४७१
एक दो तीन
हो रहा क्षीण
पर रहा बीन
ऐसे मधुर क्षण
मृत्युपरांत भी जो
बने रहेंगे अमृत कण !
सुधीर कुमार ' सवेरा '
४७०
भर कर मन में मैल खुद
ढूंढते हो सच्चे संत इधर - उधर
कहते हो मिलते अब वो किधर
अपना अहंकार तुम छोड़ नहीं पाते
बांध कर मुष्टि में अहंकार तुम
भटकोगे अगर तुम जीवन भर भी
हाथ अपने मगर कुछ न पावोगे !
सुधीर कुमार ' सवेरा '
४६९
है हम पे उपकार उसका
जो हमारा अपकार निंदा करता
भोग तो है मेरे भाग्य का
अहसान उसका मेरा अशुभ बाँटता !
सुधीर कुमार ' सवेरा '
४६८
महत्व नहीं इसका
अब तक क्या किया
योजनाएं हैं क्या ?
व्यर्थ बकवाद भरा
महत्व इसमें है
मैं कर रहा क्या
सावधानी उत्कंठा
है कितना भरा हुआ !
सुधीर कुमार ' सवेरा '
४६७
परमाणु के केंद्र में
विश्व विखण्डनी महाशक्ति
जल बिंदु में है
महती शीतलता भरती
जानते नहीं खुद को जब तक
क्षुद्र हैं , मानते क्षुद्र जब तक
जानने का नाम है
हम चैतन्य अनंत तक !
सुधीर कुमार ' सवेरा '
४६६
प्रशंसनीय तुम कर्म करो
मत चाहो पाना प्रशंसा
अन्यथा मन में उपजेगी
औरों के प्रति हिंसा
क्या यह देगा तुझको शोभा ?
क्यों उपजाते मन में अहंकार का पौधा !
सुधीर कुमार ' सवेरा '
४६५
मिलते जब लोगों से
तो रखो इतना ध्यान
या गुण गाओ संत का
या ईश्वर का गुणगान
पर की निंदा भारी पाप
मत भरो मन में
औरों की विष्ठा आप !
सुधीर कुमार ' सवेरा '