रविवार, 30 नवंबर 2014

346 .जिसे तूने

३४६ 
जिसे तूने 
निष्प्राण और निर्जीव समझ 
गूंगा और बहरा समझ लिया 
विश्व का 
वो कुचला दलित 
ईंट और गारा बन 
एक दीवाल हो गया 
हाँ बस वो खड़ा है 
शायद उसे 
आत्म चिंतन का 
मौका मिल गया है 
या हो सकता है 
अपने अस्तित्व पर 
शोध कर रहा हो 
या तपस्या में तल्लीन हो 
मौन धारण कर लिया हो 
हो सकता है 
इन शोरों में 
उलझना न चाहकर 
दम साध लिया हो 
या अपने क्रांति का 
मार्गदर्शक मानचित्र 
तैयार कर रहा हो 
निर्मेश नेत्रों से 
तुम्हारे बाल सुलभ क्रीड़ा को 
देख - देख 
तेरे नादानी को समझ 
बस चुप है और शांत 
वो जानता है 
इस भगदड़ में 
क्या बोलना ?
बस दो कदम और 
फिर सब शांत 
दिन को दीवाल बन 
बस तेरे बातों को 
सुनता है 
रात को तेरे मष्तिष्क के 
अल्ट्रावॉयलेट किरणों को 
चमगादड़ बन 
देखता है 
तुम्हारी सारी पहुँच 
तेरी सारी अक्ल 
हर उपायों के बावजूद 
निरर्थक साबित होती है 
और दीवाल को 
आँखों से बचकर 
तुम कुछ नहीं कर पाते 
तुम माइक्रोवेब से बोलो 
या मेगावेब से बोलो 
दीवाल सुनही लेगा 
तुम अल्ट्रावायलेट 
या इन्फ्रा किरणों को फेंको 
चमगादड़ देख ही लेगा !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०२ - ०६ - १९८४ रांची 
३ - ३६ pm 

शनिवार, 29 नवंबर 2014

345 .जिंदगी को

३४५ 
जिंदगी को 
ना जाने 
क्या समझकर 
फुसला रहा हूँ 
बहला - बहला कर 
मेरा असत्य जो कुछ न था 
मुझे पीछे धकेलता है 
मेरा सत्य 
मुझे नोचता खसोटता है 
दिल में 
हर को चाहने का 
बस एक दर्द भर उभरता है 
खाली - खाली उसूल 
खाली - खाली सिद्धांत 
मेरा बीता कल 
आज को घसीटता है 
मैं चाहता हूँ ढूँढना 
अपने उत्पत्ति का कारण 
मेरा मस्तिष्क लहूलुहान हो जाता है 
अपने पूर्वजों से टकरा - टकरा कर 
मुझे बुद्धि का एहसास 
मेरे लिए एक हादसा 
ईश्वर बना मेरे लिए उपहास 
मैं अपनी भावना और एहसास को 
खोना चाहता हूँ 
वंचित होना चाहता हूँ 
मन और बुद्धि से 
हाय ! जग में कोई नहीं 
जिसे मानू मैं दिल से !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०२ - ०६ - १९८४ राँची 
३ - २० pm 

344 .मेरे वक्त यूँ गुजर रहे

३४४ 
मेरे वक्त यूँ गुजर रहे 
गोया मैं कोई गुजरा हुआ वक्त होऊं 
हर लम्हा मेरे 
यूँ कट रहे 
जैसे सूखे पेड़ों की 
कटती हुई डाल हूँ 
भविष्य का अँधेरा 
मुझे आँख भी नहीं 
खोलने दे रहा 
मेरी हर कामना 
धरातल पर आने से पहले ही 
टूटे हुए तारों की तरह 
लुप्त हो जाती है 
मेरी अभिलाषा के फूल 
खिलने से पहले ही 
मरुभूमि में शहादत को पा जाते 
मेरी हर आकांक्षा 
अतृप्त ही रह जाती है 
मैं अपने को 
सत्य - असत्य के पलड़े पर 
असंतुलित रूप में 
जीवन में काँटे को 
दोलायमान पाता हूँ 
और मेरी अनकही कहानी 
कहासुनी के पृष्टभूमि पर ही 
चिपकी हुई रह जाती है !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ३१ - ०५ - १९८४ राँची 
१२ -२० pm 

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

343 .एक समय था

३४३ 
एक समय था 
जब वो बच्ची थी 
बच्चों जैसी 
उसकी हरकतें थी 
जी भरकर मुझसे 
लड़ती थी 
ऐसी बात नहीं 
की वो मुझे नहीं चाहती थी 
पर मैं 
उस वक्त 
अपने को 
बड़ा और समझदार समझ 
ज्यादा करीब 
उसे आने न दिया 
और आज 
मैं बच्चा हो गया हूँ 
मेरी हरकतों को 
वो बचपना समझती है 
और बड़ो की तरह 
मुझसे व्यवहार करती है 
दुनियाँ वो मुझे सिखाती है 
चूँकि मैं अब तक कुँवारा हूँ 
वो तीन बच्चों की माँ है 
मुझे भी बच्चा समझ 
बड़ों की तरह 
मुझ पर अधिकार जताती है !


सुधीर कुमार ' सवेरा ' ३१ -०५ - १९८४ राँची 
१० - ४५ am 

342 .अलग - अलग रंगों में

३४२ 
अलग - अलग रंगों में 
अलग - अलग चेहरे 
बेमुरव्वत से
दीवालों से हैं चिपके 
बेसुध बेचारी दीवालें 
सबके भेद को जाने 
वो चीखती है 
रात के अँधेरे में 
अपने नगरवासियों पर 
उनके भाग्य पर 
कभी रोती हैं 
कभी विद्रूप सी हँसी हँसती है 
वो नकाब उलटाकर 
लोगों को परिचय देती हैं 
सबके लिखे वादों को 
चुटकुले सा सुनाती है 
फिर दीवालें 
गम में डूब जाती हैं 
हर बार के 
बलात्कार से 
अब वो ऊब चुकी है 
हाय रे उसकी मज़बूरी 
ढहाना चाहकर भी 
ढाह नहीं पाती है 
रातों के सन्नाटे में 
एक सर्द आह ही 
भरकर रह जाती है 
वो क्या नहीं जानती है 
त्रिकालदर्शी है 
उसके सगे सम्बन्धी 
कहाँ नहीं हैं 
मानव के 
मानवीय ज्ञान के उद्भव से ही 
वो मानव को 
पहचानती आ रही है 
वो यह कभी नहीं कहती 
मुझ पर लगे मुखौटे को 
तुम अपना लो 
और अपना 
भाग्य विधाता बना लो 
हर बार वो कहती है 
मुझ पर लगे 
इन चेहरों को 
गौर से देखो 
तुम सबों से 
मैं इसे अलग करना चाहता हूँ 
हर बार वो कहती है 
ये चेहरे 
उदविलाव हैं गिरगिट हैं 
सियार हैं 
बच निकलो तुम इनसे 
यही इनकी पहचान है 
पर हाय रे !गूंगा , बहरा , अँधा मानव 
अपने ही हाथों से 
अपने पैरों में बेड़ियां डाल रहा है !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ३१ - ०५ - १९८४ रांची 
१० - २० am   

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

341 .खुशनसीब हर वो दिन

३४१ 
खुशनसीब हर वो दिन 
साथ जब गुजरे 
नेक दिल के साथ 
छूटे हंसी  फव्वारे 
भेद न हो कोई दिल में पास 
कहीं भी दिल में  
किसी के 
कोई भेद भाव न था 
साथ जो गुजरी उन सबों के साथ 
चक्रव्यूह में हम हैं  
चक्रव्यूह के पार 
जानकर सब कुछ 
हर एहसास के पार हैं 
चाहते नहीं चक्रव्यूह में फंसना 
पाते खुद को चक्रव्यूह के साथ हैं 
लगने लगता है 
चक्रव्यूह में सब अपना 
जब याद नहीं रहता खुद का 
जगने के बाद 
हो जाता है पराया हर सपना 
हर निर्णय मुस्कुराता है 
निर्णय लेने के बाद 
चक्रव्यूह से बाहर हो जाने के बाद 
चकव्यूह रह जाता है बरक़रार 
मानवता के तराजू पर 
विहंस रही है क्रूरता और हैवानियत 
कांटे के बीच में खड़ा 
मुस्कुरा रहा है 
मानव की नपुंसकता !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २९ - ०५ - १९८४ राँची 
११ - ३० am 

बुधवार, 26 नवंबर 2014

340 .कविता में जिंदगी का अर्थ ढूंढ रहा था

३४० 
कविता में जिंदगी का अर्थ ढूंढ रहा था 
मौत का पंजा बाहर निकला नजर आया 
समुन्दर से भी गहरे प्यार की तमन्ना में 
रेत का दरिया बहता नजर आया 
झुलसी अधजली 
मेरे अरमानो की चिता पर 
उनका आलिशान महल खड़ा नजर आया 
मेरे वफ़ा को ज़माने ने नादानी कही 
प्यार में उनके पागल हुआ तो हँसता चेहरा उनका 
नजर आया 
लोगो ने कहा कहाँ फंस गए हो 
हर मोड़ पे उनका छलिया चितवन नजर आया !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २२ - ०५ - १९८४ कोलकाता 
९ - ५५ pm