शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

554 .५ - स्कन्दमाता


५५४ 
५ - स्कन्दमाता 
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्व्या !
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी !!
माँ दुर्गाजी के पाँचवें स्वरुप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है ! ये भगवान स्कन्द ' कुमार कार्तिकेय ' नाम से भी जाने जाते हैं ! ये प्रसिद्ध देवासुर - संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे ! पुराणों में इन्हें कुमार और शक्तिधर कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है ! इनका वाहन मयूर है ! अतः इन्हें मयूरवाहन के नाम से भी अभिहित किया गया है ! 
इन्हीं भगवान स्कन्द की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस पांचवें स्वरुप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है ! इनकी उपासना नवरात्रि - पूजा के पांचवें दिन की जाती है ! इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है ! इनके विग्रह में भगवान स्कन्द जी बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं ! स्कन्दमातृस्वरूपणी देवी की चार भुजाएं हैं ! ये दाहिनी तरफ की ऊपरवाली भुजा से भगवान स्कन्द को गोद में पकडे हुए हैं और दाहिनी तरफ की नीचेवाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई है उसमे कमल - पुष्प हैं ! बायीं तरफ की ऊपरवाली भुजा वरमुद्रा में तथा नीचेवाली भुजा जो ऊपरकी ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुईं हैं ! इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है ! ये कमल के आसनपर विराजमान रहती हैं ! इसी कारण से इन्हें पदमासना देवी भी कहा जाता है ! सिंह भी इनका वाहन है !
नवरात्र पूजन के पाँचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्त्व बताया गया है ! इस चक्र में अवस्थित मनवाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है ! वह विशुद्ध चैतन्य स्वरुप की ओर अग्रसर हो रहा होता है ! उसका मन समस्त लौकिक , सांसारिक , मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना माँ स्कंदमाता के स्वरुप में पूर्णतः तल्लीन होता है ! इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिये ! उसे अपनी समस्त ध्यान - वृतियों को एकाग्र रखते हुए साधन के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए !
माँ स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं ! इस मृत्यु लोक में ही इसे परम शान्ति और सुख का अनुभव होने लगता है ! उसके लिए मोक्षका द्वार स्वयमेव सुलभ हो जाता है ! स्कन्दमाता की उपासना से बालरूप स्कन्दभगवान की उपासना भी स्वयमेव हो जाती है ! यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है , अतः साधक को स्कन्दमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए ! सूर्यमण्डल की अधिष्टात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कान्ति से संपन्न हो जाता है ! एक अलौकिक प्रभामण्डल अदृश्यभाव से सदैव उसके चतुर्दिक परिव्याप्त रहता है ! यह प्रभामण्डल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता रहता है ! 
अतः हमें एकाग्रभाव से मन को पवित्र रखकर माँ की शरण में आने का प्रयत्न करना चाहिये ! इस घोर भवसागर के दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है !

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

553 . ४ - कूष्माण्डा


५५३ 
४ - कूष्माण्डा 
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च !
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे !
माँ दुर्गाजी के चौथे स्वरुप का नाम कूष्माण्डा है ! अपनी मन्द , हलकी हंसी द्वारा अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से अभिहित किया गया है !
जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था , चारों ओर अंधकार ही अन्धकार परिव्याप्त था , तब इन्हीं देवी ने अपने ' ईषत ' हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी ! अतः यही सृष्टि की आदि - स्वरूपा , आदि शक्ति हैं ! इनके पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व था ही नहीं ! इनका निवास सूर्यमण्डल के भीतर के लोक में है ! सूर्य लोक में निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है ! इनके शरीर की कान्ति और प्रभा भी सूर्य के समान ही देदीप्यमान और भास्वर हैं ! इनके तेज की तुलना इन्हीं से की जा सकती है ! अन्य कोई भी देवी - देवता इनके तेज और प्रभाव की समता नहीं कर सकते ! इन्ही के तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं ! ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है !
इनकी आठ भुजाएँ हैं ! अतः ये अष्ट भुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं ! इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डलु , धनु , बाण , कमल - पुष्प , अमृतपूर्ण कलश , चक्र तथा गदा हैं ! आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है ! इनका वाहन सिंह है ! संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा कुम्हड़े को कहते हैं ! बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय हैं ! इस कारण से भी ये कूष्माण्डा कही जाती हैं !
नवरात्र - पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरुप की ही उपासना की जाती है ! इस दिन साधक का मन ' अनाहत ' चक्र में अवस्थित होता है ! अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचञ्चल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरुप को ध्यान में रखकर पूजा - उपासना के कार्य में लगना चाहिए ! माँ कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग - शोक विनष्ट हो जाते हैं ! इनकी भक्ति से आयु , यश , बल और आरोग्य की वृद्धि होती है ! माँ कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होनेवाली हैं ! यदि मनुष्य सच्चे ह्रदय से इनका शरणागत बन जाये तो फिर उसे अत्यंत सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती हैं ! 
हमें चाहिए कि हम शास्त्रों - पुराणों में वर्णित विधि - विधान के अनुसार माँ दुर्गा की उपासना और भक्ति के मार्गपर अहर्निश अग्रसर हों ! माँ के भक्ति - मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है ! यह दुःख स्वरुप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है ! माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग हैं ! माँ कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधियों - व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख , समृद्धि और उन्नति की ओर ले जानेवाली हैं ! अतः अपनी लौकिक - पारलौकिक उन्नति चाहनेवालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए ! 

बुधवार, 14 अक्टूबर 2015

552 . ३ - चन्द्रघण्टा

५५२ 
३ - चन्द्रघण्टा 
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चन्द्कोपास्वकैर्युता !
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता !!

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम ' चन्द्रघण्टा ' है ! नवरात्रि - उपासना में तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन आराधन किया जाता है ! इनका यह स्वरुप परम शान्तिदायक और कल्याणकारी है ! इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है , इसी कारण से इन्हें चन्द्रघण्टा देवी कहा जाता है ! इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है ! इनके दस हाथ हैं ! इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि विभूषित हैं ! इनका वाहन सिंह है ! इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्दत रहने की होती है ! इनके घण्टे की सी भयानक चाँद ध्वनि से अत्याचारी दानव - दैत्य - राक्षस सदैव प्रकम्पित रहते हैं !
नवरात्र की दुर्गा - उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्त्व है ! इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है ! माँ चन्द्रघण्टा की कृपा से उसे अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं ! दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनायी देती हैं ! ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं ! 
माँ चन्द्रघण्टा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएं विनष्ट हो जाती हैं ! इनकी आराधना सद्यः फलदायी हैं ! इनकी मुद्रा सदैव युद्ध के लिए अभिमुख रहने की होती है , अतः भक्तों के कष्ट का निवारण ये अत्यंत शीघ्र कर देती हैं ! इनका वाहन सिंह है अतः इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है ! इनके घण्टे  की ध्वनि सदा अपने भक्तों की प्रेत - बाधादि से रक्षा करती रहती हैं ! इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घण्टे की ध्वनि निनादित हो उठती है ! 
दुष्टों का दमन और विनाश करने में सदैव तत्पर रहने के बाद भी इनका स्वरुप दर्शक और आराधक के लिए अत्यंत सौम्यता एवं शान्ति से परिपूर्ण रहता है ! इनकी आराधना से प्राप्त होनेवाला एक बहुत बड़ा सद्गुण यह भी है कि साधक में वीरता - निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का भी विकास होता है ! उसके मुख नेत्र तथा सम्पूर्ण काया में कान्ति - गुण की वृद्धि होती है ! स्वर में दिव्य अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है ! माँ चन्द्रघण्टा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शान्ति और सुख का अनुभव करते हैं ! ऐसे साधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है ! यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखलायी नहीं देती , किन्तु साधक और उसके सम्पर्क में आनेवाले लोग इस बात का अनुभव भलीभांति करते रहते हैं ! 
हमें चाहिये कि अपने मन , वचन , कर्म एवं काया को विहित विधि विधानके अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके माँ चन्द्रघण्टा के शरणागत होकर उनकी उपासना - आराधना में तत्त्पर हों ! उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं ! हमें निरन्तर  उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिये ! उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति को देनेवाला है !   

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

551 . २ - ब्रह्मचारिणी



                     फोटो गूगल से साभार 
५५१ 
२ - ब्रह्मचारिणी 
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू  !
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिणियनुत्तमा !!
माँ दुर्गा की नव शक्तियों का दूसरा स्वरुप ब्रह्मचारिणी का है ! यहाँ ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या है ! ब्रह्मचारिणी अर्थात तप की चारिणी - तप का आचरण करनेवाली ! कहा भी है - वेदस्तत्वं तपो ब्रह्म - वेद , तत्व और तप ब्रह्म शब्द के अर्थ हैं ! ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरुप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है ! इनके दाहिने हाथमे जपकी माला एवं बायें हाथ में कमण्डलु रहता है !
अपने पूर्वजन्म में जब ये हिमालय के घर पुत्री - रूप में उत्पन्न हुई थीं तब नारद के उपदेश से इन्होने भगवान शंकर जी को पति - रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन तपस्या की थी ! इसी दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया ! एक हजार वर्ष उन्होंने केवल फल मूल खाकर व्यतीत किये थे ! सौ वर्षों तक केवल शाकपर निर्वाह किया था ! कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखते हुए खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के भयानक कष्ट सहे ! इस कठिन तपश्चर्या के पश्चात तीन हजार वर्षों तक केवल जमीन पर टूटकर गिरे हुए बेलपत्रों को खाकर वह अहर्निश भगवान शंकर की आराधना करती रहीं ! इसके बाद उन्होंने सूखे बेलपत्रों को भी खाना छोड़ दिया ! कई हजार वर्षों तक वह निर्जल और निराहार तपस्या करती रहीं ! पत्तों को भी खाना छोड़ देने के कारण उनका एक नाम अपर्णा भी पड़ गया !
कई हजार वर्षों की इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का वह पूर्वजन्म का शरीर एकदम क्षीण हो उठा ! वह अत्यंत ही कृशकाय हो गयीं थी ! उनकी यह दशा देखकर उनकी माता मेना अत्यंत दुःखित हो उठीं !उन्होंने उन्हें उस कठिन तपस्या से विरत करने के लिए आवाज दी ' उ मा ' अरे ! नहीं , ओ ! नहीं ! तबसे देवी ब्रह्मचारिणी का पूर्वजन्म का एक नाम उमा भी पड़ गया था ! 
उनकी इस तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया ! देवता ऋषि , सिद्धिगण , मुनि सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूतपूर्व पूर्णकृत्य बताते हुए उनकी सराहना करने लगे ! अंतमे पितामह ब्रह्माजी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें सम्बोधित करते हुए प्रसन्न स्वरों में कहा - हे देवि ! आजतक किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की थी ! ऐसी तपस्या तुम्हीं से संभव थी ! तुम्हारे इस अलौकिक कृत्य की चतुर्दिक सराहना हो रही है ! तुम्हारी मनोकामना सर्वोतोभावेन परिपूर्ण होगी ! भगवान चंद्रमौलि शिव जी तुम्हे पति रूप में प्राप्त होंगे ! अब तुम तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ ! शीघ्र ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं ! 
माँ दुर्गा जी का यह दूसरा स्वरुप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देनेवाला है ! इनकी उपासना से मनुष्यमें तप , त्याग , वैराग्य , सदाचार , संयम की वृद्धि होती है ! जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता ! माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है ! दुर्गापूजा के दूसरे दिन इन्हींके स्वरुप की उपासना की जाती है ! इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होता है ! इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है !   

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

550 . माँ दुर्गाजी इस सृष्टि की आदि शक्ति हैं !



                              साभार - गूगल 
५५० 
माँ दुर्गाजी इस सृष्टि की आदि शक्ति हैं ! पितामह ब्रह्माजी , भगवान विष्णु और भगवान शंकरजी उन्हीकी शक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति , पालन पोषण और संहार करते हैं ! अन्य देवता भी उन्हीकी शक्तिसे शक्तिमान होकर सारे कार्य करते हैं ! माँ दुर्गाजी के नव रूप हैं ! उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं ----
१ - शैलपुत्री 
२ - ब्रम्ह्चारणी 
३ - चंद्रघंटा 
४ - कुष्मांडा 
५ - स्कंदमाता 
६ - कात्यायनी 
७ - कालरात्रि 
८ - महागौरी 
९ - सिद्धिदात्री !
माँ दुर्गाजी द्वारा ये नव रूप धारण किये जानेके विविध हेतु हैं ! दुर्गापूजाके अवसरपर इन नव रुपोंकी पूजा - उपासना विधि - विधानके साथ की जाती है ! हमें माँ के इन नव रुपोंसे परिचित होना चाहिए ! इन रुपोंके पीछे निहित तात्विक अवधारणाओंका परिज्ञान हमारे धार्मिक , सांस्कृतिक , सामाजिक , विकासके लिए अपरिहार्य रूपसे आवश्यक है !
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१ - शैलपुत्री 
वन्दे वांछितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम !
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् !!

माँ दुर्गा अपने पहले स्वरुप में " शैलपुत्री " के नाम से जानी जाती हैं ! पर्वतराज हिमालयके वहाँ पुत्रीके रूपमे उत्पन्न होनेके कारण इनका यह " शैलपुत्री " नाम पड़ा था ! वृषभ - स्थिता इन माताजीके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल - पुष्प सुशोभित हैं ! यही नव दुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं !अपने पूर्वजन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं ! तब इनका नाम सती था ! इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था ! एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया ! इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना - अपना यज्ञ - भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया ! किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यग में निमंत्रित नहीं किया ! सती ने जब सुना की हमारे पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं , तब वहां जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा ! अपनी यह इक्षा उन्होंने शंकर जी को बतायी ! सारी बातों पर विचार करनेके बाद उन्होंने कहा - " प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं ! अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है ! उनके यज्ञ - भाग भी उन्हें समर्पित किये हैं , किन्तु हमें जान बूझकर नहीं बुलाया है ! कोई सूचनातक नहीं भेजी है ! ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेष्कर नहीं होगा ! शंकर जी के इस उपदेशसे सती का प्रबोध नहीं हुआ ! पिता का यज्ञ देखने , वहां जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी ! उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जानेकी अनुमति दे दी !
सती ने पिता के घर पहुँच कर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात - चीत नहीं कर रहा है ! सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं ! केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया ! बहनो की बातों में व्यंग और उपहास के घाव भरे हुए थे ! परिजनों के इस व्यव्हार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुंचा ! उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकर जी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है ! दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे !यह सब देख कर सती का ह्रदय क्षोभ , ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा ! उन्होंने सोंचा भगवान शंकर जी की बात न मान , यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है ! 
वह अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं ! उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जला कर भस्म कर दिया ! व्रजपात के समान इस दारुण - दुःखद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया ! 
सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया ! इस बार वह ' शैलपुत्री ' नाम से विख्यात हुई ! पार्वती , हेमवती भी उन्ही के नाम हैं ! उपनिषद की एक कथा के अनुसार इन्हीने हेमवती स्वरुप से देवताओं का गर्व - भंजन किया था !
' शैलपुत्री ' देवी का विवाह भी शंकर जी से ही हुआ ! पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी वह शिवजी की अर्धांग्नी बनी ! नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्त्व और शक्तियाँ अनन्त हैं ! नवरात्र - पूजन में प्रथम दिवस इन्ही की पूजा और उपासना की जाती है ! इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं ! यहीं से उनकी योगसाधना का प्रारम्भ होता है ! ----------- साभार   

बुधवार, 2 सितंबर 2015

549 .बचपन का गाँव क्यों इतना याद आता

                                    यादें 
( रक्षा बंधन के पावन अवसर पर बेटे उज्जवल सुमित और बिटिया सिद्धिदात्री )
५४९ 
बचपन का गाँव क्यों इतना याद आता 
जबकि सड़कें और घर थे बेहद कच्चे 
हर साल छपड़ परते थे छाड़ने 
सामने कुंआं था नहाने धोने को पोखर थे 
विकसित हुआ गाँव कुंएं मूंदे गए 
घर और सड़कें हो गए पक्के 
मोटर और टंकी लग गए घरों में 
टीवी कम्प्यूटर से हो गए लैस 
टूट गए पोखर के कछाड़ 
पानी हो गए कीचड़ समान
जहाँ हर नर नारी बच्चे बूढ़े थे नहाते 
आज पता नहीं क्यों वो बचपन के गाँव बहुत याद आते 
इसी पोखर में था तैरना सीखा 
बचपन में यहीं संस्कार भी थे मिलते 
जब बड़े बुजुर्गों को संध्या करते थे देखते  
विकास के दौड़ में जल संरक्षण को भूले 
कल को बोरिंग कहाँ से चलेंगे क्यों नहीं समझते 
घर और सड़कों की तरह दिल में भी कंकर पत्थर हैं भरते 
पता नहीं क्यों वो गाँव आज याद बहुत हैं आते !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०४ -०२ - २०१३ 
१० - ०८ pm  

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

548 . बड़े ही कठिन हैं पर ऐ पग तूँ बढे चलो

                                      यादें 
( बेटा उज्जवल सुमित बिटिया सिद्धिदात्री के पाणी ग्रहण के सुअवसर पर अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए )
५४८
बड़े ही कठिन हैं पर ऐ पग तूँ बढे चलो 
नजर अपनी तूँ चारों तरफ गड़ाए रखो 
तुम्ही से आएगा नव विहान 
बस धैर्य तुम अपना बनाये रखो 
मत खोने दो अपनी चेतनता 
बस हौसला बनाये रखो 
तुम सुभाष , आजाद , भगत के वंशज 
बस नस नस में बिजली फड़काए रखो 
महाराणा प्रताप सरीखे तुम 
विपदाएँ क्या बिगाड़ लेंगी तेरा 
चाणक्य की तरह मूल से भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंको 
बस पग को न थकने दो हौसला बनाये रखो 
अपमान और दुत्तकार पीओ नीलकंठ की तरह 
समाज को गर्त में जाने से पर रोक लो 
तीता खट्टा मीठा स्वाद मत देखो 
बस लोहे के चने चबाये जाओ 
सबों को साथ ले इस महासंग्राम को विजयी करो 
बस पग को न थकने दो हौसला बनाये रखो !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०३ - ०२ - २०१३ 
७ - ३० pm