शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

684 . शीतला -- रासभवाहिनि शीतल देवि। थिकिह दिगम्बरि सभ जग सेवि।।


                                    ६८४
                                शीतला 
रासभवाहिनि शीतल देवि। थिकिह दिगम्बरि सभ जग सेवि।।
मार्जनि कलस दुअओ करलाय मस्तक ऊपर सूप देखाय।।
पापरोगनाशिनि जग माय। सुमिरत भगत सकल सुख पाय।।
दाह पीड़ित कय शीतल भाष। छूटत रोग पुरत अभिलाष।।
पाप रोगक नहि आन उपाय। एक तुअ पदयुग विपति न खय।
उदक मध्य पूजत धरी ध्यान। तेकरा घर नहि रोग पयान।।
आधि व्याधि ग्रह दोष नसाय। निज सेवक पर सतत सहाय।।
आदिनाथ के दिअ वरदान। पुरु अभिलाष करिअ कल्याण।।

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

683 . दक्षिण काली ------ भगवति जगभरि जोति प्रकाशित दक्षिणकाली नामे।


                                    ६८३
                              दक्षिण काली
भगवति जगभरि जोति प्रकाशित दक्षिणकाली नामे। 
नवयौवन तन सजल जलद रूचि कुच उन्नत अभिरामे।। 
शिशु शशिभालहिं बदन भयानक विकट दसन फुंज केशा। 
लहलह रसन सोनितसँ भीजल असित श्रवित सृकदेशा।।
शव दुइ कुण्डल कान नयन त्रय भीम भयानक रावे। 
सघन पाँति कय शवकर गाँथल कटि पहिरन रूचि पावे।।
खर्ग मुण्ड दुई वाम भुजामह दहिन अभय वर दाने। 
चारि भुजा उर मुण्डमाल लस वस नख निसि वसु जाने।।
शिव शव ऊपर तुअ पदयुग लस वास रुचय समसाने। 
सिवा चतुर्दिश योगिनिगण  युत आनन्दित करू गाने।।
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय सतत करिय कल्याणे। 
सुत सम्पति सुख मंगल मुद नित दाहिनि रहु दय दाने।।

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

682 . भैरवी -------- अयुत दिवाकर उदित देहधुति रक्त पटम्बर शोभे।


                                        ६८२
                                       भैरवी
अयुत दिवाकर उदित देहधुति रक्त पटम्बर शोभे। 
रुधिर लेपितमय पीन उरजमुख लोहित कमल समाने।।
रत्नमुकुट शशधर सिर शोभित ह्रास ललित मृदुमाने। 
पुस्तक अभय वाम दुअओ कर अक्षमाल वरदाने।।
दक्षिण युगल चारि कर राजित निज जन पालित माने। 
शत्रु संहारिणि भैरवी भगवति विधि हरिहर धर ध्याने।।
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय सतत करिय कल्याणे।।  

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

681 . भुवनेश्वरि ------ भगवति जय भुवनेशि ललित छवि वसन भूषण युत देहा।


                                    ६८१
                                भुवनेश्वरि
भगवति जय भुवनेशि ललित छवि वसन भूषण युत देहा।   
अतिशय असित चिकुर अतिचिक्कन ता बिच सिन्दूर रेहा।।
बाल दिवाकर बिम्ब अरुन्धुति लोचन तीनि विशाले।।
त्रिभुवन सुषमा उपमालज्जित मधुर हास अति शोभे। 
मणिमय खचित कीरीट बलित शिर उपमा त्रिभुवन लोभे।।
वाम उभयकर शुभग अभयवर दक्षिण अङ्गस पाशे। 
भूपुर बीच भुवन दल षोडस नसु दल कमल सुभासे।।
ता बिच अङ्गकोण मधि पदयुग सुखद ध्यान भय नासे। 
के बरनत तुअ चरण के महिमा आगम निगम संत्रासे।।
विधि आदिक सुरमुनि तुअ सेवक वरदायिनि जगदम्बे। 
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय निज पद दय अवलम्बे।।

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

680 . भगवति रूचि तुअ कामचार नित जगतजोति जगमाया।


                                       ६८०
भगवति रूचि तुअ कामचार नित जगतजोति जगमाया।  
सकल असंभव तुअ बस संभव करिय अहोनिसि दाया।।
रविमण्डल बिच कालकोश पर त्रिकोण रेख अति राजे। 
ता बिच रति मनसिज रतिविपरित करत सुख साजे।।
ता ऊपर पदयुगल कमल लस उदित भानु दुति शोभे। 
उरज विशाल माल रिपु शिर युत फणि उपवीत सुशोभे।।
खरग दहिनकर वाम अपन सिर अति विकराल विराजे। 
फूजल चिकुर दशन कटकट कर लहलह रसन सुधाजे।।
निजगण रुधिर धार बह ऊपर तीनि बलित अति धीरे। 
दुइ दिश योगिनि दुइ दुइ पीवति एक बपन मुख गीरे।।
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय सतत करिय कल्याने। 
सुत सम्पति सुख मङ्गल मुद नित चारु फल कम दाने।।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

679 . छिन्नमस्ता -- नाभिकमल बिच बीच अरुणरुचि राजित दिनमणि बिम्बे।


                                  ६७९ 
                           छिन्नमस्ता 
नाभिकमल बिच बीच अरुणरुचि राजित दिनमणि बिम्बे। 
ता पर योनि चक्र पर रतियुत मन्मथ कर अवलम्बे।।
रति विपरीत ऊपर तुअ पदयुग कोटि तरुण रवि भासे। 
काटल सिर कर वाम प्रकाशित दक्षिण काति प्रकाशे।।
दिग अम्बर कच फूजल निज शिर काटल शोणित पीबे। 
बाल दिवाकर रुचिर कान्ति लस लोचन तीनि सुभावे।।
तीनिधार वह रक्त उरध भय मध्यधार निज मूखे। 
दुइ दिस योगिनि पिबत धार दुइ अति आनन्दित भूखे।।
तडितलोल युगलोचन रसना कटकट दसन सहासे। 
विषधर माल शत्रु शिर मालिनि सुरपालिनि द्विष नासे।।
विधि आदिक सुर तुअ पद सेवक प्रचण्ड चण्डिका देवी। 
अचिन्त्यरूप तुअ जगत जोतिमय योगीन्द्रादिक सेवी।।
उत्पत्ति स्थिति सहति कारिणि तीनि रूप गुण माया। 
तीनिलोक मह सभ घट वासिनि करिय अहोनिसि दाया।।
जगतजननि तोहे जगत वेआपित नारि पुरुषमय आनी। 
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय दाहिनि रहिय भवानी।।  

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

678 . मातङ्गिनी -- कीरक समरूचि ललित श्याम तनु मणिमय भूषण देहा।


                                     ६७८
                               मातङ्गिनी  
कीरक समरूचि ललित श्याम तनु मणिमय भूषण देहा।मणि मुक्तादिक हार सुलक्षाणि भाल बाल शशि रेहा।।
मधुरहास मुखमण्डल मण्डित लोचन तीनि सुभासे। 
विधि आदिक सुर चरण सुसेवित पहिरन शुचि पटवासे।। 
रत्नसिंहासन पर तुअ पदयुग षोडस वयस विराजे। 
असि अङ्गकुस लस दहिन हाथ युग पाश खेट दुइ वामे।।
अष्ट सिद्धिमय हरिहर सेवत मातङ्गिनि तुअ नामे।।
सुरनर मुनि जग ध्यान धरत नित आगम निगम बखाने। 
भुक्ति सुख आदिक पावत सतत लहत कल्याने।।
आदिनाथ पर कृपायुक्त भय दाहिनि रहु जगमाया। 
चारि पदारथ सुत धन मंगल दय करि करू नित दाया।।