बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

681 . भुवनेश्वरि ------ भगवति जय भुवनेशि ललित छवि वसन भूषण युत देहा।


                                    ६८१
                                भुवनेश्वरि
भगवति जय भुवनेशि ललित छवि वसन भूषण युत देहा।   
अतिशय असित चिकुर अतिचिक्कन ता बिच सिन्दूर रेहा।।
बाल दिवाकर बिम्ब अरुन्धुति लोचन तीनि विशाले।।
त्रिभुवन सुषमा उपमालज्जित मधुर हास अति शोभे। 
मणिमय खचित कीरीट बलित शिर उपमा त्रिभुवन लोभे।।
वाम उभयकर शुभग अभयवर दक्षिण अङ्गस पाशे। 
भूपुर बीच भुवन दल षोडस नसु दल कमल सुभासे।।
ता बिच अङ्गकोण मधि पदयुग सुखद ध्यान भय नासे। 
के बरनत तुअ चरण के महिमा आगम निगम संत्रासे।।
विधि आदिक सुरमुनि तुअ सेवक वरदायिनि जगदम्बे। 
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय निज पद दय अवलम्बे।।

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

680 . भगवति रूचि तुअ कामचार नित जगतजोति जगमाया।


                                       ६८०
भगवति रूचि तुअ कामचार नित जगतजोति जगमाया।  
सकल असंभव तुअ बस संभव करिय अहोनिसि दाया।।
रविमण्डल बिच कालकोश पर त्रिकोण रेख अति राजे। 
ता बिच रति मनसिज रतिविपरित करत सुख साजे।।
ता ऊपर पदयुगल कमल लस उदित भानु दुति शोभे। 
उरज विशाल माल रिपु शिर युत फणि उपवीत सुशोभे।।
खरग दहिनकर वाम अपन सिर अति विकराल विराजे। 
फूजल चिकुर दशन कटकट कर लहलह रसन सुधाजे।।
निजगण रुधिर धार बह ऊपर तीनि बलित अति धीरे। 
दुइ दिश योगिनि दुइ दुइ पीवति एक बपन मुख गीरे।।
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय सतत करिय कल्याने। 
सुत सम्पति सुख मङ्गल मुद नित चारु फल कम दाने।।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

679 . छिन्नमस्ता -- नाभिकमल बिच बीच अरुणरुचि राजित दिनमणि बिम्बे।


                                  ६७९ 
                           छिन्नमस्ता 
नाभिकमल बिच बीच अरुणरुचि राजित दिनमणि बिम्बे। 
ता पर योनि चक्र पर रतियुत मन्मथ कर अवलम्बे।।
रति विपरीत ऊपर तुअ पदयुग कोटि तरुण रवि भासे। 
काटल सिर कर वाम प्रकाशित दक्षिण काति प्रकाशे।।
दिग अम्बर कच फूजल निज शिर काटल शोणित पीबे। 
बाल दिवाकर रुचिर कान्ति लस लोचन तीनि सुभावे।।
तीनिधार वह रक्त उरध भय मध्यधार निज मूखे। 
दुइ दिस योगिनि पिबत धार दुइ अति आनन्दित भूखे।।
तडितलोल युगलोचन रसना कटकट दसन सहासे। 
विषधर माल शत्रु शिर मालिनि सुरपालिनि द्विष नासे।।
विधि आदिक सुर तुअ पद सेवक प्रचण्ड चण्डिका देवी। 
अचिन्त्यरूप तुअ जगत जोतिमय योगीन्द्रादिक सेवी।।
उत्पत्ति स्थिति सहति कारिणि तीनि रूप गुण माया। 
तीनिलोक मह सभ घट वासिनि करिय अहोनिसि दाया।।
जगतजननि तोहे जगत वेआपित नारि पुरुषमय आनी। 
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय दाहिनि रहिय भवानी।।  

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

678 . मातङ्गिनी -- कीरक समरूचि ललित श्याम तनु मणिमय भूषण देहा।


                                     ६७८
                               मातङ्गिनी  
कीरक समरूचि ललित श्याम तनु मणिमय भूषण देहा।मणि मुक्तादिक हार सुलक्षाणि भाल बाल शशि रेहा।।
मधुरहास मुखमण्डल मण्डित लोचन तीनि सुभासे। 
विधि आदिक सुर चरण सुसेवित पहिरन शुचि पटवासे।। 
रत्नसिंहासन पर तुअ पदयुग षोडस वयस विराजे। 
असि अङ्गकुस लस दहिन हाथ युग पाश खेट दुइ वामे।।
अष्ट सिद्धिमय हरिहर सेवत मातङ्गिनि तुअ नामे।।
सुरनर मुनि जग ध्यान धरत नित आगम निगम बखाने। 
भुक्ति सुख आदिक पावत सतत लहत कल्याने।।
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय दाहिनि रहु जगमाया। 
चारि पदारथ सुत धन मंगल दय करि करू नित दाया।।

677 . भगवति विदित श्यामरुक्ष तनु धूमावति तुअ नामे।


                                      ६७७
                                  धूमावती
भगवति विदित श्यामरुक्ष तनु धूमावति तुअ नामे। 
केसपास अति लम्बित फूजल गगन देह अभिरामे।।
कलह प्रेममय मलिन वसन रूचि विकट दसन छवि छाजे।   
क्षुधित सतत मन दीन त्रिलोचनि तरल सुभावहिं राजे।।
मन उद्वेग दुसह अनुछन जन महिमा जगभरि जाने। 
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय सतत करिय कल्याने।।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

676 . द्वीपी अजिन कटिदेश भीमतनु लम्बोदरि अति खर्बे।


                                      ६७६
                                   तारिणी
द्वीपी अजिन कटिदेश भीमतनु लम्बोदरि अति खर्बे।
अस्ति चारि बिच खप्पर राजित भाल भयानक गर्वे।।
पङ्कज ऊपर एक चरण तुअ तापर दुतिय विराजे। 
नखरुचि शुचिसम अमृत हासयुत नवयौवन छवि छाजे।।
खर्ग कर्त्तृयुग दक्षिण कर लस मुण्ड कमल दुइ बामे। 
शोभित भाल अक्षोभ महाऋषि तारिणि सतत सकामे।।
दन्तरदन्त विकाश त्रिलोचनि लहलह रसन सहासे। 
उदित दिवाकर बिम्ब कान्ति तन ज्वलित चिता थिक वासे।।   
जटाजूट अतिपिन्गल शोभित वेद भेद नहिं जाने। 
कंजज श्रीपति सहित उमापति सतत धरत तुअ ध्याने।।
आदिनाथके दहिनि भय रहु सतत करि कल्याने। 
कृपायुक्त भय दोष छमा कय चारु फल दय दाने।। 

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

675 . भगवति जलधिसुते शुभकारिणि घनरुचि चिकुर विराजे।


                                   ६७५
                                 कमला
भगवति जलधिसुते शुभकारिणि घनरुचि चिकुर विराजे। 
कनक रुचिर तन अधिक सुलक्षणि चारि भुजा छवि छाजे।।
मणिमय खचित कीरिटि सुमस्तक पाटक शोभित चीरे। 
वर अरु अभय दुहू दिस दुहुकर युगकर कमल सुधीरे।।
असित गजेन्द्र चारि कनकघट भरि भरि अमृत लावे। 
मुख अम्बुज पर सिञ्चित अनुछन वाम दहिन दिस  भावे।।
भूषण मणिगण खचित लसित तनु अनउपमित जगमाया। 
विधि हरिहर इन्द्रादिक सुरमुनि सेवित नित करू दाया। 
कमलसुमुख करकमल सुकुचपद कमलालय नित देवी। 
कमल सुआसन अधिक सुभग छवि जगतजननि जगसेवी।।
स्तोत्रक लक्षण सुभाव कथन थिक तुअ गति श्रुति नहि जाने। 
आदिनाथ कर कृपायुक्त भय सतत करिय कल्याने।।