गुरुवार, 15 अक्तूबर 2015

553 . ४ - कूष्माण्डा


५५३ 
४ - कूष्माण्डा 
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च !
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे !
माँ दुर्गाजी के चौथे स्वरुप का नाम कूष्माण्डा है ! अपनी मन्द , हलकी हंसी द्वारा अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से अभिहित किया गया है !
जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था , चारों ओर अंधकार ही अन्धकार परिव्याप्त था , तब इन्हीं देवी ने अपने ' ईषत ' हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी ! अतः यही सृष्टि की आदि - स्वरूपा , आदि शक्ति हैं ! इनके पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व था ही नहीं ! इनका निवास सूर्यमण्डल के भीतर के लोक में है ! सूर्य लोक में निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है ! इनके शरीर की कान्ति और प्रभा भी सूर्य के समान ही देदीप्यमान और भास्वर हैं ! इनके तेज की तुलना इन्हीं से की जा सकती है ! अन्य कोई भी देवी - देवता इनके तेज और प्रभाव की समता नहीं कर सकते ! इन्ही के तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं ! ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है !
इनकी आठ भुजाएँ हैं ! अतः ये अष्ट भुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं ! इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डलु , धनु , बाण , कमल - पुष्प , अमृतपूर्ण कलश , चक्र तथा गदा हैं ! आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है ! इनका वाहन सिंह है ! संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा कुम्हड़े को कहते हैं ! बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय हैं ! इस कारण से भी ये कूष्माण्डा कही जाती हैं !
नवरात्र - पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरुप की ही उपासना की जाती है ! इस दिन साधक का मन ' अनाहत ' चक्र में अवस्थित होता है ! अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचञ्चल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरुप को ध्यान में रखकर पूजा - उपासना के कार्य में लगना चाहिए ! माँ कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग - शोक विनष्ट हो जाते हैं ! इनकी भक्ति से आयु , यश , बल और आरोग्य की वृद्धि होती है ! माँ कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होनेवाली हैं ! यदि मनुष्य सच्चे ह्रदय से इनका शरणागत बन जाये तो फिर उसे अत्यंत सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती हैं ! 
हमें चाहिए कि हम शास्त्रों - पुराणों में वर्णित विधि - विधान के अनुसार माँ दुर्गा की उपासना और भक्ति के मार्गपर अहर्निश अग्रसर हों ! माँ के भक्ति - मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है ! यह दुःख स्वरुप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है ! माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग हैं ! माँ कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधियों - व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख , समृद्धि और उन्नति की ओर ले जानेवाली हैं ! अतः अपनी लौकिक - पारलौकिक उन्नति चाहनेवालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए ! 

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