मंगलवार, 25 जुलाई 2017

763 . " धर्माचार्य तांत्रिक ज्योतिषी पंडित श्री श्री १००८ मुनीश्वर झा का जीवन वृतांत। "

माता भुवनेश्वरी 

पण्डित मुनीश्वर झा 


पण्डित मुनीश्वर झा 


पण्डित ज्योतिषाचार्य पीताम्बर झा 

पण्डित ज्योतिषाचार्य पीताम्बर झा 

पण्डित राज कुमार झा 

पण्डित राज कुमार झा 
" धर्माचार्य तांत्रिक ज्योतिषी पंडित श्री श्री १००८ मुनीश्वर झा का जीवन वृतांत। "                               
राजा जनक माँ सीता या यञवल्क्य की भूमि मिथिला का स्थान भारत वर्ष के अंदर सबसे ऊपर है, एवं इसका गौरव पूर्ण इतिहास इसका  महिमा मंडित करता है। शाक्त की पूजा एवं तंत्र साधना में , इस क्षेत्र  का अपना स्थान रहा है। इसी मिथिला क्षेत्र में मधुबनी शहर से करीब तीन किलोमीटर उत्तर पूरब में मंगलवाणी वर्तमान में मंगरौनी ग्राम में अवस्थित है।  इस मंगरौनी का अतीत काफी गौरव पूर्ण है। इसी गांव में पंडित मदन उपाध्याय ने अपनी तपस्या के बल से इस गांव का नाम उज्जवल किया। इसी गांव में १० जून सन १८९७ ई० तदनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी वृहस्पतिवार गंगादशहरा के दिन परमात्मा की असीम अनुकम्पा से एक सात्विक मैथिल ब्राह्मण परिवार में पंडित श्री दरबारी झा माता श्रीमती सरस्वती देवी के घर एक बालक का जन्म हुआ। पिता ने बड़े प्यार से इस बालक का नाम मुनीश्वर झा रखा। चार साल के उम्र में ही सिर से पिता का साया उठ गया। घर की स्थिति बहुत दयनीय थी परन्तु माँ सरस्वती देवी तनिक भी विचलित हुए बिना इनकी शिक्षा को आगे बढ़ाये रखा। १९०५ ई में इनकी माता ने इनका यज्ञोपवीत संस्कार करवाया , इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के संस्कृत विद्वानों के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में हुआ। उस समय मंगरौनी गांव भी संस्कृत शिक्षा के केंद्रों में से एक था। तत्पश्चात पांच वर्षों तक मधुबनी के वेल्हार वासी पंडित गोकुलानंद झा के अधीन ज्योतिष , रमल शास्त्र का अध्ययन किया। 
                           इनकी रूचि आध्यात्म एवं पूजा पाठ की ओर स्वतः थी। अठारह वर्ष की आयु में माता की आज्ञा एवं इक्षानुसार बाबूबरही निवासी पण्डित श्री कान्त झा की कन्या के साथ विवाह हुआ।  पत्नी श्रीमती देवसुन्दरी देवी पूजा , धार्मिक अनुष्ठान , संध्यावंदन आदि में इनको भरपूर सहयोग किया करती थीं। वे साक्षात् देवी स्वरूपा थी जिनके सहयोग के बिना गुरूजी महाराज शायद अपने अनुष्ठान , पूजा कर्म एवं प्रसिद्धि में अधूरे रह जाते। फिर आगे के विद्या अध्यन जैसे ज्योतिष कर्म काण्ड एवं तंत्र के अध्यन हेतु घर से निकल पड़े। सर्वप्रथम गया पहुंचकर इन विषयों का अध्यन किया कुछ समय पश्चात पण्डित श्री कृष्णचन्द्र झा के अधीन कलकत्ता संस्कृत संघ एसोसिएसन विशुद्धानन्द विश्वविद्यालय में ज्योतिष विषय का १९९२ ई० में एवं लघु कौमुदी १९२३ ई० तक का पाठन किया जिसका मूल प्रमाणपत्र आज भी स्थान पर उपलब्ध है।  कोलकाता से पुनः वे सिन्ध हैदराबाद वर्तमान में पाकिस्तान पहुंचकर ज्योतिष विद्या में बहुत ही ख्याति एवं प्रसिद्धि प्राप्त किये। वहां बहुत से लोग स्वेक्षा से उनका शिष्य बनना स्वीकार्य किया। पुनः वहां से काठगोदाम हिमाचल प्रदेश एवं ज्वालामुखी एवं भारतवर्ष में अनेक सिद्ध पीठों का भ्रमण , पूजन एवं तंत्र साधना करते हुए बंगाल प्रान्त में सिद्ध स्थल तारापीठ पहुंचे। वहां वे पत्नी सहित शमसान साधना , लता साधना , एवं शव साधना जो तंत्र साधना की मुख्य विद्याएं हैं निर्विघ्न पूर्वक संपन्न किये। माँ कामाख्या जो तंत्र साधना की मुख्य विद्द्याएँ हैं निर्विघ्न पूर्वक संपन्न किये। माँ कामाख्या जो तंत्र साधना की सबसे ऊँची एवं लम्बी मंदिर है , के स्थान पर पहुंचकर वहां की सबसे ऊँची चोटी पर माता भुवनेश्वरी के मंदिर में दो वर्षों की अथक तपस्या से माँ भुवनेश्वरी से उनका साक्षात्कार हुआ। उन्होंने माँ से सिर्फ इतना ही माँगा की माँ आप मेरी जन्मभूमि मंगरौनी चले जहाँ मैं आपकी आराधना एवं जनकल्याण दोनों कर सकूंगा। माँ भुवनेश्वरी प्रसन्न होकर अपने इस पुत्र को अपनी स्वीकृति दी। फिर वे मंगरौनी , अपने जन्मस्थली आकर सबसे पहले माता भुवनेश्वरी की मिटटी की मूर्ति बनाकर पूजन अर्चन करने लगे। इसी बीच लाल बाबा नाम का एक मद्रासी साधक इनके संरक्षण में तंत्र साधना सीखने लगे। चार वर्षों की अथक परिश्रम से उन्हें इस विद्या में सिद्धि मिली। उन्हीं के आग्रह पर जयपुर से माता के संगमरमर की मूर्ति गुरूजी महाराज ने मंगवाने का आदेश दिया। इसी बीच १९३४ ई० में भूकम्प से त्रस्त लोगों ने अपनी रक्षार्थ गुरूजी से विनती की। गुरूजी ने कहा कि विष्णु यज्ञ विधि पूर्वक करने से इस समस्या का समाधान हो जाएगा , यज्ञ का आयोजन मंगरौनी नवरत्न में किया गया।  इस यज्ञ के मुख्य आचार्य पंडित मुनीश्वर झा बनाये गये। पुनः अपने कुटी पर रहकर चौबीस लाख गायत्री महामंत्र का शास्त्र एवं विधि विधान के अनुसार अनुष्ठान को करने में बहुत कठिन श्रम होता है। इसी बीच जयपुर से माता की मूर्ति मंगाई गयी एवं आश्विन शुक्ल अष्टमी रविवार दिनांक २८ / ०९ / १९४१ ई० को आगमोक्त तांत्रिक विधि विधान से विधि पूर्वक इनकी स्थापना हुई। कुछ ही दिनों बाद इन्होने स्वेच्छा से क्षेत्रन्यास ( अपनी सीमा के बाहर कभी भी एवं कहीं भी नहीं जाना ) ले लिया। इनकी प्रसिद्धि दिन प्रति दिन बढ़ती गई एवं कई मूर्धन्य विद्वान एवं कर्मकाण्डी भी यहाँ आते रहे। १९५१ ई० में पूजयपाद स्वामी करपात्री जी महाराज स्वयं गुरूजी से साक्षात्कार करने आए , इसी बीच यात्रियों एवं उनके शिष्यों के आने का क्रम बढ़ता ही गया जिनके ठहरने हेतु उन्होंने एक धर्मशाला का निर्माण कराया जो हवन कुण्ड के बगल में ही है , स्थान के समीप ही दिनांक २७ /०२ / १९५२ ई० को गुरूजी ने चातुष्चरण यानी चारों वेद से यज्ञ कर एक पोखरा जिसका नाम कष्टहरणी है का निर्माण कराया गया। भारत वर्ष के चुने हुए विद्वानों एवं कर्मकाण्डियों को बुलाकर यज्ञ को सम्पादित किया गया। ऐसी मान्यता एवं प्रमाण है कि इस पोखरे में स्नान करने से सभी प्रकार के रोग एवं व्याधि नष्ट हो जाते हैं  , फिर मधुबनी के बाबू साहेब स्व० जगदीश नन्दन सिंह द्वारा दिए गए एकादशरुद्र की स्थापना अनेक विद्वानों के सहयोग एवं तांत्रिक विधि से दिनांक १० / ०५ / १९५९ ई० को किया गया। उसी मंदिर परिसर में श्री श्री १०८  गौड़ी शंकर ,काली जी विष्णु के दशावतार के प्रतिमाओं की स्थापना की। आषाढ़ कृष्ण पंचमी वृहस्पतिवार दिनांक १४ / ०६ / १९७९ ई० उनकी धर्म पत्नी स्वर्ग सिधार गई। उनका श्राद्ध गुरु महाराज ने विधि विधान पूर्वक स्वयं संपन्न किया। अब उन्हें इस स्थान के लिए एक योग्य एवं कुशल उत्तराधिकारी की तलाश थी। चूँकि उन्हें अपनी कोई संतान नहीं थी , पूर्व में भी उन्होंने इस हेतु अपने दूसरे भ्रातृ पुत्र को इस हेतु चयन किया किया किन्तु इनकी अयोग्यता अकर्मण्यता जन कल्याण हेतु लगन का आभाव देखा , उन्हें इस कार्य से वंचित कर दिया।  अब यह प्रश्न उनके लिए चिन्ता का विषय था सो बहुत सोंच विचार के बाद अपने प्रथम भ्रातृ के द्वितीय पुत्र ज्योतिषाचार्य पण्डित श्री पीताम्बर झा की कर्मठता लगनशीलता एवं योग्यता समझकर अपना उत्तराधिकारी बनाया। अपने सान्निध्य एवं शिष्यत्व में उन्हें इस दिशा में समुचित शिक्षा दी। अब स्थान पर होने वाले पूजा- पाठ भोग - राग , सामायिक उत्सव , यज्ञ अनुष्ठान आगत अतिथि सत्कार एवं अन्य धार्मिक एवं पुनीत कार्य का भार पण्डित श्री पीताम्बर झा के ऊपर है जो निष्ठां पूर्वक इसका संपादन करते आ रहे हैं। अग्रहण शुक्ल अष्टमी सोमवार दिनांक ०८ / १२ / १९८६ ई० को नित्यलित्यालीन , प्रातः स्मरणीय , आदर्श महापुरुष ब्रह्मलीन हो गए।  उनकी मुखाग्नि श्राद्धकर्म उनकी इक्षानुसार श्री पीताम्बर झा ने पूर्ण वैदिक रीती से किया , चूँकि उन्हें गुरूजी ने अपना कर्तापुत्र भी वैधानिक रूप से बना लिया था। श्री श्री १००८ गुरु महाराज का दैनिक कार्य चार बजे सुबह से गुरुस्मरण एवं उनकी वंदना से प्रारम्भ होता था। शयन में जाने से पहले तक वे हर अवसर के लिए संस्कृत मंत्रोच्चारण करते थे। इस स्थान पर भारत वर्ष ही नहीं बल्कि नेपाल आदि जगहों से भी श्रद्धालु अपनी कामना लेकर आते थे जिनका निवारण गुरु महाराज के द्वारा किया जाता था। दरभंगा के तत्कालीन महाराज महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह एक बार अस्वस्थ हो गए। जीने की सम्भावना कम थी पर उनके द्वारा किये गए अनुष्ठान से वे स्वस्थ हो गए। इस स्थान के सम्बन्ध में कई आशचर्य जनक घटनाएं जो इस क्षेत्र में सर्वविदित है इनसे कई लोगों ने दीक्षा ली। इनमे प्रमुख हैं श्री हरिकांत झा , राघोपुर स्व० कुशेश्वर नाथ सिन्हा एवं सुदामा देवी , श्री तारकेश्वर नाथ सिन्हा , अधिवक्ता एवं श्रीमती सावित्री देवी , मधुबनी के श्री सुशिल कुमार सिन्हा , अधिवक्ता एवं श्रीमती राजन सिन्हा , काठमांडू , श्री नरसिंह नारायण सिन्हा , श्रीमती इन्दु सिन्हा , श्री सुरेन्द्र कुमार सिन्हा एवं श्रीमती सुषमा सिन्हा , श्री मनोज कुमार सिन्हा एवं श्रीमती मधुलिका सिन्हा , श्री संतोष कुमार सिन्हा एवं श्रीमती अमिता सिन्हा , सभी मधुबनी श्री धर्म प्रकाश मंगला श्री ओम प्रकाश मंगला , श्री समलेश कुमार पटियाला पंजाब , स्व० द्वारका प्रसाद बजाज , स्व० कृष्ण प्रसाद बजाज , रानीगंज एवं देश के कई क्षेत्रों के लोग प्रमुख हैं एवं श्री गुरु जी की इन लोगों पर असीम कृपा रही है। आरम्भ से ही धोती एवं गमक्षा धारण करने वाला व्यक्तित्व जैसे सांसारिक सुखों एवं भोगो को अपने वश में कर रखा था। सात बीघे के क्षेत्रान्यास में करीब पचास वर्ष तक रहकर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि यदि मनुष्य अपने कर्मों पर रहकर माँ जगदम्बा के भरोसे अपनी जीवन नैया रख दे तो उसे किसी वस्तु की कमी नहीं रहेगी। इस अवधी में भी उन्हें विश्व भर में होने वाली घटनाओं की पूरी जानकारी रहती थी , यद्यपि वे कभी भी समाचार पत्र भी नहीं पढ़ते थे। 
                                       एक बार तत्कालीन महामहिम राज्यपाल श्री अनंतशयनम आयंगर माँ भगवती के दर्शनार्थ आये सरकारी तंत्र उनके लिए विशेष व्यवस्था करना चाहते थे पर गुरु जी ने स्पष्ट रूप से कहा उनके लिए विशेष व्यवस्था मैं करूँगा। उनके आगमन पर गुरूजी ने उन्हें कुश की चटाई आसन दिया दोनों में में संस्कृत में ही भावनाओं एवं विचारों का आदान प्रदान हुआ विदाई के समय उन्हें मिथिला के संस्कृत के अनुरूप विदाई दी गयी। उनके विचार वाणी एवं व्यव्हार उच्च कोटि के थे , उनके समाधिस्थ हो जाने से जैसे लोग इस दिशा में अनाथ हो गए हैं लेकिन यह सोंचना सर्वथा गलत होगा वे नहीं हैं , वे सब जगह उपस्थित हैं हम जब भी कभी भटकन महसूस करते हैं तो वे साक्षात् हमें मार्गदर्शन देते हैं। धर्माचार्य गुरूजी के तपस्या की शक्ति अभी भी इतनी प्रबल है कि यहाँ दूर - दूर से लोग बराबर आया करते हैं , खासकर बासन्ती नवरात्रा एवं शारदीय नवरात्रा में और उनकी मनोकामना पूर्ण होती है , यहाँ लोगों के कष्ट यथा भूतप्रेत उन्माद आदि का उपचार एवं निराकरण होता आ रहा है एवं वर्तमान में भी पण्डित श्री रामेश्वर झा एवं जिन्हे गुरूजी की सेवा करने का सुअवसर मिला उनके उत्तराधिकारी पंडित श्री पीताम्बर झा के संरक्षण में किया जाता है। कष्टहरणी में स्नान माँ भुवनेश्वरी की पूजा अर्चना एवं एकादशरुद्र एवं गौड़ीशंकर के दर्शनमात्र से  ही बहुत व्याधि एवं रोग नाश हो जाता है , वर्तमान में भी दूर - दूर से लोग अपने कल्याण हेतु यहाँ अनुष्ठान करवाते हैं। यहाँ विचित्र दैवी शक्ति को अनुभूति होती है और जन साधारण को शान्ति का अनुभव होता है प्रत्येक दिन सुबह एवं संध्याकाल में मधुबनी नगर एवं आस - पास के गांव के लोग टहलने के बहाने इस स्थान का दर्शन करते हैं जिससे एक पंथ दो काज यानि टहलना और माँ का दर्शन दोनों प्राप्त होता है। पण्डित श्री श्री १००८ मुनीश्वर झा द्वारा किया गया स्थापना एवं निर्माण इस प्रकार है - 
१ - श्री श्री १००८ करुणामयी भुवनेश्वरी देवी का स्थापना आश्विन शुक्ल अष्टमी रविवार दिनांक २८ / ०९ / १९४१ ई०। 
२ - लकड़ी का दो महला धर्मशाला का निर्माण आषाढ़ शुक्ल अष्टमी रवि दिनांक ०३ / ०७ / १९४९ ई०।
३ - कष्टहरणी पोखरा का निर्माण कार्य एवं यज्ञ १९४९ ई० में निर्माण कार्य एवं चतुश्चरण यज्ञ फाल्गुन शुक्ल तृतीया बृहस्पतिवार दिनांक २७ / ०२ /१९५२ ई०। 
४ - गौड़ीशंकर एकादशरुद्र महादेव विष्णु का दशावतार देवताओं का मंदिर निर्माण तथा स्थापना वैशाख शुक्ल अक्षय तृतीया मंगल दिनांक ३० /०४/ १९६८ ई० 
६-पिण्डस्थल गयाक्षेत्र का स्थापना आश्विन शुक्ल दशमी रविवार दिनांक १९ /१०/१०८० ई० 
७ - तंत्राश्रम मकान का निर्माण आषाढ़ शुक्ल षष्ठी सोमवार दिनांक २४ /०६ /१९८५ ई०। 
इस बीसवीं सदी के मिथिलांचल में धर्माचार्य पण्डित श्री मुनीश्वर झा के ऐसे तपस्वी तांत्रिक एवं ज्योतिषी नहीं हुए। 
                                पण्डित श्री मुनीश्वर झा अग्रहण शुक्ल अष्टमी सोमवार दिनांक ०८ /१२ / १९८६ ई० को ब्रह्मलीन हो गये। 
मैंने गुरु महाराज से प्रश्न किया - 
प्रश्न १ - गुरुदेव आपको पहला साक्षात्कार कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर - पहला साक्षात्कार करुणामयी भगवती से कामाख्या जी में हुआ और वहां से भगवती के आदेश पर ही कुछ स्थानों में तपस्या कर मंगरौनी आया। करुणामयी माँ भगवती का दर्शन हुआ और आज्ञा हुई भविष्य में सेवा वृद्धि करने की अतः आज्ञानुसार मंगरौनी में आकर क्षेत्र न्यास लिया और माँ की कृपा से कुछ वर्ष में ही मंदिर की स्थापना भी हो गयी। 
प्रश्न २- गुरुदेव आपको दूसरों के दुःख दर्द का अनुभव स्वयं कैसे होता है तथा आप कैसे निराकरण व उपचार करते हैं ?
उत्तर - आत्मशक्ति के द्वारा दूसरों के दुःख दर्द का अनुभव होता है और माँ भुवनेश्वरी का स्मरण कर जो उपचार बताता हूँ या विभूत देता हूँ उसमें मेरा दृढ विश्वास रहता है इसी सिलसिला में उन्होंने यह भी बताया बहुत समय पहले की बात है दरभंगा अस्पताल के सिविल सर्जन डा० साहब का अपना तथा डॉक्टरी इलाज से फायदा नहीं हुआ और बहुत तकलीफ बढ़ गई इसी समय सिविल सर्जन डा० साहब आकर मुझसे अनुरोध किया कि मैं चलकर उनकी पत्नी को आशीर्वाद दूँ। मैंने कहा मैं तो स्थान छोड़कर नहीं जा सकता हूँ। अगर आप माँ की शरण में उन्हें ला सके तो अच्छी हो जाएगी , उन्हें आश्चर्य हुआ और पत्नी यद्यपि बहुत तकलीफ में थी फिर भी किसी प्रकार ले आए करुणामयी की कृपा से कुछ ही घण्टों में स्वस्थ होकर टहलने लगी मानों उसे कुछ हुआ ही नहीं था। दरभंगा में जब तक डॉक्टर साहेब रहे सपत्नी आते जाते रहे। करुणामयी सर्वशक्तिमान है अटल विश्वास होना चाहिए। 
                                     




               

मंगलवार, 16 मई 2017

762 . भगवती सरस्वती के अनन्य उपासक महर्षि याज्ञवल्क्य।


                                ७६२
भगवती सरस्वती के अनन्य उपासक महर्षि याज्ञवल्क्य। 
महर्षि याज्ञवल्क्य की जन्म - भूमि मिथिला है। मिथिला के लोग प्रारम्भ से ही मातृभक्त थे। महर्षि याज्ञवल्क्य भी परम मातृभक्त थे। वे बाल्यावस्था में अपने शिक्षा - गुरु की आज्ञा का उल्लंघन किया करते थे। माता के सामने वह किसी को भी ऊँचा स्थान देना नहीं चाहते थे। माता की भक्ति में वे इस तरह लीन रहा करते थे कि गुरु के ज्ञान और गुरु के गौरव का उनके ह्रदय पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता था। इसलिए गुरुदेव ने उन्हें शाप दे दिया था कि 
' तूं मूर्ख ही रहेगा । ' इस शाप को छुड़ाने के लिए सिवा माता की शरण के उनके पास दूसरा कोई उपाय नहीं था। बालक जाए भी तो कहाँ ? दुःख हो या महा दुःख , माता के बिना रक्षक संसार में कौन है ?
                                  याज्ञवल्क्य ने माता की स्तुति की। मनसा वाचा कर्मणा उन्होंने जो स्तुति की , उस पर माता का ह्रदय द्रवित हो उठा।  याज्ञवल्क्य शाप से ही छुटकारा नहीं पाना चाहते थे , वे यह भी चाहते थे कि विद्वान बनकर रहें। इसलिए माता से उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि ' मेरी बुद्धि निर्मल हो जाये , मैं विद्वान बनूँ। ' माता ने वैसा ही किया तथा बुद्धि - दात्री सरस्वती का रूप धारण कर  याज्ञवल्क्य को वैसा ही बनने  के लिए अपने आशीर्वाद दिए। माता एक ही है किन्तु अपने भक्तों यानी पुत्रों पर कृपा करने के समय जब जिस रूप में उसकी आवश्यकता होती है , वह उसी रूप में आकर रक्षा करती है। एक ही माता दूध पिलाते समय धायी का काम करती है , जन्म देने के समय जननी बन जाती है , मल - मूत्र साफ़ करने समय मेहतरानी बन जाती है , रोगी बनने पर वैद्य बन जाती है , सेवा - सुश्रुषा के समय दासी बन जाती है और न जाने अपने पुत्र के लिए वह क्या - क्या बन जाती है , इसे अनुभवी ही हृदयङ्गम कर सकता है।
महर्षि याज्ञवल्क्य को विद्वान बनना था , इसलिए माता ने सरस्वती का रूप धारण कर उनकी बुद्धि को , उनकी मेधा - शक्ति को और प्रतिभा को निर्मल बना दिया , वे संसार की सारी वस्तुएँ स्पष्ट देखने लगे।  स्तुति का प्रभाव ऐसा ही होता है।  
महर्षि याज्ञवल्क्य ने माता की ऐसी ही स्तुति की , जिससे वे प्रसन्न हो गई और वरदान दिया कि  ' तुम्हारी बुद्धि सूर्य की किरणों की तरह सर्वत्र प्रवेश करनेवाली होगी और जो कुछ अध्यन - मनन - चिंतन करोगे वह सब तुम्हे सदा - सर्वदा स्मरण रहेगा। ' यह है मातृ - भक्ति का प्रसाद। 
महर्षि याज्ञवल्क्य उसी समय से तीक्ष्ण बुद्धिवाले हो गए। उन्होंने जो कुछ भी लिखा , वह आज तक भारत में ही नहीं , भारत से बाहर भी आदर की दृष्टि से देखा जाता है। ' याज्ञवल्क्य स्मृति ' और उस का ' दाय भाग ' भारतीय कानून का एक महान अंश है। यह सब माता की कृपा का ही सुपरिणाम है। 
महर्षि याज्ञवल्क्य ने माता को सोते , जागते , उठते , बैठते - सदा - सर्वदा जो स्तुति की ,  प्रभावित होकर माता ने उनकी मूर्खता सदा के लिए दूर कर दी ; गुरु के शाप से छुड़ा दिया ; विद्या का अक्षय भंडार उनके सामने रख दिया। 
जिस स्तुति से महर्षि याज्ञवल्क्य ने माता की प्रार्थना की थी , उसे ' श्रीवाणी - स्तोत्रम ' ९ सरस्वती का महा - स्तोत्र ) कहा जाता है।  इस स्तोत्र में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि ' मैं गुरु के शाप से पीड़ित हूँ। मुहे माता ही इस शाप से छुटकारा दिला सकती है। माता के गौरव का भी महर्षि याज्ञवल्क्य ने वर्णन किया है।  अन्त में स्तोत्र की महिमा भी बताई गयी है कि मुर्ख - से - मुर्ख व्यक्ति भी यदि एक वर्ष तक इस स्तोत्र का पाठ करे , तो वह मूर्खता से मुक्त हो सकता है। नित्य पाठ करनेवाला महा - दुर्बुद्धि और महा मुर्ख भी महा - पण्डित और मेधावी  हो जाएगा। 
यह स्तोत्र तंत्र - शास्त्र का एक अमूल्य रत्न है।  यदि इस स्तोत्र के विषय में यह कहा जाय कि यह महर्षि याज्ञवल्क्य का ' अनुभूत प्रयोग ; है तो अति - रञ्जित नहीं होगा। 
                            ' श्रीवाणी - स्तोत्रम '
कृपा कुरु जगन्मातर्मामेवं  हत - तेजसं। 
गुरु - शापात स्मृति - भ्रष्टं विद्या - हीनं च दुःखितं।।१ 
ज्ञानं देहि स्मृति विद्यां , शक्ति शिष्य - प्रबोधिनीम। 
ग्रन्थ - कर्तृत्व - शक्तिं च , सु - शिष्यं सु - प्रतिष्ठितम।।२ 
प्रतिभाँ सत - सभायां च , विचार - क्षमतां शुभाम। 
लुप्तं सर्वं देव - योगात नवी - भूतं पुनः कुरु।।३ 
यथांकुरं भस्मनि च , करोति देवता पुनः। 
ब्रह्म - स्वरूपा परमा , ज्योति - रूपा सनातनी।।४ 
सर्व - विद्याधि - देवि या , तस्यै वाण्यै नमो नमः। 
विसर्ग - विन्दु - मात्रासु , यादाधिष्ठानमेव च।.५ 
तदधिष्ठात्री या देवि , तस्यै नीत्यै नमो नमः। 
व्याख्या - स्वरूपा सा देवी , व्याख्याधिष्ठात्री - रूपिणी।।६ 
यया विना प्र - संख्या - वान , संख्या कर्तुं न शक्यते। 
काल - संख्या - स्वरूपा या , तस्यै देव्यै नमो नमः।।७
भ्रम - सिद्धान्त - रूपा या , तस्यै देव्यै नमो नमः। 
स्मृति - शक्ति - ज्ञान - शक्ति - बुद्धि - शक्ति - स्वरूपिणी।।८ 
प्रतिभा - कल्पना - शक्तिः , या च तस्यै नमो नमः। 
सनत - कुमारो ब्रह्माणंम , ज्ञानं प्रपच्छ यत्र वै।.९ 
बभूव मूक - वत्सोsपि , सिद्धान्तं कर्तुमक्षमः। 
तदा जगाम भगवान , आत्मा श्रीकृष्ण ईश्वरः।।१० 
उवाच स च तां स्तौहि , वाणीमिष्टां प्रजा - पते। 
स च तुष्टाव तां ब्रह्मा , चाज्ञया परमात्मनः।।११ 
चकार तत - प्रसादेन , तदा सिद्धान्तमुत्तमम। 
तदाप्यनन्तं  प्रपच्छ , ज्ञानमेकं वसन्धरा।।१२ 
बभूव मूक - वत्सोsपि , सिद्धान्तं कर्तुमक्षमः। 
तदा तां स च तुष्टाव , सन्त्रस्तो कश्यपाज्ञया।।१३ 
ततश्चकार  सिद्धान्तम , निर्मलं भ्रम - भंजनम। 
व्यासः पुराण - सूत्रं च , प्रपच्छ वाल्मीकि यदा।।१४ 
मौनी - भूतश्च संस्मार , तामेव जगदम्बिकाम। 
तदा चकार सिद्धान्तं , तद वरेण मुनीश्वरः।।१५ 
सम्प्राप्य निर्मलं ज्ञानम , भ्रमान्ध्य - ध्वंस - दीपकम। 
पुराण - सूत्रं श्रुत्वा च , व्यासं कृष्ण - कुलोदभवः।।१६ 
तां शिवां वेद - दध्यौ च , शत वर्षं च पुष्करे। 
तदा त्वत्तो वरं प्राप्य , सत - कवीन्द्रो बभूव ह।.१७ 
तदा वेद - विभागं च पुराणं च चकार सः। 
यदा महेन्द्रः प्रपच्छ तत्त्व - ज्ञानं सदा - शिवम्।।१८ 
क्षणं तामेव संचिन्त्य , तस्मै ज्ञानं ददौ विभुः। 
प्रपच्छ शब्द - शास्त्रं च महेन्द्रश्च वृहस्पतिम।। १९ 
दिव्यं वर्ष - सहस्त्रं च स त्वां दध्यौ च पुष्करे। 
तदा त्वत्तो वरं प्राप्य , दिव्य - वर्ष - सहस्त्रकम।।२० 
उवाच शब्द - शास्त्रं च तदर्थं च सुरेश्वरम। 
अध्यापिताश्च ये शिष्याः यैरधीतं मुनीश्वरैः।।२१ 
ते च तां परि - संचिन्त्य ,प्रवर्तन्ते सुरेश्वरोम। 
त्वं संस्तुता पूजिता च , मुनीन्द्रैः मनु - मानवै: २२ 
दैत्येन्द्रैश्च सुरैश्चापि , ब्रह्म - विष्णु - शिवादिभिः। 
जडी - भूतः सहस्त्रास्य: , पञ्च - वक्त्रश्चतुर्मुखः।।२३ 
यां स्तोतुं किमहं स्तौमि , तामेकास्येन मानवः। 
इत्युक्त्वा याग्वल्क्यश्च , भक्ति - नम्रात - कन्धरः।।२४ 
प्रणनाम निराहारो , रुरोद च मुहुर्मुहः। 
ज्योति - रूपा महा - माया , तेन द्रष्टापयुवाच तम।.२५ 
सा कवीन्द्रो भवेत्युक्त्वा , बैकुण्ठं च जगाम ह। 
 याज्ञवल्क्य - कृतं वाणी - स्तोत्रमेतत्तु यः पठेत।।२६ 
स कवीन्द्रो महा - वाग्मी , वृहस्पति - समो भवेत्। 
महा - मूर्खश्च दुर्बुद्धि , वर्षमेकं यदा पठेत।।२७ 
स पण्डितश्च मेधावी , सु - कवीन्द्रो भवेद ध्रुवम।२८
साभार ---बिहार में शक्ति - साधना       
अशुद्धि हेतु क्षमा प्रार्थी। 

शुक्रवार, 12 मई 2017

761 . बिहार में शक्ति साधक राजा निमि द्वारा भगवती जगदम्बा की प्रार्थना।


                                    ७६१
बिहार में शक्ति साधक राजा निमि द्वारा भगवती जगदम्बा की प्रार्थना। 
मिथिला की शक्ति उपासना का परम्परा हजार , दो हजार , दस बीस हजार वर्ष की नहीं , अपितु वैदिक काल के चतुर्युग ( सत्य , त्रेता , द्वापर , कलि ) के आदि सत्य युग के प्रारम्भ की है। 
चक्रवर्ती महाराज इच्छवाकु के बारहवें पुत्र राजा निमि परम सुन्दर , गुणी , धर्मज्ञ , लोक - हितेषी , सत्य -वादी  , ज्ञानी , बुद्धिमान , प्रजा - पालन में तत्पर थे। राजा निमि ने विशेष दान युक्त अनेक यज्ञ किये। गौतम आश्रम के निकट एक पुर बसाया। स्मरण रहे , यह गौतम आश्रम आज भी मिथिलाञ्चल में ही है। 
                                एक बार राजा निमि की इच्छा हुई की जगदम्बा प्रीत्यर्थ एक विशेष यज्ञ करूँ।  ऋषि महात्माओं के निर्देशानुसार यज्ञ - सामग्री एकत्र की गई।  भृगु , अंगिरा , वामदेव , गौतम , वसिष्ठ , पुलत्स्य , ऋचिक , क्रतु आदि मुनियों को निमंत्रण दिया गया। अपने कुल गुरु श्रोवशिष्ठ जी से राजा निमि ने विनय - पूर्वक निवेदन किया - गुरुदेव , यज्ञ - विशेष की सभी व्यवस्था हो गयी है। कृपया आप इस यज्ञ में जगदम्बा का साङ्गोपाङ्ग पूजन - विधान संपन्न करें। 
                                    श्री वशिष्ठ जी ने कहा - महाराज , जगदम्बा के प्रीत्यर्थ देव राज इन्द्र भी एक यज्ञ कर रहे हैं।  उसके लिए वे मुझे आपसे पूर्व ही निमंत्रण दे चुके हैं।  अतः मैं पहले उनका यज्ञ करा आता हूँ।  तब आप मुझे निमंत्रण देंगे , तो मैं आकर आपका भी यज्ञ करा दूंगा। 
                                 यह सुनकर राजा निमि ने कहा - मुनिवर , यज्ञ को तो मैं सारी तैयारी करवा चूका हूँ।  अनेक मुनि भी एकत्र हो चुके हैं।  ऐसी दशा में यह कैसे स्थगित हो सकता है। आप हमारे वंश के गुरु हैं। अतः हमारे यज्ञ में आपको रहना ही चाहिए। 
  किन्तु वशिष्ठ जी ने राजा निमि के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और इन्द्र का यज्ञ करने चले गए।  लाचार होकर राजा निमि गौतम को पुरोहित बनाकर यज्ञ करने लगे। कुछ दिनों के बाद वशिष्ठ जी उनके यहाँ आये। राजा निमि उस समय सो रहे थे। सेवकों ने उन्हें जगाना उचित नहीं समझा।  अतः राजा निमि वशिष्ठ जी दर्शनार्थ नहीं आ सके। मुनि वशिष्ठ ने इसे अपना अपमान समझा और उन्होंने क्रोध - भरे शब्दों में कहा - राजा निमि मुझ से रोके जाने पर भी आपने नहीं माना , दूसरे को पुरोहित बना आपने यज्ञ कर ही लिया और अब मेरे सम्मुख भी नहीं आते। अतः मैं आपको शाप देता हूँ कि आपका यह देह नष्ट हो जाय और आप विदेह हो जाएँ। 
शाप से घबराकर राजा के सेवकों ने राजा निमि को जगा दिया। राजा निमि भी शाप की बात सुनकर क्रुद्ध हो उठे और वशिष्ठ जी के सामने आकर कहा कि - आपने मुझे अकारण ही शाप दे दिया। कुल गुरु होकर भी आपने मेरे अनुरोध को नहीं माना और दूसरे का यज्ञ कराने चले गए।  लौटकर आने पर आपने यह भी विचार नहीं किया कि मैं निद्रित होने के कारण आपके दर्शनार्थ नहीं पहुँच सका और क्रोध में आकर अनुचित शाप दे बैठे। ब्राह्मणों को ऐसा क्रोध होना उचित नहीं है।  आपने मुझ निरपराध को शाप दिया है अतः मैं भी आपको शाप देता हूँ कि आपका यह क्रोध - युक्त देह नष्ट हो जाये। इस प्रकार राजा निमि और श्रीवशिष्ठ एक दूसरे के शाप से ट्रस्ट हो दुखी हो गए। 
                             वशिष्ठ जी अपने पिता ब्रह्मा की शरण में पहुंचे और सारी घटना का वर्णन करते हुए विनय की --- मेरा यह शरीर तो पतित होगा ही , अन्य शरीर धारण करने के लिए किनको पिता बनाऊं , जिससे देह मुझे पुनः प्राप्त हो और मेरा ज्ञान नष्ट न हो ?
             ब्रह्मा ने कहा - तुम मित्रा - वरुण के शरीर में प्रवेश कर स्थिर हो जाओ। वहां से तुम अयोनिज जन्म पाओगे , इसी देह के समान सब काम कर पाओगे और तुम्हारा यह ज्ञान भी नष्ट नहीं होगा। 
                     इधर राजा निमि का यज्ञ समाप्त नहीं हुआ था। शाप - वश उनके शरीर का पतन होने लगा। ऋत्विज ब्राह्मण राजा के किंचित श्वास - युक्त शरीर को चन्दनादि सुगन्धित वस्तु लेपन करते हुए मन्त्र - शक्ति से रोके रहे। यज्ञ समाप्ति होने पर देवताओं ने राजा से कहा - राजा निमि।  आपके यज्ञ से हम लोग बहुत प्रसन्न हैं , आप वर मांगें। देवता - मनुष्यादि जिस शरीर में आपको रूचि हो , वही शरीर हम आपको दे सकते हैं।  राजा निमि ने कहा - मैं इस शाप ग्रस्त देह में नहीं रहना चाहता। आप मुझे यह वर दें कि देह के न रहने पर भी मैं सदा बना रहूं। 
                               इस पर देवता बोले - आप जगदम्बा से प्रार्थना करें। वे इस यज्ञ से प्रसन्न हैं , अतः आपकी कामना अवश्य पूर्ण करेंगी। 
                    तब राजा निमि ने श्री जगदम्बा का ध्यान कर प्रार्थना की , जिस पर वे प्रकट हुई और बोली -- तुम्हारा अस्तित्व समस्त प्राणियों की पलक पर सदा बना रहेगा। तुम्हारे ही द्वारा प्रत्येक देहि पलक गिरा सकेगा। तुम्हारे निवास के कारण मनुष्य - पशु -पतंगादि भूत - गण स - निमिष कहलायेंगे और देवता अ - निमिष। 
                                उक्त वरदान के फल - स्वरुप राजा निमि की देह प्राण - शून्य हो गई। अराजकता के भय से वंश - रक्षा के निमित्त मुनियों ने अरणि ( अग्नि निकालने वाला काष्ट - यंत्र ) से मन्त्रों द्वारा उस देह का मन्थन किया , जिससे उस देह से एक पुत्र का जन्म हुआ। मन्थन द्वारा जनक ( पिता ) से उत्पन्न होने के कारण उसे मिथि और जनक नामों से पुकारा गया।  राजा निमि विदेह हो गए थे , अतः उनके वंशज भी विदेह कहलाये। इस प्रकार राजा निमि का उक्त पुत्र मिथि - जनक विदेह नामों से प्रसिद्ध हुआ।  इन्ही राजा मिथि द्वारा मिथिला नाम की पुरी स्थापित हुई और उसी पूरी के नाम पर मिथिला देश की प्रख्याति हुई। 

गुरुवार, 11 मई 2017

760 . जय देवि वर देह करह उधार। तोहहु कयल मात जगत विचार।।


                                     ७६०
जय देवि वर देह करह उधार। तोहहु कयल मात जगत विचार।। 
वाण खरग चक्र पात्र धर हाथ। चरम गदा धनु बिन्दु तुअ साथ।।
केसरि उपर छलि त्रिभुवन माता। सुर असुर नर जग्रहुक धाता।।
जगत चंदन भन आदि सूत्रधार।  शंभु सदाशिव करथु बिहार।।
जगतचन्द ( मैथिली नाटकक उदभव अओर विकास )

बुधवार, 10 मई 2017

759 . हेरह हरषि दुख हरह भवानी। तुअ पद शरण कए मने जानी।।


                                       ७५९ 
हेरह हरषि दुख हरह भवानी। तुअ पद शरण कए मने जानी।।
मोय अति दीन हीन मति देषि। कर करुणा देवि सकल उपेषि।।
कुतनय करय सकल अपराध। तैअओ जननिकर वेदन बाघ।।
प्रतापमल्ल कहए कर जोरी। आपद दूर कर करनाट किशोरी।।
                                                                       ( तत्रैव )

मंगलवार, 9 मई 2017

758 . किदहु करम मोर हीन रे माता जनि दुष रे धिया।


                                        758 . 
किदहु करम मोर हीन रे माता जनि दुष रे धिया। 
किदहु कुदिवस कए रखलादहु जनि मृग व्याधक फसिया।।
किदहु पुरुब कुकृत फल भुग्तल निकल भेल ते काजे। 
किदहु विधिवसे गिरिवर नन्दिनि भेलि हे विमुख आजे।।
                  प्रतापमल्ल ( मैथिली शैव साहित्य )

सोमवार, 8 मई 2017

757 . असि त्रिशूल गहि महिष विदारिणि। जंभाविनि जगतारण कारिणि।।


                                 ७५७
असि त्रिशूल गहि महिष विदारिणि। जंभाविनि जगतारण कारिणि।। 
ण्ड मुण्ड वध कय सुरकाजे।  शुम्भ निशुम्भ वधइते देवि छाजे।।
सकल देवगण निर्भय दाता। सिंह चढ़ लिखा फिर माता।।
बहुपतीन्द्र देव कएल प्रणामे। देवि प्रसादे पुरओ मोर कामे।।