बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

386 .कितने सपने थे

३८६ 
कितने सपने थे 
अभी सजाये भी न थे पुरे 
कितने उत्साह थे 
मन में समाये भी न थे पुरे 
हर्षित मन हर्षित तन ने 
उल्लास जगाये भी न थे पुरे !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' 

385 . उड़ालो मौज फरेबी के

३८५ 
उड़ालो मौज फरेबी के 
खेलो रंग ठगी के 
जिंदगी घिसट रही है 
कर लो संतोष कुछ और ले के 
जिंदगी के किसी मोड़ पे 
जो होगी उनसे मुलाकात कभी 
पूछेंगे हम उनसे 
क्या थी आखिर खता मेरी !

सुधीर कुमार ' सवेरा '

384 .लिखने वाले हैं ऐसे - ऐसे भी

३८४ 
लिखने वाले हैं ऐसे - ऐसे भी 
लिख देंगे जैसे तैसे भी 
पड़ जायेगा फीका महाकाव्य भी 
फूल खिल के मुरझा जाते हैं 
परवाने शमा से टकरा जाते हैं 
लोग तो मुस्कुरा के हंसा करते हैं 
आप मुस्कुरा के शरमा जाते हैं !

सुधीर कुमार ' सवेरा '

383 . इस कदर जहाँ में बिखर गए

३८३ 
इस कदर जहाँ में बिखर गए 
अपनी हस्ती ही भूल गए 
धोखा देना नहीं जन्म से सीखा प्राणी 
तुमको विश्वसनीय नहीं है उसकी वाणी 
और शास्त्र की तरह सीखते जो ठगना 
वे तुम जैसे धर्म मूर्त्ति बनते हैं सज्जन ज्ञानी  !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

382 . ओ माँ

३८२ 
ओ माँ 
करुणामयी 
कल्याणमयी माँ 
तेरे कृपा बिना 
सुख है कहाँ 
ओ माँ 
बुद्धिहीन 
क्षुद्र कर्महीन 
उच्चाकांक्षाओं से 
भाग्य कहाँ ?
ओ माँ 
दो भक्ति 
भरो शक्ति 
नैया लगाकर पार 
दे दो मुक्ति 
हो जीवन सफल यहाँ 
ओ माँ 
शरणागत हूँ 
दे दो चरण धूल 
हो न फिर 
कोई भूल 
पाकर तेरा सहारा 
फिरूंगा न मारा - मारा 
पाउँगा अनंत विश्राम !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' 

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

381 . अब उठ

३८१ 
अब उठ 
चल बढ़
रुक मत 
चल झट पट 
डगर - डगर पर कहर 
पर चल बढ़ सरपट 
सबर - सबर कर 
पर रुक मत बढ़ चल 
पथ - पथ पर कंटक 
जब - जब यह संकट
वह भगवन जब अग्रज 
बढ़ चल करके रब का स्मरण 
तेरे दर पे क्या गए हम 
हर तरफ से दर बदर हो गए हम !

सुधीर कुमार ' सवेरा '   

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

380 .हर पल हर पग हर डगर है थका हुआ

३८० 
हर पल हर पग हर डगर है थका हुआ 
सुबह में ही हो गयी शाम तो क्या हुआ 
हर प्रयत्न चतुराई का 
जीवन चलता रहा अविराम 
हर पल हूँ हारा 
हर प्रयत्न हुए नाकाम 
जितनी आकुलता जितनी शीघ्रता थी 
पाने को अपनी मंजिल 
कहा उतना ही औरों ने हर पल मुझको काहिल
देख ' सवेरा ' खो न जाना 
बाधाओं से डोल न जाना 
नियति के हाथों में पड़कर भी 
अपने पराये को भूल न जाना 
कर्तव्यों की चाह में चाहा अपनों को गले लगाना 
हर ने वफ़ा के साये में जफ़ा कर चाहा परे भगाना 
काँटे हैं उग आये 
अपनों में अपनापन खोजा तो 
दोस्त भी दुश्मन निकल आये 
तुम्ही कहो करें क्या किसपे हो विश्वास भला 
जब सब ने मिल हो किया विश्वासघात 
तो दिल क्यों न जले भला !

सुधीर कुमार ' सवेरा ' २३ - ११ - १९८७ 
१२ - ४० pm