बुधवार, 5 दिसंबर 2012
शुक्रवार, 30 नवंबर 2012
187 . बिखर गया जब एक - एक पौधा
187 .
बिखर गया जब एक - एक पौधा
चमन रहा बाँकी कहाँ
उजड़ गया जब चमन ही सारा
खुशबु लुटाये कौन
एक बेचारा चाहत में सबके
रो - रो दिन असुवन के काटे
रातें यादों से
फूल खिले वहाँ कैसे
गम के काँटे जहाँ बढ़े
बंजर जमीन से पानी की चाहत
सिवाय तृष्णा के
होगी ये कौन सी बाबत
मिली जब खाख में मोहब्बत
जीने की ये आफ़त
आकर बता जाती है हकिकत
चाँदी की कुछ परत
चढ़ा जाती है मुलम्मा
बन जाती है ये जफा का दरख़्त
तेरी बेवफाई के बाद भी
न जाने मिटती नहीं क्यों तेरी चाहत ?
सुधीर कुमार ' सवेरा ' 09-02-1980
चित्र गूगल के सौजन्य से
बुधवार, 28 नवंबर 2012
184 . कुछ न भाता कुछ न सुहाता
184 .
कुछ न भाता कुछ न सुहाता
ह्रदय पर निराशा छाया रहता
दर - दर मन भटकता रहता
गम का प्याला भरता रहता
मज़बूरी का बोझ है बढ़ता
आशा का दीप है बुझता
जिन्दगी दूर होती सी लगती
मौत करीब आ रही लगता
मैं जग से दूर होता जा रहा
जग मुझसे दूर
दिन जा रहा है ढ़लता
शाम गहराती जा रही
चाँद जा रहा है छिपता
बादल फैलती जा रही
सभी हँसते हैं मैं रहा रोता
सोना भी न सुहाता
इच्छा यही करता रहता
चार आँखें कर लूँ
मोहब्बत कर मुख तुम्हारी चूम लूँ
तड़प - तड़प कर रहता हूँ
किसी से कुछ न कहता हूँ
सिर्फ तुम्हे ही अर्ज अपना हूँ सुनाता !
सुधीर कुमार ' सवेरा ' 29-01-1980
चित्र गूगल के सौजन्य से
मंगलवार, 27 नवंबर 2012
सोमवार, 26 नवंबर 2012
182 . जिन्दगी को बहुत करीब से मैंने देखा है
182 .
जिन्दगी को बहुत करीब से मैंने देखा है
तुझे हर पल में हम और तुम का फर्क करते देखा है
कई बार हो चुके हैं दिलों के टुकड़े
पर वक्त के साथ जख्मों को भरते देखा है
हर को समझ ज़माने का साथ दिया
मतलब निकाल अपना हर को भागते देखा है
मरते हैं सभी एक न एक दिन
सबों को एक दिन रोते देखा है
मैं मरा नहीं हूँ अब तक
पर हर क्षण अपने आपको अपने सामने मरते देखा है
पला हूँ गरीबी में रहा नहीं कभी अमीरी में
ज़माने ने भी बेहद सताया है
महाजनों को भी आँखे दिखाते देखा है
होकर बेकसूर सही है बेइज्जती मैंने
अपनी हर मज़बूरी पर सबको हँसते देखा है
बड़ी मुश्किल से जिन्दगी में किसी का प्यार आया
तभी से उसको चाहा जब से उसे देखा है
उधर भी तभी से चाह थी
जब से उसने मुझे देखा है
देखी गयी न ये भी बात ज़माने को
अपने प्यार में भी ज़माने को आग लगाते देखा है
दिल थे टूटे जब तक तो जुटते भी थे
पर इस बार दिल को चूर - चूर होते देखा है
' सवेरा ' न कभी हारा था न कभी हारेगा
अपने को हरदम हँसते पाया था पायेगा
पढ़ के ' सवेरा ' के इस हाशिये को
हर के आँखों में झूठी सहानभूति को देखा है !
सुधीर कुमार ' सवेरा ' 11-02-1980
चित्र गूगल के सौजन्य से
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