शनिवार, 1 अप्रैल 2017

722 . आब करू जनुदेरि हे मैया , मैथिल दिशि हेरु।।

                                     ७२२
आब करू जनुदेरि हे मैया , मैथिल दिशि हेरु।।
जनिके  सम्पत्ति आन दुहै अछि , अपने बन्हल मनु नेरु। 
मिथिला काम धेनु पय वञ्चित , छिन्न मलीन दुख भेरू।।
' लोचन ' मान बचाबथि कोन विधि , उद्दम चढथि सुमेरु। 
करुणामयि जननी अपने छी , नाम ककर हम टेरू।।
                                      ( मिथिला मोद )  

कोई टिप्पणी नहीं: