शनिवार, 24 सितंबर 2016

594 . श्रीतारा


                                 ५९४ 
                              श्रीतारा 
गिरिनन्दिनी शुभ दीन हरखि मिथिलापुर आई। 
चन्द्र कोटि छवि विमल वसन लखि आनन्द उर न समाई। 
नयन चकोर सरद विधुमण्डल एकटक रह्यो लगाई। 
मोहित मधुकैटभ मद भंजनि सुरगण शक्ति समूले। 
महिष महारव सबल विपद लखि सुमन सुवरखहिं फूले ।।
शोभाधाम कामना सुरतरु जनमन दायिनि चैन। 
मणिमय अज़रि कनक गिरि वासिनि नाशिनि धूमर नैन।।
चण्डमुण्ड सिर खण्डिनि भगवति रक्तबीज संघारि। 
शुम्भ निशुम्भ दनुज कुल नासिनि सिंहक पीठ सवारि।।
सुर गन्धर्व दनुज गण किन्नर कर गोचर कर जोरि।।
पाय अभयवर दहिन हाथ तुअ अति हर्षित चित मोरि।। 
तारा पद सरोज शरणागत सेवक संकर गाई। 
नित अभिनव मंगल मिथिलापुर घर - घर बाजत बधाई।।
( मैथिल भक्त प्रकाश ) शंकर 

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

593 . आदिशक्ति


                                     ५९३ 
                               आदिशक्ति 
जय जय आदि शक्ति शुभदायिनि। महिधर शायिनि देवी। 
सुर नर मुनि गण सकल सुखित मन केवल तुअ पद सेवी।।
हमहु शरण धय चरण अराधल तोहि करुणामय जानी। 
तइओ रहल दुःख सपनहुँ नहि सुख तकर परम होअ हानी।।
हम सम अधम जगत नहि दोसर जप तप गति नहि जानी। 
अब हम मगन भेलहुँ भवसागर गति एक तोहीं भवानी।।
जत अपराध कएल भरि जीवन कहि न सकिअ तत माता। 
सुत शरणागत सेवक पामर सभक जननि तोँ त्राता।।
दुहु कलजोड़ि अरज अवनत भए शम्भुदत्त  कवि भाने। 
त्रिभुवनतारिणि अधम - उधारिणि ! देहु अभय वरदाने।।
(  मैथिली गीत रत्नावली ) शम्भुदत्त 

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

592 . गोसाउनि


                                   ५९२ 
                                गोसाउनि 
तोहीँ धरनी तोहीँ करनी , तोहीँ जगतक मात।। हे माई।।
दश मास माता उदर में राखल , दश मास दूध पियाब। 
निरंकार निरंजनि लक्ष्मीश्वरि , भवधरनि तोँ कहाव।।
सुरमाक रथ चढ़ि तोहीं बैसलि दुर्गा नाम धराव। 
पण्डित केर तोँ पोथी जांचह , सरस्वति नाम सुनाव।।
गाइनि मुख में गान भए पैसलि , सुस्वर गीत सुहाव। 
मंगनीराम चरण पर लोटथि , भक्ति मुक्ति वर पाव।।
( हिस्ट्री ऑफ़ मैथिली लिटरेचर ) मंगनीराम 

बुधवार, 21 सितंबर 2016

591 .भगवती गीत


                               ५९1 
                        भगवती गीत 

शंकरि शरण धयल हम तोर। 
कुकुरम देखि अधिक यदि कोपित की करता यम मोर। 
सुर तरुअर तर शिव उर ऊपर वास हास् अति घोर। 
सहस दिवसमणि चान कोटि जनि तनु दुति करत इजोर।।
सहज खर्च अति गर्वक मातलि लम्बोदरि जगदम्बे।
मनुज नागवर सकल सुरासुर सबकां तोहिं अवलम्बे।।
बाम हाथ माथ अति कोमल दहिन खर्ग कर काती।
पाँच कपाल भाल अति राजित श्री इन्दीवर कांती।।
शिव शव आसिनि संग योगिनि गण पहिरन वाघरि छाला।
रक्त रक्त लहलह कर रसना नवयौवन मुण्डमाला।
फणी नेउर केउर फणी कंकण हृदयहार फणी राजे।
सहरसना फणी फणी - युग कुण्डल जटामुकुट फणी छाजे।।
चउदिस फेकव शव मुंडावलि चिता अग्नि सन गेहे।
तीन नयन मणिमय सब भूषण नव जलधर सम देहे।।
शिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक नर मुनि धरत धेयाने।
त्रिभुवन तारिणि नरक निवारिणि ! सुमति कृष्णपति भाने।।
( मैथिल भक्त प्रकाश ) कृष्णपति

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

590 .श्रीशिवंकरि


                                     ५९० 
                               श्रीशिवंकरि 
जय जय जय नत सतत शिवंकरि परिहित नर सिर माले । 
लम्बित रसन दसन अति भीषम वसन मिलल बघछाले।।
चउदिस मानुस माँसु मुदित अति फेरु फुकर कर रासे। 
मणिमय विविध विभूषण मंडित वेदि विदित तुअ वासे।।
भूत पपरेत पिशाच निशाचर अगनित जोगिनि जाले। 
जखने न जगत - जननि तुअ संगति तहँ न कहिअ कोन काले।।
विमल बाल रविमण्डल सन तुअ तीन नयन परगासे। 
असुर रुहिर मदिरा मद मातलि वदन अमिञ सम हासे।।
तुअ अनुरूप सरूप बूझिअ नहि तैओ तोहर गुन गाऊं । 
जे कहि तुअ पद बन्ध करिञ देवि निञ जनें लोचन लाऊ।।
लोचन 

सोमवार, 19 सितंबर 2016

589 .श्रीकंकाली


                                       ५८९
                                  श्रीकंकाली 
वदन भयान कान शव कुण्डल विकट दशन धन पांती। 
फूजल केश वेश तुअ के कह जनि नव जलधर कांती।।
काटल माथ हाथ अति शोभित तीक्ष्ण खडग कर लाई। 
भय निर्भय वर दहिन हाथ लए रहिअ दिगम्बरि माई।।
पीन पयोधर ऊपर राजित लिधुर संवित मुण्डहारा। 
कटि किंकिणि शव - कर करू मण्डित सिक वह शोणित धारा।।
वसिय मसान ध्यान शव ऊपर योगिनि गण रहू साथे। 
नरपति पति राखिअ जगईश्वरि करू महिनाथ सनाथे।।
( मैथिल भक्त प्रकाश ) महाराज महिनाथ ठाकुर 

रविवार, 18 सितंबर 2016

588 .श्रीगंगा ६


                                         ५८८ 
                                  श्रीगंगा ६ 
हे गंगे न गुमल भल मन्द यौवन दापे। गुपुत वेकत अरजल कत पापे ।।
कत कत पाप कयल हम रोसे। अधम उधारिनी तोहर भरोसे।।
निरधन धन जक राखल गोये। तुअ पय परसल हनल सब धोये। 
दिअ दरसन मन आतुर मोरा। करिय कृतारथ लोचन जोरा।।
कर जोड़ि विनति महेश निवेदे। मरण शरण दिअ अन्त परिछेदे।।
                                                                                  ( तत्रैव )