मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

744 . नहि धन नहि जन नहि आन देवा। मोन कएल जननी तोहर एक सेवा।।


                                      ७४४ 
नहि धन नहि जन नहि आन देवा। मोन कएल जननी तोहर एक सेवा।।
तोर करुणा ते मोर सब परिपुर। निय पद सनो हम जनु कर दूर।।
नित नित मागल मय ई तुव पासे। पुरह भवानी हमर मन आसे।।
जगतप्रकाश मल्ल भूपति भासे। जे हमरा अरि कर तसु नासे।।
                                                                   ( तत्रैव )

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

743 . नहि आन गति हमरा माता।।


                                     ७४३ 
नहि आन गति हमरा माता।।
मोने मन वचन कएल तुअ सेवा। करुणा कर कुल देवा।।
मोर अपराध क्षमह तोहे माता।  मोर रिपु का कर घाता।।
एहे संसार तोहे देवि सिरिजर। तोहहि देह अभयवर।।
करे जोरि विनति कर प्रकाश। पुराबधु मोर आश।
                    जगतप्रकाशमल्ल ( प्रभावती हरण )

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

742 . सकल असार सार पद पंकज तोहर मनहि विचारल हे।


                                      ७४२
सकल असार सार पद पंकज तोहर मनहि विचारल हे। 
जे तोहे करब से करह भवानी हट कए ह्रदय लगाओल हे।। 
गुण , दोष मोहि एकओ नहि जानह दारुक पुतरि उदासिन हे। 
जे किच्छु करावह करओ से माता हमें नहि अपन स्वआधिन हे।
तोह छाड़ि आन काहु नहि समुझनो दीन न भाषणों वाणी हे।
भाव जञ्जाल जाल मोर जालह शरणागत मोहि जानी हे।  
तोहे ठकुरायिनि हमें तुअ सेवक ई अपने अवधारी हे। 
कत अपराध पड़त अगेआनाहि से सबे हलह समारी हे।। 
नृप जगजोतिमल एहन बुझाबए चण्डी चरन चित राखी हे। 
सब सिधि आबए भगवति झुमरि सुमरि सुमरि मन साखी हे।। 
                                                               ( मुदित कुबलयाश्व नाटक )

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

741 . दिग देल अरुण किरण परगास। आरति लाओब परशिव पास।।


                                      ७४१
दिग देल अरुण किरण परगास। आरति लाओब परशिव पास।।
रे रे भवानी शरण तोहारि। जननि कृपा करू भवभय तारि।।
दिन दश लागि करब बहु बात। ममतामोह भरम मदमात।।
परशिव वरिय सुधारस सार। अलि पद सरसिज भेदए पार।।
ऊग कलारवि दिगरस वेद। चाँद सुरुज खेल , पवनक भेद।।
विहि आसने गुण महानिसि सेव। गगनविन्दु रस शशिकर देव।।
नृप जगज्योति एहो रस गावे।  गुरु परसाद परम लए पावे।।
                                               ( गीतपञ्चारिका )  

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

740 . नयनक दोष कतय नहि होए। जननि कृपावसे दूकर धोए।।


                                      ७४० 
नयनक दोष कतय नहि होए। जननि कृपावसे दूकर धोए।।
करजोड़ि पए पड़ि विनमञो तोहि। एहि दुखभार संतारह मोहि।।
कतए कतए नहि कएलह उधार। पालि न मारिअ करह विचार।।
भयभञ्जनि तोहे माए भवानि। आबे किए बिसरलि अपनुकि वानि।।
नृप जगजोति कह न कर उदास। जतहि ततहि जग तोहरे आस।
                                                                                 ( तत्रैव  )

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

739 . दालिम दशन पाती अधर विद्रुम कांती।


                                     ७३९
दालिम दशन पाती अधर विद्रुम कांती। 
सुखक सदन प्रसन्न वदन पुनित चाँदक भाँती। 
                                      देवि हे तों हहि जगतमाता। 
सकल संयत मूनि अभिमत , चारि पदारथ दाता।।
नयन भौंह विलासे मदनवाण प्रगासे। 
विकल कमलयुगल ऊपर भ्रमन पाँति विकासे।।
दानव दलन शीले विहित समर लीले।  
जगततारिणि दुरित दारिनि विवुध पालन धीरे।।
नृप जगजोति गाबे तुअ पद मन लाबे। 
जेहन जलद चातक चाहए आन किच्छु नहि भावे।।
                                    ( मुदित कुबलयाश्व नाटक )  

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

738 . मातु भवानी शरण तोहारो जाओ बलिहारी।।


                                      ७३८
मातु भवानी शरण तोहारो जाओ बलिहारी।।
मन क्रम वचन अओर नहि भावत। 
एहि संसार काहे अटकावत।।
अओर कि अओर सनो मन मेरो तोह सनो। 
मोरब प्रीति जैसे शसि कुमुदिनि सनो।।
नृप जगजोति कह आस न कायक। 
जनम जनम तोहरे गुण गायक।।
चरण कमल तुअ शरण भए मोहि। 
अपने रोपि का मारह पालह।।
                                      ( मुदित कुबलयाश्व नाटक )