थान पे हवन करने पर वहाँ के पंडित हो सकता है शुद्धि अशुद्धि को लेकर कुछ व्यंग करने लगें तो हवन करके भी मन को शान्ति नहीं मिलेगी ! इसी उधेड़ बुन में उनकी नजर गुमटी के पीछे रेलवे की पानी टंकी के निर्जन एकांत स्थान पर पड़ी तो उनके मन में विचार उत्त्पन्न हुआ कि क्यों न इसी स्थान पर ऊपर माँ गंगे नीचे मैं बैठ कर यहीं हवन करूँ ! यह विचार प्रबल होते ही सायकिल मोड़ टंकी के निचे हवन संपन्न कर जब चलने को उद्द्यत हुए तो एक बूढ़ी माता आई और बोली कि हवन यहां नहीं वहां (कुछ दूर अलग इंगित करती हुई) कही कि उस पीपल वृक्ष के पास करनी चाहिए थी । वहीं पर तुम अपनी साधना भी करना । उस अँधेरे में घने जंगल झाड़ में वह तीन चार फीट का छोटा सा पीपल दिख भी नहीं रहा था ! बूढी माता ने पास ले जाकर वह स्थान दिखला दिया ! यह कहकर वह चली गई कि अब से यहीं आराधना करना । फिर कभी उस बूढी माता के दर्शन वहाँ नहीं हुए ! जिधर बूढ़ी माता ने इंगित किया था , उस स्थान पर चारों तरफ जंगली झाड़ियाँ , घास-फूस उगे थे। जब वहां से निकलने लगे उसी समय पाँच लोग वहाँ आये और उन्होंने भी बूढी माता के कहे बातों को ही दोहराया ! बाबूजी के ये कहने पर कि यहाँ तो काफी जंगल और गंदगी है तो उन पांचों ने कहा ये जगह साफ हो जायेगा ! बाबूजी सुबह जब वहाँ पहुंचे तो वास्तव में वह स्थान बिल्कुल चमक रहा था। उस रात के बाद फिर वे पाँचों वहाँ कभी नहीं दिखे ! बाबूजी का वहाँ नियमित रूप से सुबह शाम माँ की आराधना शुरू हो गयी ! बाबूजी के भक्त समाज को मानो ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा ! भक्तो को अपने दुःख दूर करने का एक ठिकाना जो मिल गया था ! अचानक एक रोज एक भक्त वहां आकर काली माता का फोटो दे गए और अनुरोध किया कि बाबा माँ को यहाँ देखना चाहते हैं । फोटो रखकर वहां कैलाश बाबा पूजा-उपासना करने लगे। भक्तों की भीड़ जुटने लगी । अनवरत पूजा-आराधना शुरू हो गई। बाबूजी का तप , सिद्धि माता की अनुकंपा और भक्तों की श्रद्धा से २६ - १० - १९८२  में यहां माँ महा काली की स्थापना हुई । इसमें मां महाकाली की आदमकद दिव्य प्रतिमा प्रतिष्ठापित की गई। बाद में 1999 में मां के गर्भगृह से सटे पूरब माता महालक्ष्मी और 2000 में पश्चिम में माता महासरस्वती की स्थापना कराई गई। मंदिर के सामने हवन कुंड है। नवरात्र में कलश स्थापना के दिन और नवमी को हवन करने के लिए भक्तों की अपार भीड़ उमड़ पड़ती है। परिसर में तुलसी चौरा , बृहस्पति स्थान , ब्रह्म बाबा स्थान ( जहाँ प्रथम पूजा प्रारम्भ हुई थी ) , शनि स्थान , बजरंगवली ध्वज स्थान तथा महादेव स्थान अवस्थित है ! परिसर में स्थित पूजनीय वृक्ष धात्री ( आँवला ) , पीपल , बड़गद , केला , आम , महुआ आदि हैं !  विंध्यवासनी - कैलाश झा पुस्तकालय भी परिसर में स्थित है जिसमे सैकड़ों धार्मिक पुस्तकें यथा वेद , पुराण , उपनिषद , तंत्र , मन्त्र , ज्योतिषीय  एवं अनेकानेक धर्म ग्रन्थ उपलब्ध हैं ! 
वर्तमान में संस्थापक  ब्रह्मलीन श्री श्री १००८  पं. कैलाश झा उर्फ़  ( लाल बाबा ) ( कालिकानन्द बाबा ) के तीनो पुत्र सुधीर कुमार झा , बिनय कुमार झा एवं बसंत कुमार झा माँ की सेवा में रत हैं !
परम पूजनीय बाबूजी / गुरूजी के कुछ सिद्धियों का मैं भी प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ !बहुत छोटे में अपने मामा के जनेऊ में ननिहाल में था तो एक रोज अचानक गाँव में आग लग गयी ! बाबूजी के बारे में जो जानते थे वे दौड़े दौड़े उनके पास आकर उन्हें आग से गाँव की रक्षा करने का अनुरोध करने लगे तो उन्होंने पीली सरसों मंगवाकर आग लगे घर के आगे से अग्नि को बांध दिया जिसके फलस्वरूप आगे के घरों का एक तिनका भी नहीं जला !
                                       मैं सात आठ साल का रहा हूँगा जब मैं बहुत बीमार पड़ गया था और कोई भी सुई दवा महीनो लेने के बाद भी कोई सुधार नहीं हो रहा था तो एक रोज अपने मन्त्र सिद्धि के बल पर मेरे शरीर पर मन्त्र का प्रयोग करते हुए अपने मुख से मेरे शरीर के बीमारी के कारण बने माँस के एक छोटे टुकड़े को बाहर निकाल फेंके और मैं पूरी तरह स्वस्थ हो गया !
                                   बाबूजी के वाक्य सिद्धि के महिमा से अनेको अनन्य श्रद्धालु भक्तों के एक से एक असाध्य कष्ट दूर हो जाते थे ! 
मेरे पूज्य नाना जी गंगाधर झा क्षेत्र में मालिक के नाम से जाने जाते थे ] लोगों की श्रद्धा उनके प्रति इतनी थी कि उनके सामने से कोई जूता चप्पल पहन कर नहीं गुजरता था ] कोई भी फैसला के लिए दूर दूर से लोग उनके पास आते और दुर्गास्थान में उनके पांव छू कर  अपने अपने को निर्दोष सिद्ध करते परंतु जो दोषी होते उन्हें चौबीस घंटे के अंतर्गत प्राकृतिक दण्ड प्राप्त हो जाता था ! उनकी इस देवी शक्ति की ख्याति दूर  दूर तक फैली हुई थी !
                         मेरे परम पूज्य पर नाना शोरेलाल झा दरभंगा महाराज से सात सौ बीघे के इन्हे जमींदारी प्राप्त हुई थी ! ये दरभंगा महाराज के भाई राजा रामेश्वर सिंह के गुरु थे ! ये महान सिद्ध देवी साधक थे ! शक्ति ऐसी थी कि यदि किसी के आगे सर झुक जाये तो उसके सर के दो टुकड़े हो जाये ! इस बात की परीक्षा दरभंगा महाराज के दरबार में हुई थी ! दरभंगा में राजा के द्वारा सिद्ध माँ श्यामा माई की       स्थापना करवाई थी ! 
                      मेरे परम पूज्य वृद्ध पर नाना  महामहोपाध्या दुर्गादत्त झा जन्म लेते ही इनके मुख से वेद वाक्य निकलने लगे थे ! ये महान सिद्ध साधक थे ! इनके वस्त्र आकाश में सूखते थे ! भोजन की थाल माँ दुर्गा स्वयं देती थी ! ये महान सिद्ध साधक महामहोपाध्या मदन उपाध्याय के गुरु थे ! इन्होने ही समौल में दुर्गास्थान की स्थापना की थी ! 

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