मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

353 .तब तूँ किसी और की हो चुकी थी

३५३ 
तब तूँ किसी और की हो चुकी थी 
बहुत बाद तब जो तुझे देखा था मैंने 
ना जाने तूँ किस हसीन दुनियाँ में खो चुकी थी 
पर तब तेरे उस सुरमयी नैनो की शाम 
' सवेरा ' की जिंदगी को बना रही थी नाकाम 
पर ना जाने तेरी तब क्या चाहत थी 
होंठो पे तेरे फिर भी नाजुक हंसी के फूल थे 
लब मेरे सूखे थे आँखें मेरी भींगी थी 
तुम कुछ इतरा कर लोगों को दिखा रही थी 
मैं तो तेरा कुछ नहीं वो तो तेरी फितरत थी !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २९ - ०६ - १९८४ कोलकाता 
१२ - ४५ pm 

रविवार, 7 दिसंबर 2014

352 .शंकाकुल ये मन

३५२ 
शंकाकुल ये मन 
असंतुलित ये जीवन पथ 
स्वाभाविक संकोच 
हर लेते जीवन के सच 
यथार्थ से सर्वदा दूर 
भविष्य हो जाता क्रूर 
कल्पनातीत भविष्य 
दिखाता महा दुर्भिक्ष !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' 

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

351 .मैं शून्य हूँ

३५१ 
मैं शून्य हूँ 
गुण अवगुण रूपी अंक 
मेरे नहीं 
मैं तो शून्य था शून्य हूँ 
ये अंक तेरे बिठाये हुए हैं 
मैं शून्य 
जैसे सूना आकाश 
मैं शून्य 
जैसे पृथ्वी का आकर 
निर्विकार निराकार 
निर्गुण निराधार 
मेरा न कोई रूप है 
ना ही कोई आकर 
यहाँ नहीं कोई विकार 
मैं शून्य हूँ 
शून्य ही है मेरा आकार 
शून्य की पहचान में 
समाविष्ट सब मुझ में 
शून्य को पाकर 
स्वामी विवेकानंद हूँ मैं 
परब्रह्म का 
हूँ मैं रूपाकार 
जिन - जिन धर्मों का 
जिन - जिन कर्मो का 
जिस ज्ञान का जिस विज्ञानं का 
इक्षा  हो 
करलो मुझ में साक्षात्कार 
पर लोग अक्सर आपस की प्रीत 
गैरों की बातों में आकर तोड़ देते हैं !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ३० - ०६ - १९८४ कोलकाता 

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

350 .मौन का हर कतरा

३५० 
मौन का हर कतरा 
एकांत के हर ख्याल 
तेरे साथ 
जुड़े होते हैं
तूने बहुत हिम्मत की 
मुझसे बेवफाई कर 
दूर मुझसे चली गयी 
पर तेरी इतनी 
बिसात कहाँ 
मेरे दिल से 
मेरे ख्यालों से 
मेरे यादों से 
तूँ दूर चली जा 
भागते - भागते 
तेरे पाँव दुःख जायेंगे 
मुझे भूलते - भूलते 
तेरे जीवन कट जायेंगे 
सारा प्रयत्न 
तेरा व्यर्थ हो जायेगा 
मेरे यादों से दूर 
तुझे नहीं रहा जायेगा 
सिर्फ एक मौत 
जो आ जाये 
शायद तेरे ख्यालों से 
जुदा कर पाये 
और लग जाये तब 
संबंधों का पूर्ण विराम !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' 

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

349 .आओ मेरे पास

३४९ 
आओ मेरे पास
मुझे तेरा ही है इंतजार 
तुम न आओगे 
आएगा कौन मेरे पास 
मृदु पवन के ले सहारे 
खुशबु गर नाकों में समाये 
लगे पास ही कहीं 
जुल्फों को खोले 
तूँ खड़ी हो 
या खनक कोई सुनाई दे 
तेरे ही पायल की झनक लगे 
तेरे लोच पूर्ण चालों से 
हवा की लोचकता भी शरमाये 
कोई संगीत 
दिल को छुए 
लगे तेरी हंसी
फिजा में कहीं गूंजे हों 
हर खिलती कलियों पे 
तेरी मुस्कान लहराए 
हर आहट के बाद शांत और खामोश 
तेरे न आने का संकेत 
और इंतजार फिर इंतजार 
कल्पना में डूबते ही 
तेरे आने की आशंका 
और पापी मन की आवाज 
तुम जरूर आओगी 
पर शायद यहाँ नहीं 
जीवन के उस पार !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ११ - ०६ - १९८४ 
९ - ३० am   

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

348 .मेरा सत्य मुझे धोखा दे गया

३४८ 
मेरा सत्य मुझे धोखा दे गया 
समाज के सबसे बड़े 
असत्य रूपी सत्य को 
न स्वीकारने के कारण 
मैं अपने सत्य के लिए 
रेगिस्तान में 
एक बूँद अपने 
सत्य के खातिर 
भटक रहा हूँ 
मेरा सत्य 
मुझे हर चौराहे पर 
जलील कर रहा है !

सुधीर कुमार ' सवेरा '०३ - ०६ - १९८४ राँची 
२ - ११ pm 

347 .आओ - आओ

३४७ 
आओ - आओ 
बाहर झाँको 
ऊँचे - ऊँचे 
घरों को देखो ऊँचे लोग 
बड़े - बड़े लोग हैं ये 
सुन के इनके बड़े - बड़े बोल
चा s s प s s ड़ s s ची s s पु s s ड़ s s s 
ना s s स s s रे s s पी s s चु s s प s s तूँ s s s 
लड़ते झगड़ते 
इनके देखो दिन बीते 
खोलें एक दूसरे की पोल 
ये हैं बड़े - बड़े लोग 
नाम हैं इनके जितने ऊँचे 
महल है देखो जितने बड़े 
काम करे हैं ये उतने ओछे !

सुधीर कुमार ' सवेरा '