शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

15. जागो मेरे लाल जागो


15-

जागो मेरे लाल जागो
छोरो तुम शहर की ठाठ 
पकड़ो तुम ग्राम की बाट
करो तुम दिनों का उद्धार 
जागो मेरे लाल जागो 
मेरे पुत्र बलिदान हुए 
निज रक्तों का दान किये 
निज यौवन को वार दिये
ममता को फिर तुम छोड़ो
  जागो मेरे लाल जागो 
रो रहा दिन दयाल 
करता है क्रूर - क्रंदन पुकार 
 विदीर्ण होती छाती हमार 
जावो सेवक जुट परो
जागो मेरे लाल जागो 
मेरे शब्दों पे ध्यान धरो 
दलित किसानो का उद्धार करो 
निज जीवन के शोषित लोगों पर 
   सेवा अमृत बरसाओ 
जागो मेरे लाल जागो

सुधीर कुमार ' सवेरा '               २८-०१-१९८४ 
 
   
  

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

14. कहो - कहो ऐ दोस्तों


14-

कहो - कहो ऐ दोस्तों
कौन देता है हमें जीवन ?
हम का मतलब है हर 
चाहे हो राष्ट्रपति चाहे हो कलर्क
कहो - कहो ऐ दोस्तों 
मानव की कौन सी है वो पहली आवश्यकता ?
जिसके बिना न रह सकती ये मानव की व्यवस्था 
जिसके लिए हर कोई बहाता है खून पसीना 
कितनो की जिन्दगी रह जाती 
उसी में है उलझकर 
कितने पहुँच जाते सुरधाम उसी के कारण 
जिसके बिना है फीका हर सुख और साधन 
है उसी की कमी - है उसी की कमी 
इस देश में यारों 
मिलती न सही ढंग से
इस देश में यारों 
मिलती न सही ढंग से 
हर किसी को यारों 
सुनो - सुनो ऐ दोस्तों 
भोजन है ओ चीज 
जिसे चाहे सभी गरीब और अमीर
हमारी तीन आवश्यकतायें  
 हैं रोटी कपड़ा और मकान 
जिसके बाद ही बढती है किसी की शान 
पर देख आज उसकी हालत 
  आई है उस पर ये कैसी आफत 
विदीर्ण होती कलेजा हमार 
  न मिलती है सही बीज और सिंचाई 
स्नो पाउडर से भी बढ़कर  
 हुई है जिसकी कीमत में खिंचाई
 हर किसान हर खाद नहीं ले सकता खुलेआम
 लेने के लिए भी है नहीं उसके पास पुरे दाम
   है प्यारा सा एक नाम ' गरीब किसान '
 धरती माता का ओ बेटा 
जो सींचता है खून पसीने से जमीं को  
 धुप और बारिस जो सहता है जिंदगी भर 
 देखो उसे भी नहीं मिलता है पेट भर
 सस्ते दामों पर ख़रीदे जाते हैं उसके अन्न
   जिसके कारण है उसका वस्त्र विहीन तन
जाकर मिलो उससे  कितना साफ है उसका मन 
उसे ही चुरा कर बना रहे हैं कितने काला धन 
इसे ही देख कर रो रहा है मेरा मन 
सोंचो तो क्या होगा अंजामे वतन ?
जिस देश का अन्नदाता ही होगा भूखा नंगा 
चरों तरफ हो भ्रस्टाचारी - कालाबाजारी का धंधा 
होगी भला क्यों नहीं उस देश में विकलता 
उरेंगे चारों तरफ गीध बनेगी श्मशान ये गंगा 
जब तक न भरेगा पेट उनका  
  होगी न जब तक खाद , बीज और सिंचाई की व्यवस्था 
सुधरेगी न कभी हमारी ये अर्थव्यवस्था 
गाँवों का ये देश तब - तक न होगा खुशहाल
जब तक हैं हमारे किसान फटेहाल 
समझो -  समझो मेरे दोस्तों 
ये बात है समझने की न नारों की न शोर - शराबों की 
    करनी होगी हमें सस्ते बीज , खाद और सिंचाई की व्यवस्था 
होगी हमारी मिलेगी तभी हमें 
हमारी सबसे बड़ी सफलता 
इसी में है निहित सबों की कुशलता 
  छेर दो जिहाद खाओ कसम 
हमारा होगा यही सबसे पहला कदम 
सबों की हो ये ही पुकार 
   पहले किसान -  पहले किसान 
तभी हो पायेगा देश का उत्थान ।

सुधीर कुमार ' सवेरा '           २८-०२-१९८०   

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

13. तुम हो स्वछन्द


13-

तुम हो स्वछन्द 
करते हो मंद - मंद विचरण 
पर मैं कर्तव्यों की जंजीर से बंधा 
क्या कर पाऊंगा तेरा ही आचरण ?
नीले -  नीलगगन 
तेरे ही हैं घर आँगन 
पर मैं संकीर्णता से घिरा 
क्या कर पाऊंगा मंगल गायन ?
      सारे उपवन और चमन 
तेरे ही हैं कुल भवन 
क्या तुझे भी है कोई बन्दिस ?
या कोई नियम की बाध्यता ?
  धन्य हैं तेरे भाग्य 
करते हो उन्मुक्त विहार 
पर मैं तुझ से जलता नहीं 
तुम ही तो हो मेरे मीत
पहुँचती है मिलती है 
जिस से प्रीति संदेस  ।


सुधीर कुमार ' सवेरा '          १६-०२-१९८० 

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

12. दिल का दर्द बंटाओ थोड़ा


12-

दिल का दर्द बंटाओ थोड़ा
पल दो पल का का साथ निभाओ जरा 
आज दुःखों के बादल छाये 
अपने भी आज हुए पराये 
साथ तुम तो निभाओ थोड़ा 
जब - जब तुमको याद किया 
दुःख में गम में साथ दिया 
नहीं ! नहीं ! नहीं !
सुख तो मैंने पाया नहीं 
प्यार किसी का पाया नहीं 
वफा किसी का जाना नहीं 
जब से जाना दर्द ही पाया 
सुख का साथ रहा नहीं 
जब - जब तुमको याद किया 
तब - तब तुम दौड़ी आई 
   खुशियों की झोली लाई 
तेरा मेरा जन्मों का साथ 
  साथ कभी ना ये छूटे 
 जो तुम मुझ से रूठ गई 
साथ मेरा जो छोड़ गई 
कौन देगा मुझको प्यार 
आँचल की छैयां जो तेरी हंट गई 
हो जाऊँगा बेकार 
तुम रूठी तो मैं टुटा 
तुम छुटी तो जग छुटा 
   ऐसे ना तुम कभी छूटना 
साथ मेरे तुम हरदम रहना 
कर जाऊँगा भवसागर पार !


सुधीर कुमार ' सवेरा '            १३.०२.१९८०

सोमवार, 30 जनवरी 2012

11. मैं अनुभवी हो गया हूँ


11-

मैं अनुभवी हो गया हूँ 
मेरे भाग्य उनके अभाग्य 
मेरे लिए 
मैं अपराधी वे निर्दोष 
उनके लिए 
होनी को रख ताख पे 
थोप मुझ पे 
घटना का सारा दोष 
कोसा है उन्होंने जी भर 
कहा तुम दोस्त हो 
दुश्मन से भी बदत्तर हो 
वक्त पड़ा साथ का 
तो कुंए में धकेलते हो 
छिः
   तुम पर लानत है 
थूः
शिक्षित युवक  हो
लगते पर चोथू हो 
कहा उनको 
शिक्षित हूँ 
व्यवहारिक नहीं 
मत बोलो कुछ 
किया जानबूझकर है 
    कहा उन्होंने 
खैर वक्त पर संभल गया हूँ 
धिक्कारा पहले अपने को 
पर नहीं 
अब में अनुभवी हो गया हूँ ! 


सुधीर कुमार ' सवेरा '            ०८-०२-१९८०

शनिवार, 28 जनवरी 2012

10. ऐ जीवन तूं पतझर


10-

ऐ जीवन तूं पतझर
या तेरी जमीं ही है बंजर ?
  चलते हैं जिसपर केवल  खंजर 
ओढ़े हुई है फटी चादर 
मज़बूरी ही है क्या तेरा नाम ?
  क्या केवल तूं है विवशता ?
अब भी तूं अपने को जान 
क्या है तेरी आवश्यकता ?
ऐ जीवन तूं पतझर 
तेरी कीमत है अनमोल 
अब भी अपने को पहचान 
क्यों देती है विष घोल ?
ऐ जीवन तूं पतझर  
  किधर है ख्याल तेरा तूं कंहाँ  है ?
सुन ' सवेरा ' से 
यह इबादत का बंया  है
कर ले इन्साफ तूं अपने से 
हर जगह तेरा ही तो महकमा है 
गूंज उठेगी कहकहा 
हर और एक ही वाक्या  है
ऐ जीवन तूं पतझर ! 

सुधीर कुमार  ' सवेरा '            ११-०१ - १९८० 

रविवार, 15 जनवरी 2012

9. बेहद तीखे हैं मेरे अनुभव


9-
बेहद तीखे हैं मेरे अनुभव 
अविश्वसनीय अकथनीय 
सूरज की लाली किरणों ने बताई शाम में 
कलि खिली देख भौंरा खिल जाता है 
पर प्रतिफल से अनजान 
शायद वह है हम सा ही नादान
प्रकृति हाँ है या ना है 
    उसके एक वसंत - पतझर से
ना ही यह पता चलता है 
पर मांझी की पतवार 
आश को थामे हुए हूँ
उस एक दिन की तलाश में 
बरसों से भटक रहा हूँ
देखूं वो तलाश कब समाप्त होती है 
या वो तलाश मुझे ही ख़त्म करती है !

सुधीर कुमार ' सवेरा '          १५-०२-१९८०