शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

292. तुम्हारी याद मेरी जिन्दगी का हासिल है !



२९२.

तुम्हारी याद मेरी जिन्दगी का हासिल है !
तुम्हारी याद में कायम है जिन्दगी मेरी !!

कि निगाहें आपकी याद आ रही हैं !
मुझे देखा था आपने जिस नजर से !!

जब तलक मिले न थे तुझसे कोई आरजू न थी !
देखा जो तुझे तेरे तलबगार हो गए !!

अब इस फ़िक्र में ही रात दिन कट रहे हैं !
तुझे भूल जाएँ , या खुद को भुला दें !!

चाहकर इस कदर जो भुला दिए तुम !
दिल ही जानता है जी रहे हैं किस दिल से हम !!

ऐसा आसाँ नहीं मोहब्बत करना !
यह काम उनका है जो जिन्दगी बर्बाद करते हैं !!

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १९ - ०६ - १९८४ 

291 . दिल जिनसे लगा बेमुरब्बत से वो छोड़ गए !


२९१.

दिल जिनसे लगा बेमुरब्बत से वो छोड़ गए !
इंतजार की आखिर दवा मौत ही है !!

तुझसे दिल लगा कर इतना ही मिला !
जब आई तेरी याद आंसू निकल आये !!

शामिल नहीं है जिसमे तेरी मुस्कराहट !
वह जिन्दगी भी किसी जहन्नुम से कम नहीं !!

अभी से क्यों छलक आये तुम्हारी याद से आंसू !
अभी छेड़ी कहाँ है दास्ताने जिन्दगी मैंने !!

बेवफाई को भी वफा समझा !
हमने जालिम तेरे ख़ुशी के लिए !!

अपनी तन्हाई व साये से लिपट कर सो गए !
रख के अपने दिल पे गम का पत्थर सो गए !!

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १९ - ०६ - १९८४ 

290. चलती हैं आप सीना उभार के


२९०.

चलती हैं आप सीना उभार के 
पैरों में परे को ठोकर मार के 
क्या आप ही एक जवाँ है 
और कोई जवाँ नहीं ?

बाँकी दिल में कोई न अरमान रहे !
या रब इस दिल में वो लाखों बरस रहें !!

भींगे हुए बालों से जो झटका उसने पानी 
झूम कर घटा छाई , टूट के बरसा पानी !!

मुझे तेरी आँखों से सदा सरोकार रहेगा !
जी कर भी दिल तो सदा बीमार रहेगा !!

याद उनकी जो आयी 
बेगैरत से आँखों से आंसू निकल पड़े 
मुद्द्त के बाद गुजरे जो हम उनके गली से !

सितम करने वाले क्या तुमको पता है !
मेरे दिल की दुनियां है वहीँ तूं जहाँ है !!

दिल को चुरा के खाक में मुझको मिला दिया !
जिन्दगी तो चार दिन की थी उसे भी जिन्दा जला दिया !

लोग कहते हैं रात बीत चुकी !
उन्हें समझाओ मैं शराबी नहीं !!

सबको अपनी ही सुनाने की पड़ी है !
मेरी कौन सुनेगा किसको मेरे सुनने की पड़ी है !!

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १९ - ०६ - १९८४
८ - २४ am  

289 . यहाँ किसी को भी इश्के आरजू न मिला !


२८९.

यहाँ किसी को भी इश्के आरजू न मिला !
किसी को हम मिले और हमको तूं न मिला !!

दिल ने चाहा था उनको इस कदर कभी !
कि दिल से उनकी याद आज तक न गयी !!

और क्या देखने को बाँकी रहा !
दिल लगा कर आप से सब देख लिया !!

दोस्त जो बना रहता वो या रब क्या होता !
दुश्मनी पे भी उनके प्यार मुझको है आता !!

हमने देखा कुछ रात गए कुछ रात रहे !
हर पर्दानशीनों को निकलते हुए !!

रात ऐसी नींद नहीं कहानी बनी !
हाय क्या चीज है जवानी भी !!

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १९ - ०६ - १९८४ 

288 . इंतजार - इंतजार


२८८.

इंतजार - इंतजार 
जिन्दगी को मौत का है इंतजार 
इंतजार - इंतजार 
बेवफाई की राह में 
वफा का है इंतजार 
इंतजार - इंतजार 
जिन्दगी को मौत का है इंतजार 
गम की दुनिया में 
बेबसी के मारों को 
अँधेरी दुनियां में 
रोते बिलखते इन्सानों को 
झूठे आशा का है इंतजार 
इंतजार - इंतजार 
सुनी - सुनी राहें 
आंसू हैं तन्हा जीवन का साथी 
बेचैन राहें 
मेरी जिन्दगी तुझको पुकारे 
धुप छाँव में 
सर्दी गर्मी से ठिठुरती अरमाने 
कह रहा है ये दिल आज 
तुम ही हो मेरे प्यार 
तेरा ही है इंतजार , इंतजार - इंतजार

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १९ - ०६ - १९८४  

287. पल में अतिशय उल्लास


२८७.

पल में अतिशय उल्लास 
भर देती क्षण में संत्रास 
यही है जीवन का आभास 
दंभ व्यर्थ मनुष्य को अपने पौरुष पर 
काल का चक्का हाथ में जिसके वो बैठा है नभ पर 
अक्ल तेरी जितनी भी भली 
बुद्धि तेरी जितनी भी बड़ी 
अनायास ही क्यों क्षणिक यह तेरा अहंकार 
काल के सामने तूं है बिलकुल लाचार !

सुधीर कुमार ' सवेरा '  २१ - ०५ - १९८४ 
१२ - ५७ am  कोलकाता 

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

286 . मेरे बीते दिन को न छेड़


२८६.

मेरे बीते दिन को न छेड़ 
दफनाये अतीत को न कुरेद 
कहानी वो खामोश होने दे 
जिंदा लाशों के पात्रों के शिवा कुछ भी नहीं 
हाय रे किस्मत 
कहाँ गए वो दिन ?
मेरे अतीत के धुंधलके में 
बेवफाईयां चमकते हैं सितारे बनके 
मद्धिम सी रौशनी अब भी 
मेरी उजड़ी हुई राहों का पता बताती है 
राहें जो मेरी मंजिल की ओर जाती थी 
अब उस मंजिल का ख्याल भी 
शायद मेरे पास है नहीं 
हाय रे वक्त 
दिल ने फकत पहली वो तमन्ना की थी 
पुरुस्कार में 
अनगिनत दाग मेरे दिल पे पड़े 
वाह मेरे महफूज सितमगर 
वो मेरे अतीत के आवाजों 
मेरे कानो तक न आओ 
अतीत का नाम मेरे सामने ना दुहराओ 
मेरे अतीत में 
काबिले जिक्र कोई बात नहीं 
छेड़ कर कहानी ऐसी 
होगा क्या हासिल तुझे 
जिस से इन्सान का दिल दुःख जाये 
हाँ ये मुमकिन है 
याद कर अपने अतीत को 
अपने चेहरे को झुलस डालूं मैं 
यारों इतना एहसान करो 
मेरे अतीत की दबी राख रहने दो 
अगरचे नामुमकिन नहीं 
कोई चिंगारी उड़ जाये 
और जिन्दगी के खलिहान में आग लगा दे 
जिन्दगी अब भी गर खुशहाल नहीं 
फिर भी अतीत से मेरे कहीं बेहतर है !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २०- ०४ - १९८४ 
११ - ३० am