मंगलवार, 28 जुलाई 2015

521 . " अपनी खोज "

( मेरे  पुत्र उज्जवल सुमित के बचपन का फोटो )
५२१ 
" अपनी खोज "
२६ - ०९ - १९७७ 
पुरे ब्रह्माण्ड में अभी तक जानकार चीजों में सबसे तेज गति वाली चीज मन है ! इस सत्यता को आप जब चाहें तब आजमा सकते हैं ! इस मन में जब ज्वार भाटा उठता है तो कोई परिणाम उपस्थित होता है !
                                   कुछ ऐसी ही उथल - पुथल एक युवक के मन में उठ रही थी ! अब सर्वप्रथम मैं आपको उस युवक से परिचित कराता हूँ ! सामान्य कद काठी छोटे - छोटे बाल स्टालिन टाइप दाढ़ी मूंछें ! गेहुंआ रंग चेहरे पर हमेशा व्यंग मुस्कान दूसरे की बेबसी और गलती को समझते हुए हमेशा हंसने वाला परन्तु हंसाने की क्षमता से रहित व्यवहार से थोड़ी बहुत विश्वविद्यालय की क्षमता प्रकट होती दिखती है ! उसमे और कुछ असाधारण तो नहीं परन्तु उसके विचार जरूर असाधारण हैं ! उसे किसी चीज में आशक्ति नहीं ! इतने गुणों अवगुणों से संपन्न वह युवक कुछ स्थिति एवँ अपनी बुद्धि प्रखरता पर घमंड रहने के कारण , वैसे वह अपने में बुद्धि प्रखरता का सर्वथा अभाव महसूस करता है , अतएव उसे जिद्दिपना ही कहना शायद उचित होगा इसी कारण वह इंटर की परीक्षा समाप्ति के प्रातः २३ - ०९ - १९७७ को सुबह ८ बजकर १४ मिनट पर प्रातः काल का कलेवा माँर भात जो गरीबी महाराज उसको देने का कष्ट करते हैं , वो कर माता - पिता ईश्वर को मन ही मन प्रणाम कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त कर अपने मंजिल बनारस को घर से चुप चाप सिद्धार्थ की तरह वैराग्य की भावना से ओत प्रोत हो निकल पड़ा , पास में जो भी कुछ पैसे थे उसे घर में ही छोड़  वह चला ! पहले उसने सोंचा था की मंजिल तक की दुरी पैदल तय करेगा परन्तु वास्तविकता  उसकी मुलाकात नहीं हुई थी इस हेतु वह चला और सर्वप्रथम थानेश्वर मंदिर पहुँच कर बाबा भोलेनाथ से आशीर्वाद ले चल पड़ा समस्तीपुर से मुसरीघरारी की ओर उसे रास्ते में उमेश एवं ओमप्रकाश राज जो उसके सहपाठी थे मिले इनसे निपटकर वह आगे बढ़ा और मुसरीघरारी तक की दस किलोमीटर की दुरी एक घंटा पैंतालीस मिनट में तय कर समस्तीपुर को प्रणाम कर लखनऊ का मार्ग नेशनल हाईवे पकड़ चल पड़ा ! उसे जाना तो वाराणसी था परन्तु पूरी जानकारी वहां की नहीं थी और न ही उसे यह मालूम था कि वह रोड जिस पर वह चला जा रहा था उसकी मंजिल को नहीं पहुँचता ! 
आदमी जिस काम के लिए दृढ संकल्प कर ले वह उसे पूरा कर ही दम लेता है ! ढोली पहुँचते चलने से उसकी हालत बदतर हो गयी थी , बेचारा कभी भी चलने का लुत्फ़ उठाया होता तब न उसे सत्य की जानकारी रहती उसे  लग रहा था जैसे पैर उसके नहीं पैर के जगह पर कोई पत्थर का शिला वह ढो रहा है ! फिर भी वह घिसटते - घिसटते ढोली स्टेशन पर ४ - ०० बजे पहुंचा ! उस समय वहाँ के B . D . O का घेराव कुछ मजदुर किये हुए थे ! घेराव के पश्चात उन लोगों की मीटिंग मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि में स्टेशन के बाहर स्थित प्रांगण में संपन्न हुई ! उनके पुरे भाषण का निचोड़ उस युवक के अनुसार यह था की आपने इंदिरा के अत्याचार को देख लिया है और अपना एक लाख से भी  ज्यादा कीमती वोट को फिर से एक बार जनता पार्टी नामक कूड़ेदान में डाल दिया ! अतः उद्धार का अब केवल एक ही रास्ता है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में देश को सौंप दे ! जितना समय उन्होंने भाषण देकर व्यर्थ में अपना और दूसरों का नष्ट किया उतने देर में यदि उनको जीवकोपार्जन के साधन एवं व्यवस्थित ढंग से अपना और समाज के काम को करने अथवा सहयोग प्रदान करने के बारे में बतलाते तो भारत के किसी कोने का थोड़ा सा भी भविष्य उज्जवल दिख पड़ता परन्तु हाय रे भारत के गरीब मजदुर तुम बहुत भोले हो तुम्हे न अपना और न देश के भलाई के बारे में थोड़ी सी भी अक्ल खर्च कर समझने की शक्ति है ! जिसका परिणाम है कि तुम वहीँ के वहीँ हो और थोड़ी सी बुद्धि रखने वाला तुम्हे अपने वश में किये रहता है ! इन सब बातों को खबर में रखते हुए वह युवक शाम की ट्रेन पकड़ मुजफ्फरपुर आया और तुरंत फिर मुजफ्फरपुर से सोनपुर चल दिया ! मुजफ्फरपुर तक तो कोई दुर्घटना पेश नहीं आई परन्तु मुजफ्फरपुर से ट्रेन खुलने के बाद वह युवक एक डिब्बे के दरवाजे के पीछे बैठ गया एवं कान में ठंढ लगने के कारण कानों को रुमाल से बाँध कर सो गया ! 
एक रुमाल ही तो उसके शरीर से अलग की संपत्ति लेकर वह घर से चला था ! मुजफ्फरपुर के एक दो जंक्सन के बाद , चूँकि वह एक्सप्रेस ट्रेन थी अतः प्रायः जंक्सन पर ही रुका करती थी ! चलती ट्रेन में जब की उनींदी सी अवस्था में था की एक बंदूकधारी पुलिस आकर उसे जगाया और पूछा कहाँ जा रहे हो ? सोनपुर किस काम से , उससे भी आगे वाराणसी तक जाना है ! टिकट है ? नहीं ! तब तो नहीं जा पाओगे , चल उठ फिर से मैं तुमको वापस मुजफ्फरपुर भेज दूंगा और उसका कॉलर पकड़ कर उसे उठाया और डिब्बे के अंतिम छोड़ में एक लड़के के निगरानी में बैठा दिया और उसे कहा साले अगर यह भागा तो तुमको अंदर कर देंगे , अगले स्टेशन पर फिर उसके साथी आये और फिर वही सवाल पूछा और वही जवाब मिला तदुपरांत वह एक दूसरे पुलिस के पास जो एक दूसरे डिब्बे में था के संरक्षण में सौंप कर चला गया ! सोनपुर आया वह पुलिस भी उतरा और उसने सामान भी उतारी परन्तु उसकी खोज खबर लेने वाला कोई नहीं था अंततः वह भी सबसे पीछे उतर प्लेटफार्म की ओर चल दिया क्योंकि उस समय उसे आगे जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी ! सो वह आकर एक बेंच पर आराम आराम करने लगा ! कुछ क्षण बाद एक भद्र पुरुष आकर बैठ गए और समाचार पत्र पढ़ने लगे पर मानव मन की जो आदत है उसके अनुसार उन्होंने उससे परिचय लिया एवं पूछा कहाँ जाना है ? उत्तर मिला वाराणसी ! फिर ट्रेन आयी और वह डिब्बे में चढ़ा परन्तु उसके न उठने पर उसने आकर पूछा टिकट नहीं है ? नहीं ! तो कोई बात नहीं है चलो मैं रेलवे में काम करता हूँ और सोनपुर छपरा बराबर आता जाता हूँ और स्टाफ मुझे पहचानते हैं ! उसके आश्वासन पर वह युवक उसके साथ चल दिया ! उसने अपना नाम B. Ahmad. बतलाया ! रास्ते में T . T के आने पर उसने उसको अपना साथी बतलाया ! छपरा आने के बाद उसने उस युवक से बहुत आग्रह किया कि वह चलकर उसके साथ खाना खा ले और सवेरे वाली ट्रेन से भेज देने का आश्वासन दिया ! जात पात नहीं मानते हुए भी वह युवक उसके साथ खाना खाने से इंकार कर दिया परन्तु सवेरे जाने वाली बात स्वीकार कर लिया ! 
 दूसरे रोज वह युवक १० - ५५ में खुलने वाली ट्रेन से वाराणसी ५ बजे २४ - ०९ - १९७७ को पहुँच गया , रास्ते में कोई खास दिक्कत नहीं हुई ! वहां पहुँचने के बाद जहाँ तक उसका शरीर साथ दिया घूमता रहा और शाम होते - होते गंगा किनारे एक मंदिर के प्रांगण में एक विशाल वट वृक्ष था उसके नीचे अपना आसन जमा दिया और सांय कालीन पूजा के बाद जो प्रसाद मिला उसे ग्रहण कर उस एकांत और अकेले वृक्ष के नीचे सो गया ! प्रातः  एक   शिक्षक ब्राह्मण जो प्रत्येक दिन प्रातः गंगा स्नान को गंगा जी आते थे आये और उन्होंने उस युवक से उसका परिचय पूछा और कुछ देर के वार्तालाप के बाद वह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उस युवक को अपने साथ अपने आश्रम ले जाने की जिद करने लगे , परन्तु युवक ने कहा एक आश्रम को छोड़ कर आया हूँ कि कोई सिद्ध महात्मा से भेंट हो जाये तो संसार को त्याग सच्चे ज्ञान के प्राप्ति में लग जाऊं परन्तु लगता है यह चाह अभी शायद पूरी नहीं होगी ? दूसरे दिन भी मंदिर के प्रसाद का ही सहारा रहा ! फिर ज्यादा इसलिए नहीं घूम सका कि पैर तो पहले ही जवाब दे चूका था पेट भी भट्ठी बना हुआ था और थूक घोंटने में भी उसे लगता था जैसे लोहे का बड़ा सा गोला जबरदस्ती ठूंस रहा है ! कल हो के सवेरे वाली ट्रेन पकड़ वह छपरा की ओर चल दिया ! उस दिन उसे दो तीन बातों से साक्षात्कार हुआ जो कि केवल वह युवक ही समझ सकता था ! तीसरी बात जो सर्वविदित है कि झूठ नहीं बोलना चाहिए इसका भी परिणाम उस दिन उसके नजरों के सामने आया ! वे दिन शायद उस युवक का स्मरणीय दिन रहेगा ! क्योंकि स्मरणीय दिन वही होता है जिस दिन कुछ असाधारण घटना घटित होती है !
                                                            बनारस से बलिया तक के अंतराल में उस गाड़ी में एक ही टी।  टी थे ! वह युवक उससे बचने के लिए प्रत्येक जगह जहाँ गाड़ी रूकती उससे पहले उतर जाता , इस तरह से इससे बचते हुए वह बलिया आया ! यहाँ आकर उसकी ड्यूटी ख़त्म हो गयी थी और यहाँ से दो टी. टी सवार हो रहे थे ! यहाँ गाड़ी अधिक देर तक रूकती है ! अतः वह युवक एक बेंच पर आकर बैठ गया था ! उसी बेंच पर एक टी. टी आकर बैठ गए और हमारे बगल में बैठे हुए व्यक्ति से बात करने लगे और जिन लोगों को बिना टिकट के जाना था उनसे वह कुछ - कुछ पैसे ले रहा था ! गाड़ी खुली तो वह युवक भी दोनों टी. टी से बचता हुआ एक डिब्बे में चढ़ गया और पिछली ही बार की तरह करने लगा परन्तु एक जगह उससे गलती हो गयी ! दो तीन स्टेशन के बाद वह एक टी. टी के चढ़ने के बाद अंतिम डिब्बे में चढ़ गया ! शायद दूसरे टी. टी को उस युवक पे कुछ शक हो गया था और उस युवक को भी लगा कि शायद वह इसी डिब्बे में आएगा ! यह सोंच कर वह पिछले दरवाजे से उतरने के लिए तत्तपर हो गया और वह इसी उधेड़बुन में था कि वह टी. टी उसके सर पर सवार हो गया और कॉलर पकड़ते हुए खिंचा और पूछा टिकट दिखाओ ? टिकट तो नहीं है , दूसरे टी. टी की आदत जो उस युवक ने बलिया में देख लिया था उसके विश्वास पर उसने कहा मैंने दूसरे टी. टी साहब को कह दिया है ! यह कहने से उसने युवक को छोड़ दिया ! और दूसरे यात्रियों को चेक करने लगा ! परन्तु उस युवक को ह्रदय में डर था कहीं यह उस टी टी के पास न ले जाये ! आखिर वही हुआ जब दूसरा स्टेशन नजदीक आने लगा तो वह आया और कहने लगा , हमको तुम पर शक है इसलिए चलो और उनसे कहवाओ ! फिर युवक को पकडे रहा और दूसरे स्टेशन पर आकर उसने टी टी के हवाले कर दिया ! उस टी टी ने युवक से पूछा पर गुस्सा करते हुए कहा जल्दी भाड़ा लाओ वर्ना जेल में चक्की पीसनी पड़ेगी ! छपड़ा चलिए वहां दूंगा पर उसे विश्वास नहीं हुआ और गेट पर खड़े टी टी से आकर कहने लगा इसे चालान कीजिये इस पर उस गेटकी ने कहा भाड़ा दे दो  वर्ना जुर्माना २३ - ०० रु हो जायेगा ! वह युवक को लेकर एक डिब्बे में बैठ गया और पूछा क्या नाम है ? सुधीर कुमार झा  ! पिता का नाम श्री कैलाश झा  ! कौन काम करते हैं ? आर एम् एस में  ! कहाँ ? समस्तीपुर में  ! फिर छपरा में कौन हैं जो पैसा देगा ? एक जान पहचान के अहमद साहब हैं ! इंजीनियरिंग विभाग में उनसे ! वो कौन हैं ? जान पहचान के हैं ! वाह तुम मिश्रा और पहचान मुस्लिम से ! ज्यादा फ्राड मत बनो ! यह कहकर वह चुप हो गया ! अगले स्टेशन पर अपने साथ उस युवक को उतारा , कुछ लोग घेर कर खड़े हो गए ! टी टी ने कहा अभी नया नया है बहुत झांसा दे रहा है ! कहता है ब्राह्मण है ! अच्छा गोत्र क्या है ? शांडिल्य  , उसका चमचा बोला ई गोत्र क्या होता है ? यह तो यह ठीक कह रहा है ! मुझे तो लगा यह मुस्लिम है ! टी टी ने कहा नहीं , है ब्राह्मण ही ! फिर उस युवक की ओर मुखातिब हो कर कहने लगे , इसी ट्रेन की एक बार की बात है एक व्यक्ति को पकड़ा था , वह था तो धोबी पर उससे पूछा कौन जात हो तो उसने कहा क्षत्री ! हमने कहा क्षत्री लगते तो नहीं हो ! कौन क्षत्री हो उसने कहा पछाडन क्षत्री क्योंकि वह कपडे से पानी को पछाड़ता था ! 
तुम कौन ब्राह्मण हो ? मैथिल ब्राह्मण हूँ ! मछली खाते होगे ? अच्छा आओ हमारे साथ बांयी तरफ वाली बोगी में बैठो और उस युवक के साथ वह भी बैठ गया ! युवक खिड़की होकर बाहर का दृश्य देखने लगा ! गाड़ी खुल चुकी थी ! अगला स्टेशन छपड़ा ही था ! टी टी ने अपने चमचे से पूछा गोपाल इसको कौन सजा दें ! देखते हैं मुंह छुपाये है ! नजर मिलाने की हिम्मत नहीं है ! इस वाक्य को सुनकर युवक को क्रोध आया ! उस समय वह खिड़की से बाहर के दृश्य को देख कर प्रकृत पर गौर कर प्रकृत की प्रकृति पर गौर कर रहा था ! उसके साथ जो घटना चक्र चल रहा था उसके बारे में उसके चेहरे पर कोई हर्ष विषाद विदित नहीं हो रहा था ! क्योंकि उसके परिणाम को भोगने के लिए तैयार था ! जब उसे परिणाम से डर नहीं था तो चिंता किस बात की होती ? वह इन लोगों की ओर देखने लगा ! टी टी ने उस युवक की दाहिनी हाथ का अंगूठा देखा और कहा अभी शुरुआत है ! कौन गुरु है तुम्हारा ? कैसा गुरु ? कोई भी काम शुरू करता है तो उसका कोई गुरु होता है ! कौन काम ? मैं कोई काम नहीं करता ! तो तुमको बलिया से छपड़ा तक का रखवाली करने का ठेका मिला है ! कुछ तो करते होगे ? क्या करते होगे ? क्या करते हो ? पढ़ते हैं ! टी टी के चेहरे पे अविश्वास की रेखा गहरी हो गयी ! किस क्लास में पढ़ते हो ? I . Sc . में !  I . Sc . का मतलब क्या होता है ? जवाब सुनकर कुछ संतोष सा उसके चेहरे पर झलकने लगा ! आर्किमिडिज़ का सिद्धांत क्या है ? उसके पश्चात तो उसने प्रश्नो का ताँता सा लगा दिया और उस युवक का भाग्य शायद कुछ तेज था ! क्योंकि उसकी बुद्धि कुंठित नहीं हुई थी और वह हर प्रश्न का समुचित  जवाब दे रहा था ! यूरेका शब्द का क्या अर्थ है ? किसने कहा था ! इसका इतिहास वह वहां बैठे अन्य लोगों को सुनाने लगा ! फिर उस युवक की ओर हो पूछा गुप्त ताप की क्या परिभाषा है ? इसकी क्या इकाई है ? एक छोटी सी सुई डूब जाती है परन्तु इतना बड़ा जहाज नहीं डूबता ? घनत्व की परिभाषा क्या है ? रेल के दो पटरियों के बीच खाली जगह क्यों छोड़ी जाती है ? जो सवाल का जवाब जल्द - जल्द दे दे उसे क्या कहते हैं ? सुराही का पानी क्यों ठंढा रहता है ? आदि - आदि प्रश्नो को उसने पूछा ! इन सारे प्रश्नो का उस युवक ने सही - सही उत्तर दिया ! इस बीच उस युवक की दो बार पीठ थपथपा कर शाबाशी दी और कहा तुमको पहले कहना चाहिए था कि मैं छात्र हूँ पैसा नहीं रहने के कारण टिकट नहीं कटा सका तो मैं तुमको इतना कष्ट नहीं देता ! मैं मानता हूँ गरीबी एक अभिशाप है ! मैं फटे कपडे पर उतना मार्क नहीं करता ! मुझे पहले ही शक हो रहा था कि तुम एक अच्छे लड़के हो फिर भी तुमने झूठ बोलकर गलती की जिसके कारण तुम्हे और मुझे भी परेशानी हुई ! तुम्हे आदमी पहचान कर बात करना चाहिए था ! युवक ने कहा सब तो आपके जैसे विचार वाले नहीं होते हैं ! फिर आपका अनुभव उम्र के अनुसार ज्यादा है ! आप रेलवे में हैं हमेशा विचित्र लोगों के संपर्क में रहते हैं इसलिए आप जितनी जल्दी लोगों को पहचानियेगा उतनी जल्दी मैं नहीं ! फिर भी मैं अपनी गलती के लिए क्षमा चाहता हूँ ! और आपकी इस मेहरबानी के लिए बहुत - बहुत धन्यवाद ! टी टी कुछ भावावेश में आ गया था उसने कहा भाग्य का मारा हूँ जो रेलवे की खाक छान रहा हूँ वर्ना मैं भी आज कहीं प्रोफ़ेसर होता ! 
                                        हाँ आपको होना भी चाहिए था युवक ने कहा ! वहाँ बैठे दूसरे लोगों के भी नजरों में जहाँ उस युवक के लिए दिल में नफरत एवं आँखों में घृणा थी वहां अब सहानुभूति एवं आदर झलक रहा था ! एक व्यक्ति ने पूछा आप कहाँ पढ़ते हैं ? समस्तीपुर कॉलेज समस्तीपुर ! टी टी साहब ने कहा तुम समस्तीपुर जाओगे यह जनता ट्रेन लगी हुई है इससे सोनपुर चले जाओ वहां से मुजफ्फरपुर और फिर वहां से नार्थ बिहार पकड़ कर समस्तीपुर चले जाना , इस रास्ते में कहीं चेकिंग नहीं है ! रास्ता साफ है ! यह कह वह चला गया ! छपड़ा आ चूका था वह युवक भी उतर पड़ा ! युवक के ह्रदय में उस टी टी के लिए आदर का भाव था और उसने उसे दिल से बहुत बहुत धन्यवाद दिया और उसके कहे अनुसार मुजफ्फरपुर २५ - ०९ - १९७७ के रात में ८ - ३० पर उतरा और नार्थ बिहार में आर.  एम  . एस के बोगी में बाबूजी के साथी स्टाफ को प्रणाम कर अपना परिचय दे बैठ गया और सकुशल समस्तीपुर उतर कर अपने डेरे पर पहुँच गया ! समस्तीपुर स्टेशन से डेरे तक पहुँचने में केवल एक घटना घटी कि उसका चप्पल टूट गया जिसे वह किसी तरह ढो कर डेरे तक लाया ! जहाँ उसके परिवार वाले बेसब्री से उसका इंतजार कर रहे थे ! 
इस तरह उस युवक के मन में उठे प्रश्नों के उत्तर मिल गए ! 

सुधीर कुमार ' सवेरा '       

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

520 . ईश्वर

                         ( मैं और धर्म पत्नी जी  )
५२० 
ईश्वर 
सर्व शक्तिमान अर्थात जो अपने शक्ति या आत्म शक्ति से पुरे ब्रह्माण्ड को चलाता हो ! यह तो सभी मान लेंगें चाहे वे आस्तिक हों वा नास्तिक कि इस तरह क्रमबद्ध से घटने वाली सारी क्रियाएँ को घटित करने वाला जरूर है जिसे हम मात्र अनुभव कर सकते हैं ! बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो ये समझते हैं कि जो हो रहा है वह मैं कर रहा हूँ , मैं जो अच्छा करता हूँ उसका नतीजा अच्छा निकलेगा और जो ख़राब करता हूँ उसका फल स्वभाविक तौर पर ख़राब होगा ! मैं जो चाहता हूँ वह करता हूँ होता है ! अगर किसी से यह सवाल पूछा जाये कि तुम जो मैं हो सो क्या है ? क्या तुम्हारा पूरा शरीर मैं है ! नहीं तो क्या तुम्हारा कोई अंग मैं है नहीं तो तुम्हारी भावना मैं है नहीं तो क्या तुम्हारा अनुभव मैं है नहीं तो आखिर तुम में मैं कहाँ ?
जानते हैं मैं कितनी बड़ी चीज है ? वह जो चाहती उसे करते आपके शरीर से मैं निकल जाये तो आप - आप नहीं रहिएगा आपके पीछे श्री नहीं रहेगा !
मैं इतनी बड़ी चीज होते हुए भी आप नहीं कह सके आप में मैं कौन है कहाँ पर स्थित है क्यों स्थित है किसलिए स्थित रहती है उसका क्या अस्तित्व है ! अगर आप मैं को समझ लें उसका साक्षात्कार कर लें तो आप - आप से मुक्त हो जाईयेगा आप प्रकृति को समझने लगिएगा आप ईश्वर को समझने लगिएगा पुरे ईश्वर को नहीं ईश्वरत्व को पुरे ईश्वर को समझने के लिए सभी मैं को समझना होगा ! और पुरे ईश्वर को समझने के बाद ब्रह्मत्व अर्थात श्रृष्टि करता को समझियेगा और पुरे ब्रह्माण्ड को समझने के बाद ही आप पुरे ब्रह्म को समझ सकिएगा ! पर मनुष्य तो मात्र प्रकृति के एक कर्म एक कारण तक को नहीं समझ कर अपने में उलझ कर उलझता चला जाता जिसका कोई अस्तित्व नहीं ! 
                                        एक रमेश नामके आफिसर हमारे कार्यालय में हैं , उनसे मेरा एक तरह का दोस्ताना परिचय है ! यह भी एक कारणवश हुआ ! कारण यह था कि वे ईश्वर को नहीं मानते बल्कि हम जो हैं सो हैं और हमारे करने से जो होता है सो होता है ! इन्ही बातों पर मैं उनके सामने आया जब वे उपरोक्त बातें एक व्यक्ति के सामने कर रहे थे ! और मेरे यह कहने पर कि एक - एक पल जो आप करते हैं ! छोटा से छोटा भी कर्म वह आप किसी अज्ञात शक्ति के कारण और उसके पीछे उसी अज्ञात शक्ति का हाथ रहता है और उसी अज्ञात शक्ति को हम ईश्वर कहते हैं ! पर इसका उन्होंने कड़ा विरोध किया और बहुत तर्क वितर्क के बाद उन्होंने कहा कि ठीक है जिस दिन आप यह साबित कर दें उस दिन मैं आपके ईश्वर को मान लूंगा ! मैंने कहा आपको मैं आप ही के जीवन में घटित घटना से ईश्वर का आभास कराऊंगा और उस दिन आप आप स्वयं मेरे यहाँ दौरे आएंगे और कहेंगे आज आपके ईश्वर ने ही मेरी लाज बचायी ! इसी घटना के बाद से हम दोस्त के तरह विचारों की भिन्नता के बाबजूद मिलते रहे और समय गुजरता गया और वे अपने बात पर अड़े रहे और मैं भी समय का इंतजार करता रहा ! 
एक बार की बात है वे पारिवारिक झंझटों में उलझ गए क्योंकि उनके पिताजी की मृत्यु दो महीने पूर्व हो चुकी थी और उनके श्राद्ध कर्म के लिए रमेश ने कार्यालय से रुपये लेकर उस कर्म का संपादन किया था , क्योंकि वे यह मानते थे कि यह सब ढकोसला है परन्तु वे जानते थे कि समाज वाले यह तो समझेंगे नहीं और कहने लगेंगे बाप के एक ही बेटे होकर जिस बाप ने इतना पढ़ा लिखा कर अफसर बनाया आज उनका श्राद्ध कर्म करने में भी पैसे की फिजूलखर्ची समझ रहा है ! इस तरह के सामाजिक अप्रतिष्ठा न होने के लिए उन्होंने खूब धूम धाम से सारे कर्म निपटाये , जिसके फलस्वरूप वे कार्यालय के कर्जदार हो गए और उनका वेतन कटने लगा ! और अब वे अपने अपनी लड़की की शादी भी खूब धूम धाम से करने जा रहे थे ! बेटी अभी B.SC में पढ़ रही थी और लड़का मेडिकल का छात्र था ! जोड़ी अच्छी थी चूँकि दोनों अच्छे थे ! इस शादी को भी अच्छी तरह संपन्न करने के लिए चूँकि एक ही बेटी थी , इन्होने कोई कोर कसर नहीं रखनी चाही थी ! अतएव इन्हे इस बार भी कार्यालय से जितने रुपये मिलने थे सो इन्होने उठा लिया पर संयोगवश इन्हे किसी आवश्यक कार्य के लिए ५०० - ०० रुपये की अत्यधिक आवश्यकता पड़ गयी ! इसके लिए इन्होने पहले चाहा कि कार्यालय से ही किसी तरह इतना रूपया प्राप्त हो जाये परन्तु न हुआ चूँकि न होना था ! ये किसी के सामने हाथ फैलाना नहीं चाहते थे ! परन्तु मज़बूरी क्या नहीं करवा देती है ! परन्तु हाय रे भाग्य जिसने कभी किसी के सामने हाथ नहीं पसारा था उसे आज सबके सामने हाथ पसारना पड़ रहा था ! पर यह क्या कि उन्हें कहीं भी किसीसे भी रूपया प्राप्त नहीं हुआ  सभी ने अपनी - अपनी मज़बूरी दिखला दी जो सच भी था ! अब तो इन्हे चारों तरफ निराशा ही निराशा दिखाई पड़ने लगी ! कहीं भी हाथ पांव मारने  से इन्हे सफलता नहीं मिली थी ! बहुत ही दैनिय स्थिति उनकी हो रही थी ! उन्हें लग रहा था चारों तरफ अथाह पानी - पानी ही पानी है और वे बीच में एक हफ्ते से फंसे हुए हैं परन्तु उन्हें किनारा नहीं मिल रहा है ! बात भी सच्ची है वे एक सप्ताह से ठीक से न तो भोजन ही कर पाये हैं और न ही ठीक से सो सके हैं ! सोये - सोये में ही चिहुंक के उठ बैठते हैं ! परन्तु वही निराशा क्या सपने में भी कभी किसी की आशा की पूर्ति हुई है ! गाल पिचक के स्टील के कटोरे की सेट की अंतिम कटोरी के बराबर हो गयी है ! ठीक से आवाज तक उनके मुंह से नहीं निकल रही है ! आज उनके सब्र का बांध टूट रहा है ! वे अपने कमरे में चहलकदमी कर रहे हैं ! पलंग पर के गद्देदार बिछावन भी उन्हें अपने पर बैठने के लिए आकर्षित करने की क्षमता खो चुके हैं ! चमकदार दीवार उस कमरे की सारी वस्तुएं कोई भी उन्हें चैन देने में असफल सिद्ध हो रही है ! आँख के चारों ओर काली छाया सी बन चुकी  है  ! बाल लगते हैं जैसे कभी साबुन न देखे हों ! बदन पर के कपडे शरीर पर से कितनो दिनों से न उतरें हैं ! आज उनके मुंह से अचानक भगवान - भगवान शब्द उच्चारित हुए हैं और इस उच्चारण के समय वे अनुभव करते हैं कि उनकी तकलीफ की कुछ मात्रा कम हो जाती है ! और वे कह रहे हैं ! हा ! भगवान हा ! भगवान मुझे ५०० रुपये का इंतजाम कहीं से कर दो आज वे जो की भगवान नाम तक को नहीं जानते थे आज इस तरह कह रहे हैं जैसे भगवान कोई सेठ है जो की इनके विलाप करने के कारण  अपनी तिजोरी खोलकर इनके सामने रख देगा ! परन्तु आज वे भगवान - भगवान कर रहे हैं ! अपनी इज्जत उनके हाथों में दे रहे हैं ! आज वे भगवान को चैलेन्ज दे रहे हैं कि अगर कोई भगवान है तो उनकी तकलीफ को दूर कर दे ! इस तरह से वे पुरे कमरे में चहलकदमी करते हुए विलाप कर रहे हैं ! ठीक एन वक्त पर उनके दरवाजे पर थपथपाहट की मद्धिम सी आवाज उभरी पर वे इस पर ध्यान नहीं दिए क्योंकि उनका मन तो अभी कहीं और था ! उन्होंने सोंचा शायद हवा का झोंका हो ! पर यह क्या दरवाजे पर अब ठहर - ठहर कर लगातार थपथपाहट होने लगी वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो खींचते से दरवाजे की तरफ चल दिए और इसी स्वप्नावस्था में दरवाजे को खोल दिया ! दरवाजे को खोलते ही वे प्रश्नवाचक चिन्ह में अपनी आँखें सिकोड़ ली , यह जरुरी भी था क्योंकि इन्होने उस व्यक्ति का कभी दर्शन नहीं किया था ! इनकी तन्द्रा उस समय टूटी जब उस आगुन्तक ने क्षमा मांगते हुए उनसे कुछ सुनने का आग्रह किया ! वे उस आगुन्तक को लेकर कमरे के अंदर आये और उसे बैठाते हुए अपने भी बैठ गए ! अब वे कुछ - कुछ सामान्य स्थिति में आ रहे थे ! उन्होंने उससे पूछा कहिये किनसे काम है ! वह व्यक्ति रमेश की ऐसी हालत देखकर उनके उतने गंभीर समस्या तक को नहीं समझ सका ! उसने कहा आपही स्वर्गवासी हरिमोहन के पुत्र हैं ? हाँ ! बिलकुल ही संक्षिप्त उत्तर ! अब यह व्यक्ति अपने आने का कारण उन्हें सुनाने लगा ! मैं आपके पिताजी से अच्छा जान पहचान रखता था ! एक बार मुझे ५०० रुपये की शख्त आवश्यकता हुई ! मुझे विश्वास था की वे दे देंगे ! अतएव मैंने उन्ही के सामने मुंह खोला और उन्होंने मुझे निराश भी नहीं होने दिया ! उसके बाद मेरा वह काम संपन्न हुआ जिसलिए की मैंने रुपये लिए थे ! परन्तु मेरी आर्थिक स्थिति बहुत ही बिगर गयी और मैं रुपये वापस करने की स्थिति न रहा और शर्म के मारे मैं उनसे मिलना बंद कर दिया ! यहाँ तक की मैं उनके बीमारी के बारे में भी सुना , उनकी मृत्यु तक का समाचार मुझे मिला परन्तु मैं इस काबिल नहीं हो पाया था की उनके रुपये उनके  किसी काम में लगे जो मैं दे सकूँ परन्तु अब जब मेरे पास इतने रुपये नहीं थे की मैं पूरा दे सकूँ , परन्तु जब मुझे मालूम हुआ कि आप अपनी बेटी की शादी करने जा रहे हैं तो सोंचा चलो अगर उनके रुपये उनके पोती के शादी में भी लग गया तो ठीक रहेगा ! और यह सोंचकर मैं यहाँ चला आया परन्तु मेरी एक विनती है कि मैं आपको उस रुपये की सूद अदा नहीं कर सकूंगा और मूल ही ५०० रुपये सिर्फ आपको स्वीकार करना पड़ेगा ! रमेश को तो अपने कानों पे जैसे विश्वास ही नहीं हुआ , लगा जैसे वह सपना देख रहा है उसे इस तरह एकटक घूरते देख उस व्यक्ति ने कहा क्या आपको मेरी बात मंजूर नहीं ! अब रमेश जैसे सोते से जागा हो कहा नहीं - नहीं  ऐसी बात नहीं आपकी बड़ी मेहरबानी हुई जो यह सोंच कर यहाँ आने का कष्ट किया ! और वह व्यक्ति उनके हाथ में ५०० रुपये रख उनसे आज्ञा ले चलता बना ! अब जैसे रमेश को होश हुआ और वह अपनी पूर्व स्थिति को प्राप्त हुआ वह रुपये को देख रहा था और उससे कुछ देर पहले घटी घटना पर विश्वास ही नहीं हो रहा था ! उसके मुंह से अक्समात निकल पड़ा भगवन तुम्हारी महिमा अपरम्पार ! मेरी नास्तिकता के अपराध को क्षमा करना और अब तुम जानो ! मेरी सारी गलती को माफ़ करना और इस घटना के बाद वह मेरे पास आये और उसने कहा आज तुम्हारे भगवान से मेरी भेंट हो गयी ! और धूम धाम से उसने अपनी बेटी की शादी संपन्न की ! इस घटना के बाद ही वह भगवान के परम भक्त बन गए !

सुधीर कुमार ' सवेरा '                  

शनिवार, 18 जुलाई 2015

519 . निराशा

५१९ 
निराशा  
जब मानव चारों ओर से बेसहारा महसूस करने लगता है ! अपने द्वारा किसी भी कार्य का भविष्य में न होने की जब संभावनाएं हो जाती हैं ! मानव अपने आप को अकेला अनाथ आश्रयहीन महसूस करने लगता है तो उसे अपने जीवन को जीने की किंचित मात्र आशा नहीं रहती है तो वह निराश कहलाता है !
ऐसे में भी जो फर्ज कर्तव्य से घिरा हो उसका तो हाल वही समझ सकता है जिसे वैसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा हो ! वैसे समय में लोगों को ईश्वर तक पर विश्वास नहीं रहता है ! तब वह यही सोंचने लगता है कि वह दुनियाँ के लिए बेकार है ! और इस तरह की निराशा की स्थिति में व्यक्ति आत्महत्या जैसे जघन्य पाप भी करने को तैयार हो जाता है ! और यहीं पर आकर ओ सबसे बड़ी भूल कर बैठता है ! क्योंकि यह सत्य नहीं है ! सत्य है यह कि मानव जीवन में ' निराशा ' नामक ' शब्द कोई अर्थ नहीं रखता है ! और आशा जो सत्य का प्रतिक है जीवन में कभी नहीं छोड़ना चाहिए ! परंतु क्या यह हो पाता है ? नहीं व्यक्ति तुरंत निराश हो जाता है , केवल आशा से ही निराशा नहीं होता है बल्कि थोड़ी सी भी आशा से विपरीत होने पर जीवन से ही निराश हो जाता है ! पर नहीं मरने पर्यन्त तक आशा की किरण अपने हृदय में बनाये रखें और निराशा नामक झूठ को अपने पास फटकने तक न दें !

क्या होगा जो होना था सो तो हो चूका एक तरफ परिवार का कर्तव्य अपने लिए न सही पर मेरे बाद तो इस परिवार को देखने वाला अभी कोई नहीं है ! पिताजी का भी स्वर्गवास ढाई महीने पूर्व हो चूका है ! पैतृक संपत्ति के नाम पर एक सर पर छोटी सी छत बची है ! परिवार के लोग मेरे बाहर रहने पर क्या खा के रहते होंगे यह तो वही जान सकते हैं ! वह भी एक दिन में अगर एक शाम भी मिल जाता होगा तो बहुत हुआ ! पर मैं भी क्या कर सकता हूँ ! मुझे जो करना चाहिए मैंने सब किया ! पिताजी कितने आशा से ग्रेजुएट कराये थे कि बेटा कुछ बन जायेगा ! पर उन्हें क्या मालूम था कि आज का जमाना सिर्फ पैसे पैरवी वालों का है ! यह मेरे और जीवन की अंतिम इंटरव्यू था ! क्योंकि उम्र नौकरी के लिए मात्र तीन बचे थे ! और मैं असफल हो कर पटना से स्टीमर द्वारा वापस जा रहा था ! 
जहाज के किनारे बैठा हुआ वह युवक चिंतामग्न था , वह अपने भूत , वर्तमान और भविष्य पर गौर कर रहा था ! सारी आशाओं पर पानी फिर चूका था , और सोंच रहा था किस मुंह से घर वापिस जा रहा है ! अपनी माँ छोटी बहन और खुद पत्नी जिसके कुछ अरमान होंगे और जिसने शादी के बाद के कुछ सपने संजोये होंगे ! उसे कौन सा मुंह दिखलायेगा ! उसकी छोटी सी भी बात को वो कभी पूरा नहीं कर सका है ! इन्ही सब बातों के बीच वह उलझा हुआ था ! प्रकृति की खूबसूरती भी उसका मन बहलाने में असफल सिद्ध हो रही थी ! और अंत में दुर्बलता ने उसके मन पर अपना अधिकार जमा लिया , और वह प्रकृति के गोद में सोने के लिए छलांग लगाकर लगाकर अपने जीवन से पीछा छुड़ा लेना चाहता था पर उसे यह नहीं मालूम था कि कर्म उसका पीछा नहीं छोड़ सकता कर्तव्य पथ पर उसे अडिग रहना होगा ! ठीक इसी अंतराल में उस जहाज पर एक कर्मचारी वहां से गुजरा और एक निराश युवक को देख कर उसके ह्रदय में उसके प्रति हमदर्दी जगी और उसने उसके पास बैठकर उससे पूछा ! ऐ युवक तुम युवा होकर इतने निराशपूर्ण मुद्रा में क्यों हो ! क्या करोगे जानकर ? युवक का यह संक्षिप्त उत्तर था ! एक इंसान के नाते अगर मैं तुम्हारा दुःख थोड़ा सा भी कम कर सका तो मन में शांति की मात्रा में वृद्धि होगी ! अतएव तुम बिना किसी संकोच एवम झिझक के अपनी बात कहो ! कर्मचारी ने युवक से कहा ! इसपर युवक ने आद्योपांत सारी बातें उनके समक्ष रखते हुए कहा कि अब मात्र तीन दिन मेरी नौकरी की बची है ! इन तीन दिनों के अंदर अगर कुछ हो सका तो ठीक अन्यथा मेरे लिए सिवाय इसके और कोई चारा नहीं है ! आगे आप कहें पर आप ही क्या कीजियेगा व्यर्थ में आपको मैंने तकलीफ दी थी इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ ! इसपे कर्मचारी ने कहा इतना निराश तो मनुष्य को कभी नहीं होना चाहिए कम से कम उपरवाले पे भरोसा रखो ! एक बात कहो क्या तुम कुछ दिन के लिए कुली का काम कर सकते हो ? कल कुली की बहाली है ! युवक ने कहा इस स्थिति पर पहुँचने के बाद भी आप पूछते हैं ! मैं इस कार्य को सहर्ष स्वीकार करूँगा ! पर बात यह है की बहाल करने वाला एक बंगाली बाबू है और वह दूसरे जात को काम देना बिलकुल नहीं चाहता है ! पर मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि तुम्हे काम मिल जाये फिर तो आगे प्रमोशन होता रहेगा ! यह कह कर वह कर्मचारी उसे अपने साथ रख लिया ! कल होकर वह बंगाली बाबू से सब  बातें कहा और अनुरोध किया कि उसे रख लें ! इस पर उन महाशय ने कहा वह ग्रेजुएट है यह काम क्या वह कर सकेगा ! वाह री दुनिया तुम उसे ग्रेजुएट होने के बाबजूद भी ये कुली का काम देने में हिचक रहे हो जबकि वह बेचारा ग्रेजुएट होकर भी इस काम को मिलने की उम्मीद भी तुम्हारे जैसे लोगों के कारण खो चूका है ! पर किसी तरह उसे कह सुनकर उस कर्मचारी ने उस युवक को काम पर रखवा दिया ! इस काम से उस युवक को मात्र पचास रूपये महीना मिलता था और पटना जैसे बड़े शहर में रहना और घर पर भी कुछ रूपये भेजना असंभव सा है ! पर उस कर्मचारी ने उसकी तात्कालिक ये समस्याऐं भी हल कर दी ! क्योंकि उसने उसका ट्यूशन एक मारवाड़ी के यहाँ पकड़ा दिया ! जिसके कारण उसके खाने पीने की समस्या हल हो गयी ! एक दूसरे मारवाड़ी के यहाँ रहने की व्यवस्था पर ट्यूशन रखवा दिया ! इस तरह उसकी सारी समस्याएं हल हो गयी ! धीरे - धीरे प्रमोशन पाकर उसी जहाज पर एक आफिसर की हैसियत से वर्तमान में काम कर रहा है ! अपने पुरे परिवार के साथ ख़ुशी पूर्वक जीवन बिता रहा है ! 
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह उस तरह के प्रत्येक युवक को सद्बुद्धि प्रदान करे और आशा न त्यागने दे !


सुधीर कुमार ' सवेरा '     

518 . वर्ष २००८

५१८ 
वर्ष २००८ 
साल २००८ दे गया कुछ खुशियां 
कुछ गम और कुछ तन्हाईयाँ 
याद आती रहेंगी साथ - साथ 
चलेंगी उनकी परछाईयाँ 
प्रथम मास ने ही की थी 
मालदीव के राष्ट्रपति की हत्या का प्रयास 
दूसरे मास ने दी थी खबर कि 
सर्विया को मिल गयी है आजादी 
तीसरे मास में भूटान में पहली बार हुए आम चुनाव  
चौथे मास हुई थी अफगान राष्ट्रपति 
करजई के हत्या का प्रयास
पांचवे मास हुई थी २४० साल पुरानी 
नेपाल राजशाही का खात्मा 
आठवें मास महाभियोग के डर से 
परवेज मुशर्रफ ने दी इस्तीफा 
एग्यारहवें मास में प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति 
बने अमेरिका के राष्ट्रपति 
बारवें मास में अल जैदी ने 
इराक में बुश के सर पे मारे जूते 
साल २००८ दे गया कुछ खुशियां 
कुछ गम और कुछ तन्हाईयाँ 
याद आती रहेंगी साथ - साथ 
चलेंगी उनकी परछाईयाँ 
चौथे मास भारत ने दस उपग्रह 
एक साथ प्रक्षेपण कर रिकार्ड बनाया 
पांचवे मास जयपुर बम धमाके में तिरसठ जाने गयीं 
सातवें मास नैना मंदिर में १६५ जाने गयीं 
बेंगलुरु में बम धमाकों में दो जाने गयीं 
नवमें मास जोधपुर मंदिर में २२४ जाने गयीं 
चाँद पर छोड़ा एक यान
दसवें मास २२ तिथि को भारत के 
प्रथम कदम पड़े चाँद पर 
ग्यारहवें मास २६ तिथि को 
मुंबई में आतंकवाद में १८८ जाने गयीं 
भारत ने पहली बार ओलम्पिक इतिहास में 
एकल स्पर्धा में जीता एक स्वर्ण पदक 
नाम है उनका अभिनव बिन्द्रा 
धोनी ने भी क्रिकेट में दिखलाये अनेक कमाल 
विश्वनाथ आनंद का भी 
कोई जवाब नहीं , बने रहे चैम्पियन 
हमने गर पाया इस साल बहुत कुछ 
तो खोया भी अपनों का संसार 
कोसी ने मचाया भयंकर प्रलय और हाहाकार 
लाखों लोग हो गए बे घर बार 
बाढ़ ने लील ली हजारों जाने 
पाया अथाह दुःख और गम का अथाह समुन्द्र 
घर परिवार में भी दुःख के ही बादल छाये रहे 
अपनों ने खोया अपनों का विश्वास 
रोये हम जार - जार दिन रात 
दिल टूटा सपने गए बिखर टूट गए हर आस 
पर उम्मीद और है पूरा  विश्वास 
आएगा और लाएगा नव वर्ष 
नया विश्वास प्यार और सफलताओं का उपहार 
हो नव वर्ष मंगलमय और लाएं खुशियां हजार !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ३१ - १२ - २००८ 
१२ - ०५ am पटना

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

517 . द्वेष

५१७ 
द्वेष 
द्वेष एक विकारी तत्व  
षठ रिपु का साथी 
एक विध्वंशकारी भावना 
आत्मिक उन्नति के पथ का काँटा 
दुखानुभूति के बाद आनेवाला 
राग का सहचर है यह 
करुआहट , निराशा , भ्रम , दुःख का 
उपज है यह 
इसका पोषक तत्व अहंकार ही है 
विकृत भावना का ही एक पहलु है यह 
द्वेष एक सर्वव्यापक सार्वभौमिक 
बीमारी का नाम है 
बून्द - बून्द कर जब यह कहीं जमा होता 
युद्ध लाता हिंसा फैलाता 
उत्पन्न करता अशांति
घृणा , पूर्वाग्रह , ईर्ष्या 
गलत धारणा आधारित 
व्यंग करना छेड़ना 
दूसरे के बारे में बुरी बातें कहना 
और करना निंदा 
और भी अनेक रूप हैं 
इसके अभिव्यक्ति के 
मनुष्य जाति का सनातन गुण 
ये समूल से नष्ट हो नहीं सकता 
हाँ हमें रूपांतरण कर 
अपना कल्याण कर सकते 
इसके फल में स्वाद में 
ला सकते हैं परिवर्तन 
दबाने की कोशिश व्यर्थ 
और तेजी से उभरेगा 
हाँ हमें इसका ऋर्णात्मक पहलु छोड़ देना है 
घनात्मक रूप को अपनाना है 
रुख इसका आध्यात्मिकता की ओर 
मोड़ देना है
द्वेषी नहीं द्वेष से बचना है 
इसके विघटनकारी रूप से बचना है 
अज्ञानी से द्वेष करना व्यर्थ है 
द्वेष करना है अज्ञान से 
बीमार से कैसा द्वेष ?
बीमारी से करना है द्वेष 
द्वेष के हर उस रूप का रुख 
हमें मोड़ देना है 
जो हमें माँ तक पहुँचने में 
बाधा पहुंचाए 
द्वेष हमें अपने अवचेतन के 
उस द्वेष से करना है 
जो हमें उकसाता है 
औरों के धर्म से द्वेष करना 
द्वेष हमें अपने मन की 
उस भावना से करना है 
जो हमें अपने विचारों से 
मेल नहीं खाने वाले के विचारों से 
द्वेष करने को उकसाता है 
ऐसे द्वेषों से द्वेष करने की 
कला हमें अपने अभ्यंतर में 
विकसित करनी होगी 
नास्तिक द्वेष खुद को तो 
हानि पहुंचाता ही है
समाज और देश का भी अहित 
करता है 
हमें अपने स्वरुप से दूर 
अपनी आराध्या 
माँ भगवती से दूर करता है 
माँ जगत जननी का 
सामिप्य पाना है तो 
द्वेष को रूपांतरित करना होगा 
माँ की भक्ति करने के लिए 
दूर होना होगा 
हमें अपने मन की इस बीमारी से 
द्वेष का रूप परिवर्तन कर 
माँ से अटूट प्रेम करना होगा हमें 
अपने आत्मा को इस प्रबल शत्रु से 
बचाना होगा हमें 
दूसरे से द्वेष कर 
हम खुद से द्वेष करने लगते हैं 
अपने भक्ति से द्वेष करने लगते हैं 
माँ से द्वेष करने लगते हैं 
अपने प्रगति से द्वेष करने लगते हैं 
तात्पर्य यह 
औरों से द्वेष कर 
खुद की हानि करते हैं 
दूसरों के प्रगति से द्वेष कर 
खुद के लिए भावी संकट का 
बीजारोपण कर लेते हैं 
द्वेष के रूपांतरण में बस 
माँ ही एक सहायिका है 
करनी है उसकी प्रार्थना 
करनी है भक्ति उसकी 
अज्ञानी शिशु की तरह 
कर जप उसका 
अपने आप को पूर्ण समर्पित 
करना होगा 
तभी हम अपने द्वेषों से मुक्त 
परम गति को पाने में समर्थ 
हो सकते हैं 
माँ की अनुकम्पा पा सकते हैं 
द्वेष से मुक्त हो सकते हैं ! 

सुधीर कुमार ' सवेरा '

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

516 . ऐ ताज

५१६ 
ऐ ताज 
मैंने भी तुझे देखा आज 
ये बात 
हो न हो खास 
पर आज 
तूँ है बेहद मेरे पास 
जो कफ़न 
ज़माने ने जहाँ रखी 
वो थी मेरे विश्वास की लाश 
पर तूँ तो है 
किसी मकबरे पर 
किसी के स्नेह और विश्वास की ताज 
ऐ ताज 
मैंने भी तुझे देखा आज 
कैद मुझे कर लो 
उन चहार दिवारियों के बीच 
दीवारें जिसकी यादों को मेरे 
न आने दे करीब 
सोंचा था जो कल 
हो न सका वो आज 
ऐ ताज 
मैंने भी तुझे देखा आज 
ऐसी कोई भी बात 
आती नहीं मुझे नजर 
पाकर कैसी भी चीज 
भुला जो पाऊँ 
तुझे किसी भी पल 
बिन ऊषा 
कैसे ' सवेरा ' हो आज 
ऐ ताज 
मैंने भी तुझे देखा आज !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ३१ -  १० - १९९५ 
९ - ५० pm  

515 . झाँका बहुत औरों में खुद में झांक न पाया

५१५ 
झाँका बहुत औरों में खुद में झांक न पाया 
मन मंदिर में झाँका तो माँ का अक्श नज़र आया 
खंडित मन खंडित ध्यान खंडित चाँद उगे 
और बढ़ा आगे तो खंडित प्राण हुए 
जब - जब पग अग्रसर हुए प्रगति पथ पर 
अंतर में अभिमान भगवान में पत्थर नज़र आया 
गैरों ने जिल्लत अपनों ने धोखा दिया 
पर माँ तूने शंकर बन मेरा गरल पीया 
आँसू भरे नैनों ने जब तुझको पुकारा तो 
कण - कण में माँ तेरा ही रूप नज़र आया 
वासना के घेरे में प्यार बहुत बदनाम हुआ 
झूठे तृष्णा में मैं गुमनाम भटकता रहा 
पर मन ने जिस दिन धोये तृष्णा गंगाजल से 
जीवन पूर्ण बना अंतर में प्राण नज़र आया 
आँखों ने सीखा सिर्फ बुरा का अवलोकन करना 
जीभ ने सीखा सिर्फ औरों की निंदा करना 
प्रज्ञा चक्षु जब खुले माँ अभ्यंतर में 
माँ चेतन रूप तेरा ही नजर आया 
जब बुद्धि ने आत्म तत्व को अवगाहा 
चेतना जब चेतन से मिलने को चाहा 
जाग गयी कुंडली सब तम मिटा 
इस लघु घट में माँ तेरा स्थान नजर आया 
षठ रस से सनी सृष्टि 
कविता में है होती नव रस की वृष्टि 
जहाँ हम भी एक रस 
कण - कण में रस 
और है एक माँ 
महिमामयी महा रस !

सुधीर कुमार ' सवेरा '

बुधवार, 15 जुलाई 2015

514 . स्वच्छ निर्मल शीतल मलय बहता जहाँ मंद - मंद

                  (   काली पीठ - समस्तीपुर  )
५१४ 
स्वच्छ  निर्मल शीतल मलय बहता जहाँ मंद - मंद 
   स्वर्ग सा वातावरण गर्जन करता जहाँ वसंत 
       जहाँ मोह मिटता , भय निर्मूल होता 
            राग द्वेष होते क्षत विक्षत 
           देहाभिमान ध्वस्त होता पत्रवत 
                    काल पे भी अंकुश 
                    कोई नहीं भयाकुल 
                     हर्ष नहीं शोक नहीं 
                     भला नहीं बुरा नहीं 
                  अमीर नहीं गरीब नहीं 
                     शाश्वत सनातन 
                         परम शांति 
                         ज्योति पीठ 
                         गहन गंभीर 
                         काली पीठ !

सुधीर कुमार ' सवेरा '

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

513 . माँ तेरे लाखों बेटे

५१३ 
माँ तेरे लाखों बेटे 
मोह ममता मुझको लपेटे 
क्यों न देती दर्शन 
क्यों न होती हो प्रसन्न 
एक अकेला दोष बहुतेरा 
अपनी ममता का दे सहारा 
सबके मन की प्यास बुझाती 
क्यों न मुझको दर्शन देती 
दुनियाँ बहुत बड़ी है 
माया से भरी परी है 
भर कर मन में ज्ञान 
कर दे मेरा कल्याण !

सुधीर कुमार ' सवेरा '