गुरुवार, 20 नवंबर 2014

336 .तुम संतुष्टि

३३६ 
तुम संतुष्टि 
अंदर में चाहते हो 
और बाह्य दृष्टि से 
अपने को 
अलग नहीं कर पाते 
हमारा मूल 
जिसकी हमें तलाश है 
हम सर पीटते हैं 
और भटकते हैं 
भौतिकता से 
हम खुद को 
अलग नहीं कर पाते 
परिणाम 
अन्तः जिसे चाहा न था 
पाकर भी वो रोयेगा 
और आध्यात्मिकता 
जो जीवन की दवा है 
दूर उससे भागते हैं 
फिर कैसे भला 
हम आशा करें 
कष्ट हमारे दूर होंगे 
हर पल 
एक नया जख्म 
ले लेते हैं 
पुराने जख्मो के 
भरने के प्रयास में 
खुद को खुद से 
दूर कर लेते हैं 
खुद के पास आने में 
जिनसे मानवता कराहती है 
समाज में जो दुःशासन हैं 
उन्हें ही हम 
जिरहबख्तर मुहैया कर 
मजबूत बना रहे हैं 
इस तरह शैतान को 
दिनों दिन बलशाली बनाकर 
उसकी पूजा कर रहे हैं !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०८ - ०५ - १९८४ 
४ - ०० pm 

बुधवार, 19 नवंबर 2014

335 .तुम और तुम्हारा समाज

३३५ 
तुम और तुम्हारा समाज 
ग्रसित है अमानवीय रोगों से 
तुम्हारे मनीषी 
जो उपचार बतलाते हैं 
वो रोग की भयंकरता 
बढाती है 
आग के शांति का उपाय 
घी नहीं होता 
शांति के हेतु 
अशांति कभी साधन नहीं हो सकता 
पर हम अपनी 
बुद्धि को 
कुंठित कर 
हर बार 
एक नया विष 
पैदा कर 
उसे ही अमृत कह 
ऊँचे कीमतों में बेचते हैं 
कोई और नहीं 
हमारे रोने का कारण 
हम खुद हैं 
वर्तमान में 
मानव 
बहुत शक्तिशाली है 
मानवता फिर भी 
रोती है 
आखिर ऐसा क्या है 
जो हमारे सही 
ज्ञान को भी 
ग्रस लेता है
क्यों न हम 
उसे ही ग्रस लें !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ०८ - ०५ - १९८४ 
२ - ०० pm  

334 .मुझे मौत

३३४ 
मुझे मौत 
गर हो देना 
दे दो मुझको 
शान्त्वना विहीन शब्द 
गर जो 
जिंदगी हो देना 
दे दो मुझको 
शान्त्वना के दो शब्द !

सुधीर कुमार ' सवेरा '  

सोमवार, 17 नवंबर 2014

333 .दर्द में डूबी शाम है मेरी

३३३ 
दर्द में डूबी शाम है मेरी 
गर्द में डूबा नाम 
नाम तेरा ले - ले के हम तो 
प्यार में हुए बदनाम 
मन मंदिर में 
तुझको बिठाकर 
कुचल गए मेरे 
सारे अरमान 
तुम जो न होते 
यार मेरे तो 
अपना होता 
ऊँचा नाम 
वफ़ा करके तुझसे हम 
होते न यूँ बर्बाद सनम 
करके मोहब्बत 
तुझसे हमने 
क्या - क्या न 
जुल्म सहे 
दिल भी टुटा 
आश भी छूटी 
दर्द की ऐसी 
बांध जो टूटी 
बिखर गया तिनका - तिनका 
आदर्शों के मेरे 
जो तूने महल तोड़ी 
दर्द में डूबी शाम है मेरी 
गर्द में डूबा नाम 
नाम तेरा ले - ले के हम तो 
प्यार में हुए बदनाम !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ३० - ०४ - १९८४ 
कोलकाता २ - १० pm 

रविवार, 16 नवंबर 2014

332 .सर्द हवा के झोंके से

३३२ 
सर्द हवा के झोंके से 
तुम क्यों ऐसे मिले 
मैं तो गीली मिट्टी था 
तुमने जैसे चाहा 
सांचे गढ़े 
ख़ुदपरस्ती की दुनियाँ में 
खुदगर्ज क्या तुम मिले 
कोरा कागज था मैं 
जैसे चाहे तुमने रंग भरे  
मेरा सूना 
आकाश चुनकर 
मनमाने सितारे भरे 
तुम जब थे मिले 
सूना मेरा आँगन था 
विस्तृत थे मेरे विचार 
पर जान सका न 
तेरा ये 
अव्यवहृत व्यवहार 
खामोश सर्द मैं 
गर्म मेरी आह 
ईश्वर करे 
बचा ले तुम्हे 
बस इतनी सी है 
मेरी चाह 
हाँ जानता हूँ मैं 
तुम मेरे 
सपनो और यादों के कमरे में 
आया करोगे 
जी भर मुझे सताया करोगे !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' ३० - ०४ - १९८४ 
११ - ३० am 

331 .बहुत दिनों के बाद

३३१ 
बहुत दिनों के बाद 
तुम्हे देखा 
तेरी पहचान 
और उसका अंतराल 
मेरे जिज्ञासा को 
मेरे अनुमानित विचारों को 
जैसा 
मैंने समझ रखा था 
यह तो 
मैदान की गलती थी 
ऐसा ही क्यों उसने समझ रखा था 
केवल पानी ही आयेगा 
और कुछ नहीं 
सो मैं 
समझ न पाया 
वो तुम हो 
हाँ वही नाम 
वही रूप रंग 
आवाज भी वही 
फिर भी 
कुछ ऐसा 
जिसे सिर्फ 
मेरा 
अंतःस्थल 
समझ रहा था
वो तुम में 
कुछ 
शायद खो गया था 
पर तुमने जिसे 
अपनी पदोन्नति समझकर 
अपने 
अंकों में 
भर लिया था 
मैं फिर 
नए सिरे से 
तुम्हे 
जानना चाहता हूँ 
मेरी हर बात पे 
अब तुम 
हंसा करते हो 
पहले ऐसा नहीं था 
तब तुम 
बड़े मनोयोग से 
सुना करते थे 
तेरी उम्र शायद 
मुझसे बहुत कम है 
पर तेरी हंसी 
काफी अनुभव लिए है 
मैं सत्य को पाकर भी 
काफी सोंचता हूँ 
असत्य का मुलम्मा 
तेरे पहचान को 
मुझसे जुदा कर रहा है 
पर मैं खुश हूँ 
तुम्हे विचारों के बिना 
जीना आ गया है !  

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २८ - ०४ - १९८४ 
कोलकाता ११ -३२ am 

शनिवार, 15 नवंबर 2014

330 . बंद जिसके अक्ल के दरवाजे

३३० 
बंद जिसके अक्ल के दरवाजे 
अर्थों के जो भेद न जाने 
अकड़ा बैठा कुर्सी पे बड़े 
कहीं आज प्रकाशक हैं कहलाते 
नैनों को आच्छादित किये 
अक्षरों के विशालन के लिए 
फिर भी वो 
सूक्ष्मत्तर भेद को न जान पाये 
गर्दन में लगे 
फांसी के गांठ को 
उठकर लूज करते हुए 
पटक रचनाओं को 
औरों के सिर पर 
कहते हैं  क्या बकवास लिखा है 
प्रेषक के डिग्री पढ़ 
रचनाओं को समझता 
सारगर्वित शब्दों को 
बकवास समझता 
छेड़खानी को बलात्कार कहता 
मारपीट को जातीय दंगा कहता 
खुद हुस्न और दौलत की 
आग में जलता रहता 
निर्दोष कलमों की 
भाषा न समझ पाता 
समाज देश , व्यक्ति के
जीवन का अर्थ न समझता 
निर्दोष व्याधि रही रचनाओं  में 
आज का प्रकाशक 
शब्दों का अर्थ हाथों से टटोलता !

सुधीर कुमार ' सवेरा '