देख मैं कितना मुर्ख हूँ किसी से भी अपनेपन की आशा करता हूँ ना जाने क्यों सबको अपना समझता हूँ पर जबकि सच यह है कि जब तूँ अपनी न हो सकी तो जग में कोई ऐसा भी होगा क्या ? जो मेरा अपना हो सके मुझको अपना समझ सके !
सुधीर कुमार ' सवेरा ' 13-12-1983 चित्र गूगल के सौजन्य से
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