शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

555 . ६ - कात्यायनी


५५५ 
६ - कात्यायनी 
चन्द्रहासोज्जवलकरा शार्दूलवरवाहना !
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवधातिनि !!
माँ दुर्गा जी के छटवें स्वरुप का नाम कात्यायनी है ! इनका कात्यायनी नाम पड़ने की कथा इस प्रकार है - कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे !उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए ! इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे ! इन्होने भगवती पराम्बाकी उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी ! उनकी इक्षा थी कि माँ भगवती उनके घर पुत्रीके रूपमें जन्म लें ! माँ भगवतीने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली थी !
कुछ काल पश्चात् जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा , विष्णु , महेश तीनोंने अपने - अपने तेजका अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया ! महर्षि कात्यायनने सर्वप्रथम इनकी पूजा की ! इसी कारण से यह कात्यायनी कहलायीं !
ऐसी भी कथा मिलती है कि  ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूपसे उत्पन्न भी हुई थीं ! आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी , अष्टमी तथा नवमी तक - तीन दिन - इन्होने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था !
माँ कात्यायनी अमोध फलदायिनी हैं ! भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए व्रज की गोपियों ने इन्हींकी पूजा कालिंदी - यमुना के तट पर की थी ! ये व्रजमण्डल की अधिष्ठात्री देवी के रूपमें प्रतिष्ठित हैं ! इनका स्वरुप अत्यंत ही भव्य और दिव्य है ! इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला और भास्वर है ! इनकी चार भुजाएं हैं ! माताजी का दाहिनी तरफ का उपरवाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचेवाले वरमुद्रामें है ! बायीं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचेवाले हाथ में कमल - पुष्प सुशोभित है ! इनका वाहन सिंह है !
दुर्गापूजा के छटवें दिन इनके स्वरुप की उपासना की जाती है ! उस दिन साधक का मन ' आज्ञा ' चक्र में स्थित होता है ! योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है ! इस चक्र में स्थित मनवाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है ! परिपूर्ण आत्मदान करनेवाले ऐसे भक्त को सहज भाव से माँ कात्यायनी के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं ! माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ , धर्म , काम , मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है ! वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है ! उसके रोग , शोक , संताप , भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं ! जन्म - जन्मान्तर के पापों को विनष्ट करने के लिए माँ की उपासना से अधिक सुगम और सरल मार्ग दूसरा नहीं है ! इनका उपासक निरन्तर इनके सान्निध्य में रहकर परमपद का अधिकारी बन जाता है ! अतः हमें सर्वोतोभावेन माँ के शरणागत होकर उनकी पूजा उपासना के लिए तत्पर होना चाहिये !

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