शनिवार, 25 मार्च 2017

716 . ब्रह्माणी-------------------- ब्रह्मशक्ति जे चढिय आइलि , हंसयुक्त विमान यो।


                                     ७१६
                                  ब्रह्माणी 
ब्रह्मशक्ति जे चढिय आइलि , हंसयुक्त विमान यो। 
कमल आसन देखु सुन्दर , शोभए कुण्डल कान यो।  
चारि मुख तह वेद बाँचथि , पीत वसन विराज यो। 
कुश कमण्डलु दण्ड लय कर , चललि दैत्य समाज यौ। 
दृग लाल परम विशाल शोभित , मुकुट सुभग समारि यौ। 
सिंचित जल रण फिरहि चौदिस , शोभए भुज चल चारि यौ। 
शरण कए मन मोर सिरजल , जगत गति नहि जान यौ। 
कोहि से मन विकल कएलह , शिवदत्त पद भान यौ।
                                                              शिवदत्त  

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

715 . समदाउनि ----------- कि कहब जननि कहए नहि आबए छमिअ सकल अपराध।।


                                       ७१५
                                   समदाउनि 
कि कहब जननि कहए नहि आबए छमिअ सकल अपराध।। 
नबओ रतन नव मास वितित भेल तुअ पद लगि परमान। 
चललहुँ आज तेजि सेवकगण आकुल सभक परान।।
सून भवन देखि धिर न रहत हिअ नयन झहरि रह नोर। 
गदगद बोल अम्ब तन धर - धर हेरिअ लोचन कोर।।
चारि मास तत युगसम बुझ पड़ केहि विधि मन धर धीर। 
करुणागार दीन जनतारिणि हरिअ सकल उर पीर।।
मांगथि वर गणनाथ रमेश्वर महाराज अधिराज। 
दारा सुअन सहित मिथिलेश्वर चिर जिवथु शुभकाज।।

बुधवार, 22 मार्च 2017

714 . कमला ----------------- जय जय जगजननि भवानी त्रिभुवन जीवन - रूप।


                                      ७१४
                                   कमला 
जय जय जगजननि भवानी त्रिभुवन जीवन - रूप। 
हिमगिरिनन्दिनि थिकहुँ दयामय कमला कालि स्वरुप।। 
विधि हरि हर महिमा नहि जानथि वेद न पाबथि पार। 
आनक कोन कथा जगदीश्वरि विनमौ बारंबार।।
पूर्वज हमर जतय जे बसला आश्रित केवल तोर। 
श्रीमहेश नृप तखन शुभंकर किंकर भए तुअ कोर।।
विद्या धन निधि विधिवश पबिअ माधवसिंह नरेश।
वागमती तट भवन बनाओल दरभंगा मिथिलेश।।
हमरहु जखन राज सँ भेटल अंश अपन तुअ पास। 
पूर्ण आश धए तृणहिक धरमे कएलहुँ जननि निवास।।
क्रमिक समुन्नति शिखर चढ़ाओल करुणामयि जगदम्ब। 
राज - दार तनया देल सुत - युग राजभवन अविलम्ब।।
वागमतीक त्याग तुअ देखिअ राजनगर तुअ वास। 
राजक केन्द्र प्रधान बनाओल तुअ पद धरि विश्वास।।
सम्प्रति जलमय जगत बनाओल लीला अपरम्पार। 
राजनगर निज रक्षित राखल ई थिक करुण अपार।।
करब प्रसन्न सेवन सँ अंहकेँ ई नहि अछि अब होश। 
वसहज प्रमोद जननि करू सुत पर एकरे एक भरोस।।
जखन शरीर सबल छल तखनहु सेवत नहि हम तोहि। 
अब अनुताप - कुसुम अंजलि तजि किछु नहि फुरइछ मोहि। 
कर युग जोड़ि विनत अवनत भए करथि रमेश्वर अम्ब। 
सत चित आनन्द - रूप - दान मे करब न देवि विलम्ब।।
                                      म ० रामेश्वर सिंह 

मंगलवार, 21 मार्च 2017

713 . भगवती------------------ जय जय सकल असुर कुल नाशिनि , आदि सनातनि माया।


                                      ७१३
                                   भगवती
जय जय सकल असुर कुल नाशिनि , आदि सनातनि माया। 
गिरिवर वासिनि , शंकरवासिनि निज जन पर करू दाया।।
श्यामल रुचिर वदन तुअ राजित तड़ित विनिन्दिक नयने। 
बघछाल पहिरन कटि अति शोभित , फणि कुण्डल युग काने।।
रुचिर मुण्ड - हार उर राजित , खड्ग कर्त्तृवर हाथे। 
मोह कपाल लिधुर परिपूरित , अरु महिषासुर माथे।।
फुजल चिकुर छवि के कवि कहि सक कोउ , लोहित बिन्दु मुराजे।।
पद्मासिनि दाहिन रहु अनुखन , निज सेवक मन जानी। 
मिथिला महिपति शुभमति पूरिअ , विश्वनाथ कवि वानी।।
                                                       विश्वनाथ    

सोमवार, 20 मार्च 2017

712 . दक्षिणकालिका ------- जय जय जननी जोति तुअ जगभरि , दक्षिण पद युत नामे।


                                      ७१२
                              दक्षिणकालिका
जय जय जननी जोति तुअ जगभरि , दक्षिण पद युत नामे। 
शिशु शशि भाल , पयोधर उन्नत , सजल जलद अभिरामे।।
विकट रदन , अतिवदन भयानक , फूजल मञ्जुल केशा। 
शोणितमय रसना अति लहलह , असृकमय  सृक देशा।।
तीन नयन अति भीम राव तुअ , शवकुण्डल दुहु काने। 
शव - कर - काटि सघन पाँती कय , चहुदिशि कटि परिधाने।।
शिव शवरूप उरसि तुअ पद - युग , सदा वास समसाने। 
फरेब कर रब चहुदिशि शोभित , योगिनिधन परधाने।।
श्रीकृष्ण कवि भन , तुअ अपरूप गति , के लखि सक जगमाता। 
मिथिला - पतिक मनोरथदायिनि , सचकित हरिहर धाता।।
                                                             श्रीकृष्ण  

रविवार, 19 मार्च 2017

711 . मातङ्गी ------ राजय जगमग माँ शिवरानिया।


                                        ७११
                                   मातङ्गी  
राजय जगमग माँ शिवरानिया। 
रतन सिंहासन बैसि विण ल' कर बजबैत मधुर लय ध्वनिआँ।। 
चकमक चान चमकि लस भालहिं मधु - मद - मूनल नैन। 
वल्लकि - निक्वण - मोदित कण - कण कलकल कौरमुखक श्रुत बैन।।
विपुल नितम्ब अरुण - पट - मण्डित उरसिज - निहित - निचोल। 
मुसुकि - मुसुकि मधु मतङ्गनन्दिनि शंखपत्र चुम जनिक कपोल।।
कदम - कुसुम - कृत - माल - कलित - धृत कवरि भार , चित्राङ्कित भल। 
न्यस्त एक पद - पदमहिं से रहि दाहिनि ' मधुप 'हुँ करथु नेहाल।।

शनिवार, 18 मार्च 2017

710 . त्रिपुरभैरवी --------- समुदित सहस - सूर्य -किरणाबलि कान्ति - कलित - अभिरामा।


                                     ७१०
                               त्रिपुरभैरवी
समुदित सहस - सूर्य -किरणाबलि कान्ति - कलित - अभिरामा।   
अरुण - क्षौम - परिधान - धारिणी पुर प्रलयंकर वामा।।
वारिजात - वन्दित - वदनश्री स्मित - विजितामृत धामा। 
रक्ते रञ्जित पीनपयोधरवती सर्वदा श्यामा।।
त्रिविध - ताप - तम तरिणि तारिणी रुनझुन रसना - धामा। 
तनुक - तनुक त्रिनयनि त्रिदेव - तोषित पूरित जनकामा।।
पुस्तक - जपमालाभय वर विलसितकर निकर ललाम। 
शिशु - शशि - रत्न - सुशोभि - मकुट - मंडित , खंडित भव - भामा।।
मञ्जु मुंडमाला नागबाला पद - निपतित - सुररामा। 
देथु भैरवी - कामगवी ' मधुप ' हूँ करथु नेहाल।।
                                                         मधुप