बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

19. कांटे , पतझर , शीशम , गुलाब ,


19-

कांटे ,
पतझर ,
शीशम ,
गुलाब ,
सभी हैं वक्त के साथ 
वाह रे वक्त तेरा जबाब नहीं 
तिल को तार नहीं 
राई को रस्सी नहीं 
बूंद को सागर नहीं 
किया तो क्या किया ?
याद रखूंगा मैं भी तुझे 
    क्या - क्या न तुने किया 
मन न भड़ा तो पेट पीठ एक कराया 
अब चूस लिया तुने 
छोड़ा क्या जो छोड़ा ओ भी ले 
उफ न करूँगा आह न भरूँगा 
भर जाए तेरा मन 
बस इतनी दुआ 
मैं रब से करूँगा ! 

सुधीर कुमार ' सवेरा '            ०३-०३-१९८०    

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

18. हर्षित हूँ हर्षित है


18-

हर्षित हूँ हर्षित है 
यह तप भूमि भारत वर्ष 
गर्वित हूँ गर्वित है 
यह वसुंधरा एवं श्रमिक वर्ग 
टूट चुकी लोहे की कड़ी 
मिट चुकी तानाशाही वर्ग 
सफल हुई श्रम हमारी 
बन गई मिटटी पर्वत 
श्रमिक ही हैं श्रम के सरताज 
तुम ही हो उत्पादन के आधार 
लाऊं कहाँ से शब्द जाल 
अर्पण करता हूँ ह्रदय हार 
कर लो स्वीकार ये प्रेम उपहार 
मजदुर एकता जिंदाबाद 
वर्तमान है तेरे साथ
भविष्य होंगे तेरे साथ 
तेरे साथ होगा सदा 
अपनों का असीम प्यार ! 
        
सुधीर कुमार ' सवेरा '                 ०४-१०-१९८०
      

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

17. हम बढ़ते जा रहे हैं


17-

हम बढ़ते जा रहे हैं 
 एक दूसरी गुलामी में
जकड़ते जा रहे हैं 
हर बार की खुशामद के बाद 
 हम सिर्फ आह भरते जा रहे हैं 
पर लोग इस गुलामी के दिवार को 
बेहद मजबूत बनाते जा रहे हैं 
होगी एक बड़ी खुनी क्रांति 
पलट जायेगी तब सारी बात पुरानी 
 न रह जाएगा तब मैं और तुम 
बस रहेंगे केवल हम ही हम 
न कोई आश्रित कहलायेगा 
  न कोई निराश्रित कहलायेगा 
बहुजन हिताय बहुजन सुखाय 
के भाव से तब 
सभी जी पायेंगे !

सुधीर कुमार ' सवेरा '           ११-०७-१९८०             

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

16. जो है गन्दी गली के भीतर


16-

जो है गन्दी गली के भीतर 
 खबर नहीं जिसकी लेता मेहतर 
उनके दम पर खड़े रहें 
आदर से बातें करें 
देना भोट एक है काम 
उस दिन कहना मेरा नाम 
भाई यह रटे रहना 
भूलेंगे नहीं रहते प्राण 
ओ हैं आदमी कितने भले 
कागज़ की एक टुकड़ी के लिए 
आये हैं ओ हाथ फैलाने 
पांच साल के बाद कुछ याद दिलाने !

सुधीर कुमार ' सवेरा '          २६-०१-१९८० 

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

15. जागो मेरे लाल जागो


15-

जागो मेरे लाल जागो
छोरो तुम शहर की ठाठ 
पकड़ो तुम ग्राम की बाट
करो तुम दिनों का उद्धार 
जागो मेरे लाल जागो 
मेरे पुत्र बलिदान हुए 
निज रक्तों का दान किये 
निज यौवन को वार दिये
ममता को फिर तुम छोड़ो
  जागो मेरे लाल जागो 
रो रहा दिन दयाल 
करता है क्रूर - क्रंदन पुकार 
 विदीर्ण होती छाती हमार 
जावो सेवक जुट परो
जागो मेरे लाल जागो 
मेरे शब्दों पे ध्यान धरो 
दलित किसानो का उद्धार करो 
निज जीवन के शोषित लोगों पर 
   सेवा अमृत बरसाओ 
जागो मेरे लाल जागो

सुधीर कुमार ' सवेरा '               २८-०१-१९८४ 
 
   
  

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

14. कहो - कहो ऐ दोस्तों


14-

कहो - कहो ऐ दोस्तों
कौन देता है हमें जीवन ?
हम का मतलब है हर 
चाहे हो राष्ट्रपति चाहे हो कलर्क
कहो - कहो ऐ दोस्तों 
मानव की कौन सी है वो पहली आवश्यकता ?
जिसके बिना न रह सकती ये मानव की व्यवस्था 
जिसके लिए हर कोई बहाता है खून पसीना 
कितनो की जिन्दगी रह जाती 
उसी में है उलझकर 
कितने पहुँच जाते सुरधाम उसी के कारण 
जिसके बिना है फीका हर सुख और साधन 
है उसी की कमी - है उसी की कमी 
इस देश में यारों 
मिलती न सही ढंग से
इस देश में यारों 
मिलती न सही ढंग से 
हर किसी को यारों 
सुनो - सुनो ऐ दोस्तों 
भोजन है ओ चीज 
जिसे चाहे सभी गरीब और अमीर
हमारी तीन आवश्यकतायें  
 हैं रोटी कपड़ा और मकान 
जिसके बाद ही बढती है किसी की शान 
पर देख आज उसकी हालत 
  आई है उस पर ये कैसी आफत 
विदीर्ण होती कलेजा हमार 
  न मिलती है सही बीज और सिंचाई 
स्नो पाउडर से भी बढ़कर  
 हुई है जिसकी कीमत में खिंचाई
 हर किसान हर खाद नहीं ले सकता खुलेआम
 लेने के लिए भी है नहीं उसके पास पुरे दाम
   है प्यारा सा एक नाम ' गरीब किसान '
 धरती माता का ओ बेटा 
जो सींचता है खून पसीने से जमीं को  
 धुप और बारिस जो सहता है जिंदगी भर 
 देखो उसे भी नहीं मिलता है पेट भर
 सस्ते दामों पर ख़रीदे जाते हैं उसके अन्न
   जिसके कारण है उसका वस्त्र विहीन तन
जाकर मिलो उससे  कितना साफ है उसका मन 
उसे ही चुरा कर बना रहे हैं कितने काला धन 
इसे ही देख कर रो रहा है मेरा मन 
सोंचो तो क्या होगा अंजामे वतन ?
जिस देश का अन्नदाता ही होगा भूखा नंगा 
चरों तरफ हो भ्रस्टाचारी - कालाबाजारी का धंधा 
होगी भला क्यों नहीं उस देश में विकलता 
उरेंगे चारों तरफ गीध बनेगी श्मशान ये गंगा 
जब तक न भरेगा पेट उनका  
  होगी न जब तक खाद , बीज और सिंचाई की व्यवस्था 
सुधरेगी न कभी हमारी ये अर्थव्यवस्था 
गाँवों का ये देश तब - तक न होगा खुशहाल
जब तक हैं हमारे किसान फटेहाल 
समझो -  समझो मेरे दोस्तों 
ये बात है समझने की न नारों की न शोर - शराबों की 
    करनी होगी हमें सस्ते बीज , खाद और सिंचाई की व्यवस्था 
होगी हमारी मिलेगी तभी हमें 
हमारी सबसे बड़ी सफलता 
इसी में है निहित सबों की कुशलता 
  छेर दो जिहाद खाओ कसम 
हमारा होगा यही सबसे पहला कदम 
सबों की हो ये ही पुकार 
   पहले किसान -  पहले किसान 
तभी हो पायेगा देश का उत्थान ।

सुधीर कुमार ' सवेरा '           २८-०२-१९८०   

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

13. तुम हो स्वछन्द


13-

तुम हो स्वछन्द 
करते हो मंद - मंद विचरण 
पर मैं कर्तव्यों की जंजीर से बंधा 
क्या कर पाऊंगा तेरा ही आचरण ?
नीले -  नीलगगन 
तेरे ही हैं घर आँगन 
पर मैं संकीर्णता से घिरा 
क्या कर पाऊंगा मंगल गायन ?
      सारे उपवन और चमन 
तेरे ही हैं कुल भवन 
क्या तुझे भी है कोई बन्दिस ?
या कोई नियम की बाध्यता ?
  धन्य हैं तेरे भाग्य 
करते हो उन्मुक्त विहार 
पर मैं तुझ से जलता नहीं 
तुम ही तो हो मेरे मीत
पहुँचती है मिलती है 
जिस से प्रीति संदेस  ।


सुधीर कुमार ' सवेरा '          १६-०२-१९८०