३३०
बंद जिसके अक्ल के दरवाजे
अर्थों के जो भेद न जाने
अकड़ा बैठा कुर्सी पे बड़े
कहीं आज प्रकाशक हैं कहलाते
नैनों को आच्छादित किये
अक्षरों के विशालन के लिए
फिर भी वो
सूक्ष्मत्तर भेद को न जान पाये
गर्दन में लगे
फांसी के गांठ को
उठकर लूज करते हुए
पटक रचनाओं को
औरों के सिर पर
कहते हैं क्या बकवास लिखा है
प्रेषक के डिग्री पढ़
रचनाओं को समझता
सारगर्वित शब्दों को
बकवास समझता
छेड़खानी को बलात्कार कहता
मारपीट को जातीय दंगा कहता
खुद हुस्न और दौलत की
आग में जलता रहता
निर्दोष कलमों की
भाषा न समझ पाता
समाज देश , व्यक्ति के
जीवन का अर्थ न समझता
निर्दोष व्याधि रही रचनाओं में
आज का प्रकाशक
शब्दों का अर्थ हाथों से टटोलता !
सुधीर कुमार ' सवेरा '
३२९
चंद गोल चिपटे
खरे आरे तिरछे
अभिव्यक्ति की रेखा चित्रें
अव्यवस्थित उटपटांग
फैले बेतरतीब जाले
भय , हास्य , करुण , त्रास
चारों ओर के विम्बित छाये
भीतर गहरे पैठ कर
दूर - दूर अँधेरे में जाकर
लाते जो ढँक - ढँक
फैलाते अपनों जख्मो से
सुरभित सौम्य सुगंध
जख्मो को खरीद - खरीद
लहुओं को बेच - बेच
दिल को कुरेद - कुरेद
अपने को बार - बार छल
देता जो अर्थ अनेक
समझा जीवन के अर्थ अनेक
सांसे जिसकी घुटती रहती
पल - पल जी - जी कर
जो मौत खरीदता
खुद को मिटाकर भी
औरों के हेतु प्रकाश फैलाता
उनके ही दीप्त आभा को
अँधेरी कविता कहा जाता !
सुधीर कुमार ' सवेरा ' २४ - ०४ - १९८४
कोलकाता ५ - ४७ pm
३२८
वो कैसी एक आग थी
जो हमको जला गयी
खुद तो चुप ही रहे
हमको रुला दिया
हंसने की हर चाह ने
ओठों को जला दिया
अच्छी तरह हम जले भी न थे
तुमने बुझा दिया
हवाएँ बनी फर्जमंद मेरी
तूने धुँआ उठा दिया
हमने किसी की याद में
देखो जीवन जला दिया
छुए भी न थे नगमो को तेरे
अभी कानो ने मेरे
तूने नगमा ही भुला दिया
आ s s s लग जा गले
रात कहीं यूँ ही न ढले
आ ये हैं बाँहों के घेरे
लग जा सीने से मेरे
आ मैं कर दूँ बंद आँखों से आँखे
आ मैं ढक दूँ ओठों से ओठ
हो जाओ बस चुप ही चुप
कहने दो बस धड़कनो को तुम
खो के भी तुम खो न पाओ
दूर कभी भी मुझ से न जाओ
मैं बस यूँ ही जलता रहूँ सदा
बस तुम करो एक यही दुआ !
सुधीर कुमार ' सवेरा '
३२७
लंबे - लंबे ये कदम
रखो जरा संभाल के
खो न जाये कहीं तेरा वजूद
हर पग उठाओ संभाल के
अतीत में ढूंढे कहीं
जो न मिलो कभी
बनाओ वो तारीख जरा
खुद अपने ख्याल से
हर लम्हा शुष्क हो रहा
यूँ बैठो न उदास से
फूंको ऐसी जान की
जर्रा - जर्रा हिल जाये तूफान से
सोयी तेरी वफ़ा की आग
सुला दे न मुझको जगा के
कतरा - कतरा - कतरा - कतरा
है तुम्हारे लिए
रखना इसे संभाल के
हर दर्द है सीने में छुपा
दस्तक न देना कभी प्यार से
हम तो जल मरे हैं
तेरी ही बेवफाई के आग से
हमको न जिलाना फिर कभी
अपने वफ़ा के याद से
दफ़न ही हो जाने दो मुझे
निकालो न मुझे
अपने यादों के कब्र से
कभी भूलेंगे न तुझको हम
कभी जिएंगे वफ़ा की याद में
कभी जल मरेंगे
बेवफाई की आग में !
सुधीर कुमार ' सवेरा ' कोलकाता
३२६
बित्तेभर की घास घनेरे
लम्बे - लम्बे पेड़ बहुतेरे
क्या सिख क्या पठान
क्या हिन्दू क्या मुसलमान
हुस्न की आग सबको जलाती
दौलत की प्यास सबको भरकाती
कोई बैठा है लेकर पेड़ की छाँव
कोई बैठा लिए कहीं कोने में ठाँव
हर को एक ही दर्द है
हर को एक ही जलन है
कैसी ये सबको
जवानी की आग लगी है
बुझाए भी बुझती नहीं है
जिसे कोई नहीं मिला
वो सिर्फ देखा किया
सामने शांत तरंग रहित तालाब
चारों ओर बेंच पर बैठे
जल रहे हैं एक साथ दो अलाव
देखने वालों के दिल में हलचल
तालाब है बिलकुल शांत
तालाब को ये चाह नहीं
किनारा उससे पूरा सटा रहे
पर तपते दो जिस्म
चाहते नहीं बीच में कोई अलगाव
नादान उम्र की ये नादानियां
समझते हैं ये जिसे समझदारी
मालूम नहीं इन्हे ये है कितनी बड़ी बेबकूफियां
फतिंगे की ये मजबूरियां भला किसको है पता
शमा से उसको प्यार है
बस यही उसकी खता है !
सुधीर कुमार ' सवेरा ' कोलकाता ५ - ३० pm 1984
३२५
जवानो के जवानी का जवाब नहीं
क्या - क्या पीते हैं इसका हिसाब नहीं
जहर भी है और जाम भी है
पीने को सुबह और शाम भी है
दिन दुपहरिया रात भी है
पी - पी कर मद के प्याले मदहोश हैं
ख़रीदे हुए गम से गमगीन होकर
अब कहते हैं गम गलत करते हैं
दौलत और जवानी
एक आग एक नादानी
हुस्न और जाम
एक तलवार दूजा धार
एक जहर एक साँप
सुबह और शाम
जाम ही जाम
क्यों नहीं लेते सभी
राम का नाम
ये है विक्टोरिया मेमोरियल हाउस
जहाँ बुझती नहीं कभी भी किसी की प्यास
एक को दौलत की चाह
दूसरे की बुझी जवानी की प्यास
नाम ही नाम
हर घड़ी हर साँस
लेते हैं सभी बस
दौलत और हुस्न का जाम
जो नहीं ले पाते हैं
घुट - घुट कर मर जाते हैं
राम राम राम !
सुधीर कुमार ' सवेरा ' २९ - ०४ - १९८४ कोलकाता
४ - ४० pm
३२४
पाँव तेरे पंक में
मुख पे म्लान है
तुम दोस्त नहीं
जो नसीहत दे सकता
तुम अनुज नहीं
जो आज्ञा दे सकता
कुछ ऊपर हो इससे
दिल तेरा जलता है
फफोले मेरे फूटते हैं
अरमान तेरे उजड़ते हैं
आशियाँ मेरे वीरान होते हैं
ओठों से तेरे मुस्कान छीन गयी
उदास हैं नजरे मेरी
जिंदगी तूने जीना न जाना
खुद पे जो हँसना न आया
मैं भी गुजरा हूँ
किसी अँधेरे दल - दल से
क्या हुआ जो कोई अपना न हुआ
पराये इस संसार में
जब लहू भी अपना न हुआ
सोंच कर वृथा में
जान क्यों अपना दें
सूर्य ने कब अँधेरा किया
चाँद ने कब सुबह दिया
जिंदगी भी अपनी मांगी न थी
दिल में कोई हसरत न थी
सुबह हो शाम हो
जिंदगी यूँ ही तमाम हो !
सुधीर कुमार ' सवेरा ' २० - ०४ - १९८४
कोलकाता ११ - १० am