रविवार, 23 जून 2013

260 . काल का


२ ६ ० .

काल का 
अबाध चक्र 
और 
परिस्थितियों का दास 
मनुष्य 
हाँक दिया गया है 
इंसानियत का 
पटाक्षेप हो गया है 
नेपथ्य से 
आवाजें 
गूंगी हो गयी है 
मानवता का 
पगडण्डी 
संवेदनशील मोडों से 
तलवार की 
नंगी धार 
कलेजे पे सजायी हुई थी 
धार 
जिसपे रक्त मेरे जमे थे 
और ऑंखें मुंद चुकी थी 
शायद अमावश्या की रात थी 
हाथों को हाथ नहीं सूझता था 
शीश कहाँ नवाता ?
मंदिर नहीं दिखता था 
संज्ञा शून्य हो 
क्षितिज के उस पार 
विचर रहा था मैं 
मृत्यु के नभ में !

सुधीर कुमार ' सवेरा '    १ ९ - ० ४ - १ ९ ८ ४ 
३ - ५ ० pm 

259 .ज्वार भाटा


२ ५ ९ .

ज्वार भाटा 
और समुद्र का किनारा 
तनहा परछाई 
अव्यक्त हाव भाव 
निरीह आराधना 
श्रवण शक्ति के लिए 
कमजोड पड़ गयी 
समुद्र की भीषण गर्जना 
निर्विकार सउद्देश्य 
खड़ा मूर्तिमान 
खंठ से मेरे 
अज्ञानवश 
एक प्रश्न उभरा 
मित्रवर्य ! क्या कुछ खो गया ?
जवाब में 
एक निश्छल निराकार मुस्कराहट 
और दृष्टिबोध से दूर 
सामने 
समुद्र की शून्य ओर 
उठती हुई 
उसकी ऊँगली के 
इंगित स्थान !

सुधीर कुमार ' सवेरा '   १ ९ - ० ४ - १ ९ ८ ४ 
३ - १ २ pm 

258 . अकुलाहट भरी फुसफुसाहट


२ ५ ८ .

अकुलाहट भरी फुसफुसाहट 
शायद तूफान के आने का इशारा 
आवाज के रेगिस्तान में 
प्यासे भटकते श्रोता 
जाम पीते वक्ता 
मन का मीत 
अन्दर की चीख 
विपन्न गायक 
घुटता रहा 
निगल गया 
शायद उसको 
मानवता का गीत 
दीवार खड़ी थी 
सड़ी समाज की भीत 
भाग नहीं पाया 
धूम्र का गोल - गोल वलय बन 
शायद खो गया 
अभोग से ऊबकर 
शायद गुम हो गया 
कहने वाले के लिए 
फिर भी कुछ रह गया 
छिद्रयुक्त समाज की भीति 
हिली 
चरमराई 
और ढह गयी 
किसी बिना कानो वाले नगर में 
आवाजों की चीख भर रह गयी !

सुधीर कुमार ' सवेरा '  १ ९ - ० ४ - १ ९ ८ ४ 
२ - ५ ० pm 

रविवार, 9 जून 2013

257 . अर्ध खिली चाँदनी


२ ५ ७ .

अर्ध खिली चाँदनी 
अगम्य अपार 
बोध गम्य 
इन्द्रियों के उस पार 
व्याधि रहित सार गम्य 
चाँद के उस पार 
खुला - खुला 
गोरा आसमान 
दूर से गूंज आयी 
स्वरों की मधुर लहरी 
शायद झील के उस पार 
तर्क हीन 
वृथा का दम्भ 
सारगर्भित मन का
आकुल आनन् 
और सभी 
दरवाजे बंद 
अन्जान सुनसान 
रिक्त राहें 
चाँद कब खिला 
पता नहीं 
शायद दिवास्वप्न था 
इक्षायें ही तो नहीं मरती 
जाग कभी पाते नहीं 
रह जाती है वही पूर्व स्थिति !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १ ९ - ० ४ - १ ९ ८ ४ 
२ - ३ ८ pm   

मंगलवार, 28 मई 2013

256 . मोडदार कोमल पगडण्डीयां


२ ५ ६ .

मोडदार कोमल पगडण्डीयां
सुराहीदार घुमड़दाड़ सीढियाँ 
खांचेदार 
खजुराहो की 
विभिन्न मुद्रा 
तप्त - तप्त आँखें और और अदायें 
लाल दल पत्र खिले 
मंद - मंद विहंस रहे 
हाथ बांध हैं खड़े 
सबकुछ होकर भी पास - पास 
सदियों से अंक में भरे हैं 
अनबुझी अतृप्त प्यास !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १ ९ - ० ४ - १ ९ ८ ४ 
२ - ३ ० pm 

255 .सघन चमन



 २५५ .

सघन चमन 
मधुर - मधुर पवन 
मंद - मंद लय से 
मृद -मृद थिरकन 
छायी हुई है हर ओर 
क्या वन क्या उपवन 
क्या अर्वाचीन क्या प्राचीन 
रूप , रस , गंध के उस पार 
अर्थहीन रागहीन हतभाग
अमरता को प्राप्त करता 
कह कहों से भरा हर मुग्ध क्षण !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १ ९ - ४ - १ ९ ८ ४ 
२ - २ ० pm  

सोमवार, 27 मई 2013

254 . एहसास मुझे हर सही गलत का होता है



२ ५ ४ .

एहसास मुझे हर सही गलत का होता है 
ऐसा लगता है 
एक अनाम अपराध का झूठा कलंक मेरे माथे लगा है 
मेरे प्रारब्ध ने 
मेरे ही खिलाफ 
गलत सूचनाएं सब को दे दी है 
लोग सभी 
ढूंढ़ रहे हैं 
अपना भी चेहरा खरोंच कर 
मेरे लिए गलत सूचनाओं का ढेर लगा रहे हैं !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' १ ६ - ० ४ - १ ९ ८ ४