शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

655 . हेमन्त - किशोरी - जननि ! अब जनु होइअ भोरि।


                                        ६५५
                              हेमन्त - किशोरी
जननि ! अब जनु होइअ भोरि। 
पूजा ध्यान एकओ नहि जानिअ , तोहर चरण गति मोरि ।।
सुत अपराध कोटि जँ करइछ , माता होए न कठोर। 
जओं मोर दोष लिखल बसुधा भरि , उदधि करिअ मसि घोरि।।
सब विधि आस राखल देवि तोहर , सुनु - सुनु हेमंत - किसोरि।
जलपादत्त विनति करू भगवति , तोहे देवि अधम उधोरि।।
जलपादत्त  ( हिन्दी साहित्य और बिहार भाग - २ )

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

654 .जय गंगाजी जगजननी , जय सन्तन सुखदाई।


                                     ६५४
                                    गंगा
जय गंगाजी जगजननी , जय सन्तन सुखदाई। 
चरण कमल अनुराग भागसौ , लय ब्रह्मा उर लाई।।
चारि पदारथ अछि जगजीवन , वेद विमल जस गाई। 
भक्त भगीरथ उनके कारन , प्रगटि अवनि मँह आई।।
तेज प्रताप कहाँ धरि बरनब , शंकर सीस चढ़ाई। 
हेम - शिखर पर ललित मनोहर उर जयमाल सोहाई।।
ताकर नाम लेत जम किंकर करुणा करू फिरि जाई। 
राम नाम गंगा कलि केवल , दास और ने उपाई।।
' कान्हरदास ' आस रघुवर के हरिख निरिख गुनगाई।।
 कान्हरदास- हिन्दी साहित्य और बिहार , भाग - २ , राष्ट्रभाषा परिषद्  

बुधवार, 4 जनवरी 2017

653 . हे दयामयि होउ सहाय। लक्ष्मी स्वरूपा तोहें कमला माय।।


                                       ६५३
                                     कमला
हे दयामयि होउ सहाय। लक्ष्मी स्वरूपा तोहें कमला माय।।
तुअ जल सभ जन भक्ति सौं नहाय। बिन श्रम सुखित सरगपुर जाय।। 
निर्मल अमृत जल दर्शन पाय। नित दिन तिरहुति पाप नशाय।।
सत्वर करू देवि तेहन उपाय। शिवक चरण ' चन्द्र 'मन लपटाय।।  
                                               ( चन्द्र रचनावली )

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

652 . जय गाधिसुते , जय जय कौशिकि देव सुते।।


                                       ६५२
                                 श्रीकोशिका
जय गाधिसुते , जय जय कौशिकि देव सुते।।
जय जय विश्वामित्र सहोदरि जय जय सकल लोक महिते। 
मिथिला पूर्व सम सांस्थायिनि जय जय सकल सगुण सहिते।।
पाहि पाहि परमेश्वरि मामिह सुरसरिता साकं मिलिते। 
तीव्र तरंग सुतातिभिल्लरलिते जय जय चपलवेग चलिते।।
जय जय चन्द्रक वेर लघनाशिनि जय जय देवि कलुष रहिते। 
पापराशि विध्वंसिनि सततं जय जय निज जन परम हिते।।
                                              ( तत्रैव ) 
  

सोमवार, 2 जनवरी 2017

651 . सब सकल देवि मोर कृत दोष हे। नै करिय सुरसरि शिशु पर रोष हे।।


                                      ६५१ 
सब सकल देवि मोर कृत दोष हे। नै करिय सुरसरि शिशु पर रोष हे।।
तुअ बल केवल ह्रदय भरि पोष हे। धयल शरण सुनि सुजस सुबोध हे।।
की करत सञ्चित अनन्त रत्नकोष हे। की करत पामर सहसतत तोष हे।।
करू करू गंगा देवी मोरा निरदोष हे। चन्द्र मन हो निराश यम कोप चोष हे।।
                                                   ( चन्द्र रचनावली )

रविवार, 1 जनवरी 2017

650 .गंगा तुअ महिमा कहल नहि जाय हे। शंभु माथा राखल चढ़ाय हे।


                                   ६५०
गंगा तुअ महिमा कहल नहि जाय हे। शंभु माथा राखल चढ़ाय हे।
पतित उधार नहि दोसर उपाय हे। सुयश पताका तुअ जग फहराया हे। 
वेद ओ पुरान गण देलनि सुनाय हे। तुअ तट सेवितहिं निरमल काय हे।।  
चन्द्र कवि कर जोड़ि कहथि सुनाय हे। अन्त नै बिसरू मोरा सुरसरि माय हे ।।   
( चन्द्र रचनावली )

649 . तुअ बिनु आज भवन भेल रे , घन विपिन समान।


                                   ६४९
                              श्रीसीता 
तुअ बिनु आज भवन भेल रे , घन विपिन समान। 
जनु ऋषि सिधिक गरुअ भेल रे , मन होइछ भान।।
परमेश्वरि महिमा तुअ रे , शिव विधि नहि जान। 
मोर अपराध छमब सब रे , नहि याचब आन।।
जगत जननि का जग कह रे , जन जानकि नाम। 
नैहर नेह नियत नित रे , रह मिथिला धाम।।
शुभमयि शुभ शुभ सब दिन रे , थिर पति अनुराग। 
तुअ सेवि पुरल मनोरथ रे , हम सुखित सुभाग।।
                                            ( रामायण )