मंगलवार, 16 मई 2017

762 .


                                ७६२
भगवती सरस्वती के अनन्य उपासक महर्षि याज्ञवल्क्य। 
महर्षि याज्ञवल्क्य की जन्म - भूमि मिथिला है। मिथिला के लोग प्रारम्भ से ही मातृभक्त थे। महर्षि याज्ञवल्क्य भी परम मातृभक्त थे। वे बाल्यावस्था में अपने शिक्षा - गुरु की आज्ञा का उल्लंघन किया करते थे। माता के सामने वह किसी को भी ऊँचा स्थान देना नहीं चाहते थे। माता की भक्ति में वे इस तरह लीन रहा करते थे कि गुरु के ज्ञान और गुरु के गौरव का उनके ह्रदय पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता था। इसलिए गुरुदेव ने उन्हें शाप दे दिया था कि 
' तूं मूर्ख ही रहेगा । ' इस शाप को छुड़ाने के लिए सिवा माता की शरण के उनके पास दूसरा कोई उपाय नहीं था। बालक जाए भी तो कहाँ ? दुःख हो या महा दुःख , माता के बिना रक्षक संसार में कौन है ?
                                  याज्ञवल्क्य ने माता की स्तुति की। मनसा वाचा कर्मणा उन्होंने जो स्तुति की , उस पर माता का ह्रदय द्रवित हो उठा।  याज्ञवल्क्य शाप से ही छुटकारा नहीं पाना चाहते थे , वे यह भी चाहते थे कि विद्वान बनकर रहें। इसलिए माता से उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि ' मेरी बुद्धि निर्मल हो जाये , मैं विद्वान बनूँ। ' माता ने वैसा ही किया तथा बुद्धि - दात्री सरस्वती का रूप धारण कर  याज्ञवल्क्य को वैसा ही बनने  के लिए अपने आशीर्वाद दिए। माता एक ही है किन्तु अपने भक्तों यानी पुत्रों पर कृपा करने के समय जब जिस रूप में उसकी आवश्यकता होती है , वह उसी रूप में आकर रक्षा करती है। एक ही माता दूध पिलाते समय धायी का काम करती है , जन्म देने के समय जननी बन जाती है , मल - मूत्र साफ़ करने समय मेहतरानी बन जाती है , रोगी बनने पर वैद्य बन जाती है , सेवा - सुश्रुषा के समय दासी बन जाती है और न जाने अपने पुत्र के लिए वह क्या - क्या बन जाती है , इसे अनुभवी ही हृदयङ्गम कर सकता है। 
                            

शुक्रवार, 12 मई 2017

761 . बिहार में शक्ति साधक राजा निमि द्वारा भगवती जगदम्बा की प्रार्थना।


                                    ७६१
बिहार में शक्ति साधक राजा निमि द्वारा भगवती जगदम्बा की प्रार्थना। 
मिथिला की शक्ति उपासना का परम्परा हजार , दो हजार , दस बीस हजार वर्ष की नहीं , अपितु वैदिक काल के चतुर्युग ( सत्य , त्रेता , द्वापर , कलि ) के आदि सत्य युग के प्रारम्भ की है। 
चक्रवर्ती महाराज इच्छवाकु के बारहवें पुत्र राजा निमि परम सुन्दर , गुणी , धर्मज्ञ , लोक - हितेषी , सत्य -वादी  , ज्ञानी , बुद्धिमान , प्रजा - पालन में तत्पर थे। राजा निमि ने विशेष दान युक्त अनेक यज्ञ किये। गौतम आश्रम के निकट एक पुर बसाया। स्मरण रहे , यह गौतम आश्रम आज भी मिथिलाञ्चल में ही है। 
                                एक बार राजा निमि की इच्छा हुई की जगदम्बा प्रीत्यर्थ एक विशेष यज्ञ करूँ।  ऋषि महात्माओं के निर्देशानुसार यज्ञ - सामग्री एकत्र की गई।  भृगु , अंगिरा , वामदेव , गौतम , वसिष्ठ , पुलत्स्य , ऋचिक , क्रतु आदि मुनियों को निमंत्रण दिया गया। अपने कुल गुरु श्रोवशिष्ठ जी से राजा निमि ने विनय - पूर्वक निवेदन किया - गुरुदेव , यज्ञ - विशेष की सभी व्यवस्था हो गयी है। कृपया आप इस यज्ञ में जगदम्बा का साङ्गोपाङ्ग पूजन - विधान संपन्न करें। 
                                    श्री वशिष्ठ जी ने कहा - महाराज , जगदम्बा के प्रीत्यर्थ देव राज इन्द्र भी एक यज्ञ कर रहे हैं।  उसके लिए वे मुझे आपसे पूर्व ही निमंत्रण दे चुके हैं।  अतः मैं पहले उनका यज्ञ करा आता हूँ।  तब आप मुझे निमंत्रण देंगे , तो मैं आकर आपका भी यज्ञ करा दूंगा। 
                                 यह सुनकर राजा निमि ने कहा - मुनिवर , यज्ञ को तो मैं सारी तैयारी करवा चूका हूँ।  अनेक मुनि भी एकत्र हो चुके हैं।  ऐसी दशा में यह कैसे स्थगित हो सकता है। आप हमारे वंश के गुरु हैं। अतः हमारे यज्ञ में आपको रहना ही चाहिए। 
  किन्तु वशिष्ठ जी ने राजा निमि के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और इन्द्र का यज्ञ करने चले गए।  लाचार होकर राजा निमि गौतम को पुरोहित बनाकर यज्ञ करने लगे। कुछ दिनों के बाद वशिष्ठ जी उनके यहाँ आये। राजा निमि उस समय सो रहे थे। सेवकों ने उन्हें जगाना उचित नहीं समझा।  अतः राजा निमि वशिष्ठ जी दर्शनार्थ नहीं आ सके। मुनि वशिष्ठ ने इसे अपना अपमान समझा और उन्होंने क्रोध - भरे शब्दों में कहा - राजा निमि मुझ से रोके जाने पर भी आपने नहीं माना , दूसरे को पुरोहित बना आपने यज्ञ कर ही लिया और अब मेरे सम्मुख भी नहीं आते। अतः मैं आपको शाप देता हूँ कि आपका यह देह नष्ट हो जाय और आप विदेह हो जाएँ। 
शाप से घबराकर राजा के सेवकों ने राजा निमि को जगा दिया। राजा निमि भी शाप की बात सुनकर क्रुद्ध हो उठे और वशिष्ठ जी के सामने आकर कहा कि - आपने मुझे अकारण ही शाप दे दिया। कुल गुरु होकर भी आपने मेरे अनुरोध को नहीं माना और दूसरे का यज्ञ कराने चले गए।  लौटकर आने पर आपने यह भी विचार नहीं किया कि मैं निद्रित होने के कारण आपके दर्शनार्थ नहीं पहुँच सका और क्रोध में आकर अनुचित शाप दे बैठे। ब्राह्मणों को ऐसा क्रोध होना उचित नहीं है।  आपने मुझ निरपराध को शाप दिया है अतः मैं भी आपको शाप देता हूँ कि आपका यह क्रोध - युक्त देह नष्ट हो जाये। इस प्रकार राजा निमि और श्रीवशिष्ठ एक दूसरे के शाप से ट्रस्ट हो दुखी हो गए। 
                             वशिष्ठ जी अपने पिता ब्रह्मा की शरण में पहुंचे और सारी घटना का वर्णन करते हुए विनय की --- मेरा यह शरीर तो पतित होगा ही , अन्य शरीर धारण करने के लिए किनको पिता बनाऊं , जिससे देह मुझे पुनः प्राप्त हो और मेरा ज्ञान नष्ट न हो ?
             ब्रह्मा ने कहा - तुम मित्रा - वरुण के शरीर में प्रवेश कर स्थिर हो जाओ। वहां से तुम अयोनिज जन्म पाओगे , इसी देह के समान सब काम कर पाओगे और तुम्हारा यह ज्ञान भी नष्ट नहीं होगा। 
                     इधर राजा निमि का यज्ञ समाप्त नहीं हुआ था। शाप - वश उनके शरीर का पतन होने लगा। ऋत्विज ब्राह्मण राजा के किंचित श्वास - युक्त शरीर को चन्दनादि सुगन्धित वस्तु लेपन करते हुए मन्त्र - शक्ति से रोके रहे। यज्ञ समाप्ति होने पर देवताओं ने राजा से कहा - राजा निमि।  आपके यज्ञ से हम लोग बहुत प्रसन्न हैं , आप वर मांगें। देवता - मनुष्यादि जिस शरीर में आपको रूचि हो , वही शरीर हम आपको दे सकते हैं।  राजा निमि ने कहा - मैं इस शाप ग्रस्त देह में नहीं रहना चाहता। आप मुझे यह वर दें कि देह के न रहने पर भी मैं सदा बना रहूं। 
                               इस पर देवता बोले - आप जगदम्बा से प्रार्थना करें। वे इस यज्ञ से प्रसन्न हैं , अतः आपकी कामना अवश्य पूर्ण करेंगी। 
                    तब राजा निमि ने श्री जगदम्बा का ध्यान कर प्रार्थना की , जिस पर वे प्रकट हुई और बोली -- तुम्हारा अस्तित्व समस्त प्राणियों की पलक पर सदा बना रहेगा। तुम्हारे ही द्वारा प्रत्येक देहि पलक गिरा सकेगा। तुम्हारे निवास के कारण मनुष्य - पशु -पतंगादि भूत - गण स - निमिष कहलायेंगे और देवता अ - निमिष। 
                                उक्त वरदान के फल - स्वरुप राजा निमि की देह प्राण - शून्य हो गई। अराजकता के भय से वंश - रक्षा के निमित्त मुनियों ने अरणि ( अग्नि निकालने वाला काष्ट - यंत्र ) से मन्त्रों द्वारा उस देह का मन्थन किया , जिससे उस देह से एक पुत्र का जन्म हुआ। मन्थन द्वारा जनक ( पिता ) से उत्पन्न होने के कारण उसे मिथि और जनक नामों से पुकारा गया।  राजा निमि विदेह हो गए थे , अतः उनके वंशज भी विदेह कहलाये। इस प्रकार राजा निमि का उक्त पुत्र मिथि - जनक विदेह नामों से प्रसिद्ध हुआ।  इन्ही राजा मिथि द्वारा मिथिला नाम की पुरी स्थापित हुई और उसी पूरी के नाम पर मिथिला देश की प्रख्याति हुई। 

गुरुवार, 11 मई 2017

760 . जय देवि वर देह करह उधार। तोहहु कयल मात जगत विचार।।


                                     ७६०
जय देवि वर देह करह उधार। तोहहु कयल मात जगत विचार।। 
वाण खरग चक्र पात्र धर हाथ। चरम गदा धनु बिन्दु तुअ साथ।।
केसरि उपर छलि त्रिभुवन माता। सुर असुर नर जग्रहुक धाता।।
जगत चंदन भन आदि सूत्रधार।  शंभु सदाशिव करथु बिहार।।
जगतचन्द ( मैथिली नाटकक उदभव अओर विकास )

बुधवार, 10 मई 2017

759 . हेरह हरषि दुख हरह भवानी। तुअ पद शरण कए मने जानी।।


                                       ७५९ 
हेरह हरषि दुख हरह भवानी। तुअ पद शरण कए मने जानी।।
मोय अति दीन हीन मति देषि। कर करुणा देवि सकल उपेषि।।
कुतनय करय सकल अपराध। तैअओ जननिकर वेदन बाघ।।
प्रतापमल्ल कहए कर जोरी। आपद दूर कर करनाट किशोरी।।
                                                                       ( तत्रैव )

मंगलवार, 9 मई 2017

758 . किदहु करम मोर हीन रे माता जनि दुष रे धिया।


                                        758 . 
किदहु करम मोर हीन रे माता जनि दुष रे धिया। 
किदहु कुदिवस कए रखलादहु जनि मृग व्याधक फसिया।।
किदहु पुरुब कुकृत फल भुग्तल निकल भेल ते काजे। 
किदहु विधिवसे गिरिवर नन्दिनि भेलि हे विमुख आजे।।
                  प्रतापमल्ल ( मैथिली शैव साहित्य )

सोमवार, 8 मई 2017

757 . असि त्रिशूल गहि महिष विदारिणि। जंभाविनि जगतारण कारिणि।।


                                 ७५७
असि त्रिशूल गहि महिष विदारिणि। जंभाविनि जगतारण कारिणि।। 
ण्ड मुण्ड वध कय सुरकाजे।  शुम्भ निशुम्भ वधइते देवि छाजे।।
सकल देवगण निर्भय दाता। सिंह चढ़ लिखा फिर माता।।
बहुपतीन्द्र देव कएल प्रणामे। देवि प्रसादे पुरओ मोर कामे।।

रविवार, 7 मई 2017

756 . ई जग जलधि अपारे। तठि देवि मोहि कडहारे।।


                                    ७५६ 
ई जग जलधि अपारे। तठि देवि मोहि कडहारे।।
धन जन यौवन सबे गुन आगर नरपति तेजि चल काय।ई सब संगति दिन दुयि बाटल आटल बिछुड़िअ जाय।।
जे किछु बुझि सार कए लेखल देखल सकल असारे। 
इन्द्रजाल जनि जगत सोहावन त्रिभुवन जत अधिकारे।।
तुअ परसादे साथ सभ पूरत दुर जायत दुख भाले। 
से मोय जानि शरण अवलम्बन सायद होयत संतारे।।
भूपतीन्द्र नृप निज मति एहो भन ई मोर सकल विचारे।देवि जननि पद पंकज भल्ल्हु  तेजि निखिल परिवारे।।
                                      ( मैथिली शैव साहित्य )