बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

688 . भगवति भवभय दुःख निकन्दिनि अपरूप थिक तोर माया।


                                     ६८८
भगवति भवभय दुःख निकन्दिनि अपरूप थिक तोर माया।
सभ जग मय तन नित्य सनातनि करिय अहोनिशि दाया।। 
अनुछन निजपद भक्ति अचल दय दाहिनि रहु जगदम्बे। 
हरिय दुसह दुख रोग शोक जत शत्रु संहारिय अम्बे।।
विधि हरिहर सहसानन आदिक वेद भेद नहि जाने। 
एको नखक अग्रभरि महिमा के करि सकल बखाने।।
जगतजननि तोहे कृपायुक्त भय नित्य करिअ कल्याने। 
आदिनाथ के सतत दोष छमि दय फल चारि सुदाने।।  

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

687 . भगवति भवभय हारिणि तारिणि कारिणि सकल जहाने।


                                      ६८७
भगवति भवभय हारिणि तारिणि कारिणि सकल जहाने।
विधि हरि हर तुअ पदयुग सेवक वेद भेद नहि जाने।।
नाना तन धय जगत वेआपित निज इच्छा थिक रुपे। 
मायामय सभ घट घट वासिनि नित्य अनित्य सरूपे।।
जगजननि जगबाहरि हम नहि करिय सतत प्रतिपाले। 
मन अभिलषित पुरित करू निशिदिन हरिय विपति सभकाले। 
आदिनाथ के पुरिय मनोरथ दिअ निज भक्ति सुदाने।।  

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

686 . भगवति तुअ पद युगल सरोरुह अमल सुधारस जानी।


                                      ६८६ 
भगवति तुअ पद युगल सरोरुह अमल सुधारस जानी। 
भ्रमर हमर मन वसत निरन्तर जरा मृत्यु भय मानी।।
तुअ शरणागत बचत काल सँ रोग शोक नहि व्यापे। 
माया मोह जल सभ काटत यम पुनि थर थर कापे।।
जे जन सुमिरत जपत नाम तुअ से जन शिव समतूले। 
मन अभिलाष पुरत तसु अनुछन विधि लिपि मेटल मूले।।
ऋण के नाशिनि नाशि शत्रुकेँ छमिय हमर अपराधे। 
आदिनाथ के पुरित करिय नित सकल मनोरथ साधे।।

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

685 . आदि सनातनि नित्य जगतमय निर्गुण सगुण सनेह।


                                      ६८५
आदि सनातनि नित्य जगतमय निर्गुण सगुण सनेह। 
तीनि शक्ति त्रिगुणा तन भगवति नारि पुरुषमय देहे।।
विधि हरिहर अरु शेष ने जानत ततमत कय रहु वेदे। 
एहि सँ आन जानत के महिमा जे नहि जानत भेदे।।
तोहरहि सओ सभ जग थिक रचना तन्त्र मन्त्र श्रुति सारे।  
चारु आश्रम कर्म चारि पुनि इत्यादिक संसारे।।
कर्म क्रिया कर्ता तोहे ईश्वरि मायामय अनुमाने। 
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय सतत करिय कल्याने।।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

684 . शीतला -- रासभवाहिनि शीतल देवि। थिकिह दिगम्बरि सभ जग सेवि।।


                                    ६८४
                                शीतला 
रासभवाहिनि शीतल देवि। थिकिह दिगम्बरि सभ जग सेवि।।
मार्जनि कलस दुअओ करलाय मस्तक ऊपर सूप देखाय।।
पापरोगनाशिनि जग माय। सुमिरत भगत सकल सुख पाय।।
दाह पीड़ित कय शीतल भाष। छूटत रोग पुरत अभिलाष।।
पाप रोगक नहि आन उपाय। एक तुअ पदयुग विपति न खय।।
उदक मध्य पूजत धरी ध्यान। तेकरा घर नहि रोग पयान।।
आधि व्याधि ग्रह दोष नसाय। निज सेवक पर सतत सहाय।।
आदिनाथ के दिअ वरदान। पुरु अभिलाष करिअ कल्याण।।

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

683 . दक्षिण काली ------ भगवति जगभरि जोति प्रकाशित दक्षिणकाली नामे।


                                    ६८३
                              दक्षिण काली
भगवति जगभरि जोति प्रकाशित दक्षिणकाली नामे। 
नवयौवन तन सजल जलद रूचि कुच उन्नत अभिरामे।। 
शिशु शशिभालहिं बदन भयानक विकट दसन फुंज केशा। 
लहलह रसन सोनितसँ भीजल असित श्रवित सृकदेशा।।
शव दुइ कुण्डल कान नयन त्रय भीम भयानक रावे। 
सघन पाँति कय शवकर गाँथल कटि पहिरन रूचि पावे।।
खर्ग मुण्ड दुई वाम भुजामह दहिन अभय वर दाने। 
चारि भुजा उर मुण्डमाल लस वस नख निसि वसु जाने।।
शिव शव ऊपर तुअ पदयुग लस वास रुचय समसाने। 
सिवा चतुर्दिश योगिनिगण  युत आनन्दित करू गाने।।
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय सतत करिय कल्याणे। 
सुत सम्पति सुख मंगल मुद नित दाहिनि रहु दय दाने।।

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

682 . भैरवी -------- अयुत दिवाकर उदित देहधुति रक्त पटम्बर शोभे।


                                        ६८२
                                       भैरवी
अयुत दिवाकर उदित देहधुति रक्त पटम्बर शोभे। 
रुधिर लेपितमय पीन उरजमुख लोहित कमल समाने।।
रत्नमुकुट शशधर सिर शोभित ह्रास ललित मृदुमाने। 
पुस्तक अभय वाम दुअओ कर अक्षमाल वरदाने।।
दक्षिण युगल चारि कर राजित निज जन पालित माने। 
शत्रु संहारिणि भैरवी भगवति विधि हरिहर धर ध्याने।।
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय सतत करिय कल्याणे।।